भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 157
* अध्याय ४२ *१४७
वसुमानुवाच<br>तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्<br>मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते।<br>नाहं तान् वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र<br>सर्वे लोकास्तावका वै भवन्तु॥ ५वसुमान् बोले— राजन्! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वतः अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। नरेन्द्र! निश्चय जानिये कि मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा। वे सब आपके ही अधिकारमें रहें॥ ५॥
शिबिरुवाच<br>पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं<br>ममापि लोका यदि सन्ति तात।<br>यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः<br>क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ६शिबिने कहा— तात! मैं उशीनरका पुत्र शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अन्तरिक्ष या स्वर्गमें मेरे भी पुण्यलोक हों तो बताइये; क्योंकि मैं आपको उक्त धर्मका ज्ञाता मानता हूँ॥ ६॥
ययातिरुवाच<br>न त्वं वाचा हृदयेनापि राजन्<br>परीप्समानो मावमंस्था नरेन्द्र।<br>तेनानन्ता दिवि लोकाः स्थिता वै<br>विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः॥ ७ययाति बोले— नरेन्द्र! जो-जो साधु पुरुष तुमसे कुछ माँगनेके लिये आये, उनका तुमने वाणीसे कौन कहे, मनसे भी अपमान नहीं किया। इस कारण स्वर्गमें तुम्हारे लिये अनन्त लोक विद्यमान हैं जो विद्युत्के समान तेजोमय, भाँति-भाँतिके सुमधुर शब्दोंसे युक्त तथा महान् हैं॥ ७॥
शिबिरुवाच<br>तांस्त्वं लोकान् प्रतिपद्यस्व राजन्<br>मया दत्तान् यदि नेष्टः क्रयस्ते।<br>न चाहं तान् प्रतिपद्येह दत्त्वा<br>यत्र त्वं तात गन्तासि लोके॥ ८शिबिने कहा— महाराज! यदि आप खरीदना नहीं चाहते तो मेरे द्वारा स्वयं अर्पण किये हुए पुण्यलोकोंको ग्रहण कीजिये। तात! उन सबको देकर निश्चय ही मैं उन लोकोंमें नहीं जाऊँगा जिन लोकोंमें आप जा रहे होंगे॥ ८॥
ययातिरुवाच<br>यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव-<br>स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः।<br>तथाद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते<br>तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि वाचम्॥ ९ययाति बोले— नरदेव शिबि! जिस प्रकार तुम इन्द्रके समान प्रभावशाली हो उसी प्रकार तुम्हारे वे लोक भी अनन्त हैं, तथापि दूसरेके दिये हुए लोकमें मैं विहार नहीं कर सकता; इसीलिये तुम्हारे दिये हुएका अभिनन्दन नहीं करता॥ ९॥
अष्टक उवाच<br>न चेदेकैकशो राजँल्लोकान् नः प्रतिनन्दसि।<br>सर्वे प्रदाय ताँल्लोकान् गन्तारो नरकं वयम्॥ १०अष्टकने कहा— राजन्! यदि आप हममेंसे एक-एकके दिये हुए लोकोंको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण नहीं करते तो हम सब लोग अपने पुण्यलोक आपकी सेवामें समर्पित करके नरक (भूलोक)-में जानेको तैयार हैं॥ १०॥
ययातिरुवाच<br>यदहार्हस्तद् वदध्वं वः सन्तः सत्यादिदर्शिनः।<br>अहं तु नाभिगृह्णामि यत् कृतं न मया पुरा॥ ११<br>अलिप्समानस्य तु मे यदुक्तं<br>न तत्तथास्तीह नरेन्द्रसिंह।<br>अस्य प्रदानस्य यदेव युक्तं<br>तस्यैव चानन्तफलं भविष्यम्॥ १२ययाति बोले— मैं जिसके योग्य हूँ, उसीके लिये यत्न करो; क्योंकि साधु पुरुष सत्यका ही अभिनन्दन करते हैं। मैंने पूर्वकालमें जो कर्म नहीं किया, उसे अब भी स्वीकार नहीं कर सकता। नरेन्द्रसिंह! मुझ निर्लोभके प्रति तुमलोगोंने जो कुछ कहा है उसका फल वैसे ही निराशापूर्ण नहीं होगा, अपितु इतने बड़े दानके लिये जो उपयुक्त होगा, वह अनन्त फल तुम लोगोंको अवश्य प्राप्त होगा॥ ११-१२॥