भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 159
* अध्याय ४२ *१४९
Sanskrit ShlokaHindi Meaning
ययातिरुवाच<br>ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः<br>पूरोः पिता सार्वभौमस्त्विहासम्।<br>गुह्यं मन्त्रं मामकेभ्यो ब्रवीमि<br>मातामहो भवतां सुप्रकाशः॥ २२<br>सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय<br>ऋद्धां महीमददां ब्राह्मणेभ्यः।<br>मेध्यानश्वान् नैकशस्तान् सुरूपां-<br>स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति॥ २३<br>अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः<br>पूर्णांमिमामखिलान्नैः प्रशस्ताम्।<br>गोभिः सुवर्णैश्च धनैश्च मुख्यै-<br>रश्वाः सनागाः शतशस्त्वर्बुदानि॥ २४<br>सत्येन मे द्यौश्च वसुंधरा च<br>तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु।<br>न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं<br>सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति॥ २५<br>साध्वष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं<br>प्रतर्दनं वसुमन्तं शिबिं च।<br>सर्वे देवा मुनयश्च लोकाः<br>सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम्॥ २६<br>यो नः स्वर्गजितं सर्वं यथावृत्तं निवेदयेत्।<br>अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स भोजेन्नः सलोकताम्॥ २७ययातिने कहा— मैं नहुषका पुत्र और पूरुका पिता राजा ययाति हूँ। मैं इस लोकमें चक्रवर्ती नरेश था। तुम सब लोग मेरे अपने हो, अतः तुमसे गुप्त बात भी खोलकर बतलाये देता हूँ। मैं तुमलोगोंका नाना हूँ। (यद्यपि पहले भी यह बात बता चुका हूँ, तथापि पुनः स्पष्ट कर देता हूँ।) मैंने इस सारी पृथ्वीको जीत लिया था और पुनः इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीको ब्राह्मणोंको दान भी कर दिया था। मनुष्य जब एक सौ सुन्दर पवित्र अश्वोंका दान करते हैं तब वे पुण्यात्मा देवता होते हैं। मैंने सब तरहके अन्न, गौ, सुवर्ण तथा उत्तम धनसे परिपूर्ण यह प्रशस्त पृथ्वी ब्राह्मणोंको दान कर दी थी एवं सौ अर्बुद (दस अरब) हाथियोंसहित घोड़ोंका दान भी किया था। सत्यसे ही पृथ्वी और आकाश टिके हुए हैं। इसी प्रकार सत्यसे ही मनुष्य-लोकमें अग्नि प्रज्वलित होती है। मैंने कभी व्यर्थ बात मुँहसे नहीं निकाली है; क्योंकि साधु पुरुष सदा सत्यका ही आदर करते हैं। अष्टक! मैं तुमसे, प्रतर्दनसे, वसुमान्‌से और शिबिसे भी यहाँ जो कुछ कहता हूँ, वह सब सत्य ही है। मेरे मनका यह विश्वास है कि समस्त लोक, मुनि और देवता सत्यसे ही पूजनीय होते हैं। जो मनुष्य हृदयमें ईर्ष्या न रखकर स्वर्गपर अधिकार करनेवाले हम सब लोगोंके इस वृत्तान्तको यथार्थरूपसे श्रेष्ठ द्विजोंके सामने सुनायेगा, वह हमारे ही समान पुण्यलोकोंको प्राप्त कर लेगा॥ २२—२७॥
शौनक उवाच<br>एवं राजन् स महात्मा ययातिः<br>स्वदौहित्रैस्तारितो मित्रवर्यैः।<br>त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा<br>स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम्॥ २८<br>एवं सर्वं विस्तरतो यथाव-<br>दाख्यातं ते चरितं नाहुषस्य।<br>वंशो यस्य प्रथितः पौरवेयो<br>यस्मिञ्जातस्त्वं मनुजेन्द्रकल्पः॥ २९शौनकजी कहते हैं— राजन्! राजा ययाति बड़े महात्मा थे और उनके कर्म अत्यन्त उदार थे। उनके श्रेष्ठ मित्ररूपी दौहित्रोंने उनका उद्धार किया और वे सत्कर्मोंद्वारा सम्पूर्ण भूमण्डलको व्याप्त करके पृथ्वीको छोड़कर स्वर्गलोकमें चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे नहुष-पुत्र राजा ययातिका सारा चरित्र यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक कह सुनाया। यही वंश आगे चलकर पूरुवंशके नामसे विख्यात हुआ, जिसमें तुम मनुष्योंमें इन्द्रके समान उत्पन्न हुए हो॥ २८-२९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते द्विचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें ययाति-चरित-वर्णन-विषयक बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४२॥