भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४८* मत्स्यपुराण *

| अष्टक उवाच<br>कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः।<br>उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव॥ १३ | अष्टकने पूछा—आकाशमें ये किसके पाँच सुवर्णमय रथ दिखायी देते हैं, जो आकाशमण्डलमें बड़ी ऊँचाईपर स्थित हैं और अग्नि-शिखाकी भाँति प्रकाशित हो रहे हैं?॥ १३॥ | | ययातिरुवाच<br>भवतां मम चैवैते रथा भान्ति हिरण्मयाः।<br>आरुह्यैतेषु गन्तव्यं भवद्भिश्च मया सह॥ १४ | ययाति बोले—ये जो स्वर्णमय रथ चमक रहे हैं, सभी मेरे तथा तुमलोगोंके लिये आये हैं। इन्हींपर आरूढ़ होकर तुमलोग मेरे साथ इन्द्र-लोकको चलोगे॥१४॥ | | अष्टक उवाच<br>आतिष्ठस्व रथं राजन् विक्रमस्व विहायसा।<br>वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति॥ १५ | अष्टक बोले—राजन्! आप रथमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे॥१५॥ | | ययातिरुवाच<br>सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गो जितो यतः।<br>एष वो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्भगः॥ १६ | ययाति बोले—हम सब लोगोंने साथ-साथ स्वर्गपर विजय पायी है, इसलिये इस समय सबको वहाँ चलना चाहिये। देवलोकका यह रजोहीन सात्त्विक मार्ग हमें स्पष्ट दिखायी दे रहा है॥१६॥ | | शौनक उवाच<br>तेऽभिरुह्य रथं सर्वे प्रयाता नृपते नृपाः।<br>आक्रमन्तो दिवं भान्ति धर्मेणावृत्य रोदसी॥ १७ | शौनकजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर वे सभी नृपश्रेष्ठ उन दिव्य रथोंपर आरूढ़ हो धर्मके बलसे स्वर्गमें पहुँचनेके लिये चल दिये। उस समय पृथ्वी और आकाशमें उनकी प्रभा व्याप्त हो रही थी॥ १७॥ | | अष्टक उवाच<br>अहं मन्ये पूर्वमेकोऽभिगन्ता<br>सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा।<br>कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय-<br>मेकोऽत्ययात् सर्ववेगेन वाहन्॥ १८ | अष्टक बोले—राजन्! महात्मा इन्द्र मेरे बड़े मित्र हैं, अतः मैं तो समझता था कि अकेला मैं ही सबसे पहले उनके पास पहुँचूँगा; परंतु ये उशीनर-पुत्र शिबि अकेले सम्पूर्ण वेगसे हम सबके वाहनोंको लाँघकर आगे बढ़ गये हैं, ऐसा कैसे हुआ?॥१८॥ | | ययातिरुवाच<br>अददाद् देवयानाय यावद् वित्तमनिन्दितः।<br>उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठो हि वः शिबिः॥ १९<br>दानं शौचं सत्यमथो ह्यहिंसा<br>ह्रीः श्रीस्तितिक्षा समताऽऽनृशंस्यम्।<br>राजन्य्नेतान्यथ सर्वाणि राज्ञि<br>शिबौ स्थितान्यप्रतिमेषु बुद्ध्या।<br>एवं वृत्तं ह्रीनिषेवी बिभर्ति<br>तस्माच्छिबिरभिगन्ता रथेन॥ २० | ययातिने कहा—राजन्! उशीनरके पुत्र शिबिने ब्रह्मलोकके मार्गकी प्राप्तिके लिये अपना सर्वस्व दान कर दिया था, इसलिये ये तुमलोगोंमें श्रेष्ठ हैं। नरेश्वर! दान, पवित्रता, सत्य, अहिंसा, ह्री, श्री, क्षमा, समता और दयालुता—ये सभी अनुपम गुण राजा शिबिमें विद्यमान हैं तथा बुद्धिमें भी उनकी समता करनेवाला कोई नहीं है। राजा शिबि ऐसे सदाचारसम्पन्न और लज्जाशील हैं। (इनमें अभिमानकी मात्रा छू भी नहीं गयी है।) इसीलिये शिबि रथारूढ़ हो हम सबसे आगे बढ़ गये हैं॥१९-२०॥ | | शौनक उवाच<br>अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ-<br>न्मातामहं कौतुकादिन्द्रकल्पम्।<br>पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं<br>कुतश्च कश्चासि कथं त्वमागाः।<br>कृतं त्वया यद्वि न तस्य कर्ता<br>लोके त्वदन्यो ब्राह्मणः क्षत्रियो वा॥ २१ | शौनकजी कहते हैं—शतानीक! तदनन्तर अष्टकने कौतूहलवश इन्द्रतुल्य अपने नाना राजा ययातिसे पुनः प्रश्न किया—'महाराज! मैं आपसे एक बात पूछता हूँ। आप उसे सच-सच बताइये। आप कहाँसे आये हैं, कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने जो कुछ किया है, उसे करनेवाला आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय अथवा ब्राह्मण इस संसारमें नहीं है'॥२१॥ |