मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १४६ | * मत्स्यपुराण * |
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| धर्म्यं मार्गं चिन्तयानो यशस्यं<br>कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः।<br>न मद्धिधो धर्मबुद्धिर्हि राजा<br>ह्येवं कुर्यात् कृपणं मां यथात्थ ॥ १७<br>कुर्यामपूर्वं न कृतं यदन्यै-<br>र्विधित्समानः किमु तत्र साधुः।<br>ब्रुवाणमेवं नृपतिं ययातिं<br>नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत्तम् ॥ १८ | धर्मपर दृष्टि रखनेवाले राजाको उचित है कि वह प्रयत्नपूर्वक धर्म और यशके मार्गपर ही चले। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हो, उस मेरे-जैसे मनुष्यको जान-बूझकर ऐसा दीनतापूर्ण कार्य नहीं करना चाहिये जिसके लिये तुम मुझसे कह रहे हो। जो शुभ कर्म करनेकी इच्छा रखता है वह ऐसा काम नहीं कर सकता, जिसे अन्य राजाओंने नहीं किया हो। (तदनन्तर) इस प्रकारकी बातें कहनेवाले राजा ययातिसे नृपश्रेष्ठ वसुमान् बोले ॥ १६—१८ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते एकचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन नामक एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥
बयालीसवाँ अध्याय
राजा ययातिके वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना
| वसुमानुवाच<br>पृच्छाम्यहं वसुमानौषदश्वि-<br>र्यद्यस्ति लोको दिवि मह्यं नरेन्द्र।<br>यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन्<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये ॥ १ | वसुमान्ने कहा— नरेन्द्र! मैं उषदश्वका पुत्र हूँ और आपसे पूछ रहा हूँ। यदि स्वर्ग या अन्तरिक्षमें मेरे लिये भी कोई विख्यात लोक हों तो बताइये। महात्मन्! मैं आपको पारलौकिक धर्मका ज्ञाता मानता हूँ ॥ १ ॥ |
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| ययातिरुवाच<br>यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च<br>यत्तेजसा तपते भानुमांश्च।<br>लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै<br>ते त्वां भवन्तं प्रतिपालयन्ति ॥ २ | ययातिने कहा— राजन्! पृथ्वी, आकाश और दिशाओंके जितने प्रदेशको सूर्यदेव अपनी किरणोंसे तपाते और प्रकाशित करते हैं, उतने लोक तुम्हारे लिये स्वर्गमें स्थित हैं। वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं ॥ २ ॥ |
| वसुमानुवाच<br>तांस्ते ददामि पत मा प्रपातं<br>ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।<br>क्रीणीष्वैनांस्तृणकेनापि राजन्<br>प्रतिग्रहस्ते यदि सम्यक् प्रदुष्टः ॥ ३ | वसुमान् बोले— राजन्! वे सभी लोक मैं आपके लिये देता हूँ, वे सब आपके हो जायँ। धीमन्! यदि आपको प्रतिग्रह लेनेमें दोष दिखायी देता हो तो एक मुट्ठा तिनका मुझे मूल्यके रूपमें देकर मेरे इन सभी लोकोंको आप खरीद लें ॥ ३ ॥ |
| ययातिरुवाच<br>न मिथ्याहं विक्रियं वै स्मरामि<br>मया कृतं शिशुभावेऽपि राजन्।<br>कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-<br>र्विधित्समानो वसुमन् न साधु ॥ ४ | ययातिने कहा— राजन्! मैंने बचपनमें भी कभी इस प्रकार झूठ-मूठकी खरीद-बिक्री की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है। जिसे पूर्ववर्ती अन्य महापुरुषोंने नहीं किया, वह कार्य मैं भी नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि मैं सत्कर्म करना चाहता हूँ ॥ ४ ॥ |