मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 154, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 154
| १४४ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
एकतालीसवाँ अध्याय
अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टक उवाच<br>कतरस्त्वेतयोः पूर्वं देवानामेति सात्म्यताम्।<br>उभयोर्धावतो राजन् सूर्याचन्द्रमशोरिव॥ १ | अष्टकने पूछा— राजन्! सूर्य और चन्द्रमाकी तरह अपने-अपने लक्ष्यकी ओर दौड़ते हुए वानप्रस्थ और संन्यासी—इन दोनोंमेंसे पहले कौन-सा देवताओंके आत्मभाव (ब्रह्म)-को प्राप्त होता है?॥ १॥ |
| ययातिरुवाच<br>अनिकेतगृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः।<br>ग्राम एव चरन् भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः॥ २<br>अप्राप्यं दीर्घमायुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत्।<br>तप्येत यदि तत् कृत्वा चरेत् सोग्रं तपस्ततः॥ ३<br>यद् वै नृशंसं तदपथ्यमाहु-<br>र्यः सेवते धर्ममनर्थबुद्धिः।<br>असावनीशः स तथैव राजं-<br>स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम्॥ ४ | ययाति बोले— कामवृत्तिवाले गृहस्थोंके बीच ग्राममें ही वास करते हुए भी जो जितेन्द्रिय और गृहरहित संन्यासी है, वही उन दोनों प्रकारके मुनियोंमें पहले ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। जो वानप्रस्थ दुर्लभ दीर्घायुको पाकर भी विषयोंके प्राप्त होनेपर उनसे विकृत हो उन्हींमें विचरने लगता है, उसे यदि विषयोपभोगके अनन्तर पश्चात्ताप होता है तो उसे मोक्षके लिये पुनः तपका अनुष्ठान करना चाहिये। राजन्! जो पापबुद्धिवाला मनुष्य अधर्मका आचरण करता है, उसका वह आचरण नृशंस (पापमय) और असत्य कहा गया है (एवं उस अजितेन्द्रियका धन भी वैसा ही पापमय और असत्य है); परंतु वानप्रस्थ मुनिका जो धर्मपालन है, वही सरलता है, वही समाधि है और वही श्रेष्ठ आचरण है॥ २—४॥ |
| अष्टक उवाच<br>केनाद्य त्वं तु प्रहितोऽसि राजन्<br>युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चाः।<br>कुत आगतः कतमस्यां दिशि त्व-<br>मुताहोस्वित् पार्थिवं स्थानमस्ति॥ ५ | अष्टकने पूछा— राजन्! आपको यहाँ किसने भेजा है? आप अवस्थामें तरुण, फूलोंकी मालासे सुशोभित, दर्शनीय तथा उत्तम तेजसे उद्भासित जान पड़ते हैं। आप कहाँसे आये हैं? अथवा क्या आपके लिये इस पृथ्वीपर ही किसी दिशामें कोई उत्तम वासस्थान है?॥ ५॥ |
| ययातिरुवाच<br>इमं भौमं नरकं क्षीणपुण्यः<br>प्रवेष्टुमुर्वी गगनाद् विप्रहीणः।<br>उक्तवाहं वः प्रपतिष्याम्यनन्तरं<br>त्वरन्वमी ब्रह्मणो लोकपा ये॥ ६<br>सतां सकाशे तु वृतः प्रपात-<br>स्ते सङ्गता गुणवन्तस्तु सर्वे।<br>शक्राच्च लब्धो हि वरो मयैष<br>पतिष्यता भूमितलं नरेन्द्र॥ ७ | ययातिने कहा— मैं अपने पुण्यका क्षय होनेसे भौमनरकमें प्रवेश करनेके लिये आकाशसे गिर रहा हूँ। ये जो ब्रह्माजीके लोकपाल हैं, वे मुझे गिरनेके लिये जल्दी मचा रहे हैं। अतः (अब) आपलोगोंसे पूछकर—विदा लेकर इस पृथ्वीपर गिरूँगा। नरेन्द्र! मैं जब इस पृथ्वीतलपर गिरनेवाला था, उस समय मैंने इन्द्रसे यह वर माँगा था कि मैं साधु पुरुषोंके समीप गिरूँ। वह वर मुझे मिला, जिसके कारण आप सब सद्गुणी संतोंका सङ्ग प्राप्त हुआ॥ ६-७॥ |
| अष्टक उवाच<br>पृच्छामि त्वां प्रपतन्तं प्रपातं<br>यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ८ | अष्टक बोले— महाराज! मेरा विश्वास है कि आप पारलौकिक धर्मके ज्ञाता हैं। मैं नीचे गिरनेवाले आपसे एक बात पूछता हूँ—'क्या अन्तरिक्ष या स्वर्गलोकमें मुझे प्राप्त होनेवाले कोई पुण्यलोक भी हैं?'॥ ८॥ |