मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ४१ * | १४५ |
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| ययातिरुवाच<br>यावत् पृथिव्यां विहितं गवाश्वं<br>सहारण्यैः पशुभिः पक्षिभिश्च।<br>तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै<br>तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह॥ ९ | **ययातिने कहा—**नरेन्द्रसिंह! इस पृथ्वीपर जंगली पशुओं और पक्षियोंके साथ जितने गाय, घोड़े आदि पशु रहते हैं, स्वर्गमें तुम्हारे लिये उतने ही लोक विद्यमान हैं। तुम इसे निश्चय जानो॥ ९॥ | | अष्टक उवाच<br>तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं<br>ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-<br>स्तानाक्रम क्षिप्रममित्रहासि॥ १० | **अष्टक बोले—**राजेन्द्र! स्वर्गमें मेरे लिये जो लोक विद्यमान हैं, उन्हें मैं आपको देता हूँ, परंतु आपका पतन न हो। अन्तरिक्ष या द्युलोकमें मेरे लिये जो स्थान हैं, उनमें आप शीघ्र ही चले जायें; क्योंकि आप शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं॥ १०॥ | | ययातिरुवाच<br>नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च<br>प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य।<br>यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-<br>स्तथा ददे पूर्वमहं नरेन्द्र॥ ११<br>नाब्राह्मणः कृपणे जातु जीवेद्<br>याच्ञापि स्याद् ब्राह्मणी वीरपत्नी।<br>सोऽहं यदेवाकृतपूर्व चरेयं<br>विधित्समानः किमु तत्र साधुः॥ १२ | **ययातिने कहा—**नृपश्रेष्ठ! ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण ही प्रतिग्रह लेता है, मेरे-जैसा क्षत्रिय कदापि नहीं। नरेन्द्र! जैसे दान करना चाहिये, उस विधिसे मैंने पहले भी सदा उत्तम ब्राह्मणोंको बहुत दान दिये हैं। जो ब्राह्मण नहीं है, उसे दीन याचक बनकर कभी जीवन नहीं बिताना चाहिये। याचना तो विद्यासे दिग्विजय करनेवाले विद्वान् ब्राह्मणकी पत्नी है अर्थात् ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मणको ही याचना करनेका अधिकार है। मुझे सत्कर्म करनेकी इच्छा है, अतः ऐसा कोई अकार्य कैसे कर सकता हूँ, जो पहले कभी न किया हो॥ ११-१२॥ | | प्रतर्दन उवाच<br>पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप<br>प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ १३ | **प्रतर्दन बोले—**वाञ्छनीय रूपवाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ, यदि अन्तरिक्ष अथवा स्वर्गमें मेरे भी लोक हों तो बताइये। मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १३॥ | | ययातिरुवाच<br>सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र<br>अप्येकैकं सप्त समान्यहानि।<br>मधुच्युतो घृतवन्तो विशोका-<br>स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति॥ १४ | **ययातिने कहा—**नरेन्द्र! तुम्हारे तो बहुत लोक हैं, यदि एक-एक लोकमें सात-सात दिन रहा जाय तो भी उनका अन्त नहीं है। वे सब-के-सब अमृतके झरने बहाते हैं एवं घृत (तेज)-से युक्त हैं। उनमें शोकका सर्वथा अभाव है। वे सभी लोक तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ १४॥ | | प्रतर्दन उवाच<br>तांस्ते ददामि पतमानस्य राजन्<br>ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-<br>स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः॥ १५ | **प्रतर्दन बोले—**महाराज! वे सभी लोक मैं आपको देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो मेरे लोक हैं, वे सब आपके हो जायें। वे अन्तरिक्षमें हों या स्वर्गमें, आप शीघ्र मोहरहित होकर उनमें चले जाइये॥ १५॥ | | ययातिरुवाच<br>न तुल्यतेजाः सुकृतं हि कामये<br>योगक्षेमं पार्थिवात् पार्थिवः सन्।<br>दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां-<br>श्रेयन्नृशंसं हि न जातु राजा॥ १६ | **ययातिने कहा—**राजन्! मैं स्वयं एक तेजस्वी राजा होकर दूसरेसे पुण्य तथा योग-क्षेमकी इच्छा नहीं करता। विद्वान् राजा दैववश भारी आपत्तिमें पड़ जानेपर भी कोई पापमय कार्य न करे। |