मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ४० * | १४३ |
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| अष्टक उवाच<br>कतिस्विद् देव मुनयो मौनानि कति चाप्युत।<br>भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम्॥ ८<br><br>ययातिरुवाच<br>अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः।<br>ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप॥ ९<br><br>अष्टक उवाच<br>कथंस्विद् वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः।<br>ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः॥ १०<br><br>ययातिरुवाच<br>न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत्।<br>तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः॥ ११<br><br>अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः।<br>कौपीनाच्छादनं यावत् तावदिच्छेच्च चीवरम्॥ १२<br><br>यावत् प्राणाभिसंधानं तावदिच्छेच्च भोजनम्।<br>तदास्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः॥ १३<br><br>यस्तु कामान् परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः।<br>आतिष्ठेत मुनिर्मौनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात्॥ १४<br><br>धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम्।<br>असितं सितकर्मस्थं कस्तं नार्चितुमर्हति॥ १५<br><br>तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः।<br>यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिर्मौनं समास्थितः॥ १६<br><br>अथ लोकमिमं जित्वा लोकं चापि जयेत् परम्।<br>आस्येन तु यथाहारं गोवन्मृगयते मुनिः।<br>अथास्य लोकः सर्वो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १७ | **अष्टकने पूछा—**राजन्! मुनि कितने हैं? और मौन कितने प्रकारके हैं! यह बताइये, हम इसे सुनना चाहते हैं॥ ८॥<br><br>**ययातिने कहा—**जनेश्वर! अरण्यमें निवास करते समय जिसके लिये ग्राम पीछे होता है और ग्राममें वास करते समय जिसके लिये अरण्य पीछे होता है, वह मुनि कहलाता है॥ ९॥<br><br>**अष्टकने पूछा—**अरण्यवासीके लिये ग्राम और ग्राममें निवास करनेवालेके लिये अरण्य पीछे कैसे है?॥ १०॥<br><br>**ययातिने कहा—**जो मुनि वनमें निवास करता है और गाँवोंमें प्राप्त होनेवाली वस्तुओंका उपयोग नहीं करता, इस प्रकार वनमें निवास करनेवाले उस (वानप्रस्थ) मुनिके लिये गाँव पीछे समझा जाता है। जो अग्नि और गृहको त्याग चुका है, जिसका गोत्र और चरण (वेदकी शाखा एवं जाति)-से भी सम्बन्ध नहीं रह गया है, जो मौन रहता और उतने ही वस्त्रकी इच्छा रखता है, जितनेसे लँगोटी और ओढ़नेका काम चल जाय; इसी प्रकार जितनेसे प्राणोंकी रक्षा हो सके उतना ही भोजन चाहता है, इस नियमसे गाँवमें निवास करनेवाले उस (संन्यासी) मुनिके लिये अरण्य पीछे समझा जाता है। जो मुनि सम्पूर्ण कामनाओंको छोड़कर कर्मोंको त्याग चुका है और इन्द्रिय-संयमपूर्वक सदा मौनमें स्थित है, ऐसा संन्यासी लोकमें परम सिद्धिको प्राप्त होता है। जिसके दाँत शुद्ध और साफ हैं, जिसके नख (और केश) कटे हुए हैं, जो सदा स्नान करता है तथा यम-नियमादिसे अलंकृत (उन्हें धारण किये हुए) है, शीतोष्णको सहनेसे जिसका शरीर श्याम पड़ गया है, जिसके आचरण उत्तम हैं—ऐसा संन्यासी किसके लिये पूजनीय नहीं है। तपस्यासे मांस, हड्डी तथा रक्तके क्षीण हो जानेपर जिसका शरीर कृश और दुर्बल हो गया है तथा जो सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित एवं भलीभाँति मौनावलम्बी हो चुका है, वह इस लोकको जीतकर परलोकपर भी विजय पाता है। जब संन्यासी मुनि गाय-बैलोंकी तरह मुखसे ही आहार ग्रहण करता है, हाथ आदिका भी सहारा नहीं लेता, तब उसके द्वारा ये सब लोक जीत लिये गये समझे जाते हैं और वह मोक्षकी प्राप्तिके लिये समर्थ समझा जाता है॥ ११—१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंशवर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४०॥