भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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१५० * मत्स्यपुराण *


तैंतालीसवाँ अध्याय

ययाति-वंश-वर्णन, यदुवंशका वृत्तान्त तथा कार्तवीर्य अर्जुनकी कथा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>इत्येतच्छौनकाद् राजा शतानीको निशम्य तु।<br>विस्मितः परया प्रीत्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ॥ १<br>पूजयामास नृपतिर्विधिवच्चाथ शौनकम्।<br>रत्नैर्गोभिः सुवर्णैश्च वासोभिर्विविधैस्तथा॥ २<br>प्रतिगृह्य ततः सर्वं यद् राज्ञा प्रहितं धनम्।<br>दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च शौनकोऽन्तरधीयत॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! राजा शतानीक महर्षि शौनकसे यह सारा वृत्तान्त सुनकर विस्मयाविष्ट हो गये तथा उत्कृष्ट प्रेमके कारण उनका चेहरा पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति खिल उठा। तदनन्तर राजाने अनेक प्रकारके रत्न, गौ, सुवर्ण और वस्त्रोंद्वारा महर्षि शौनककी विधिपूर्वक पूजा की। शौनकजीने राजाद्वारा दिये गये उस सारे धनको ग्रहण करके पुनः उसे ब्राह्मणोंको दान कर दिया और स्वयं वहीं अन्तर्हित हो गये॥ १—३॥
ऋषय ऊचुः<br>ययातेर्वंशमिच्छामः श्रोतुं विस्तरतो वद।<br>यदुप्रभृतिभिः पुत्रैर्यदा लोके प्रतिष्ठितम्॥ ४**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! अब हमलोग ययातिके वंशका वर्णन सुनना चाहते हैं। जब उनके यदु आदि पुत्र लोकमें प्रतिष्ठित हुए तब फिर आगे चलकर क्या हुआ? इसे विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ ४॥
सूत उवाच<br>यदोर्वंशं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः।<br>विस्तरेणानुपूर्व्या च गदतो मे निबोधत॥ ५<br>यदोः पुत्रा बभूवुर्हि पञ्च देवसुतोपमाः।<br>महारथा महेष्वासा नामतस्तान् निबोधत॥ ६<br>सहस्रजिरथो ज्येष्ठः क्रोष्टुर्नीलोऽन्तिको लघुः।<br>सहस्रजेस्तु दायादः शतजिर्नाम पार्थिवः॥ ७<br>शतजेरपि दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>हैहयश्च हयश्चैव तथा वेणुहयश्च यः॥ ८<br>हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्रः प्रतिश्रुतः।<br>धर्मनेत्रस्य कुन्तिस्तु संहतस्तस्य चात्मजः॥ ९<br>संहतस्य तु दायादो महिष्मान् नाम पार्थिवः।<br>आसीन्महिष्मतः पुत्रो रुद्रश्रेण्यः प्रतापवान्॥ १०<br>वाराणस्यामभूद् राजा कथितं पूर्वमेव तु।<br>रुद्रश्रेण्यस्य पुत्रोऽभूद् दुर्दमो नाम पार्थिवः॥ ११<br>दुर्दमस्य सुतो धीमान् कनको नाम वीर्यवान्।<br>कनकस्य तु दायादाश्चत्वारो लोकविश्रुताः॥ १२<br>कृतवीर्यः कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैव च।<br>कृतौजाश्च चतुर्थोऽभूत् कृतवीर्यात् ततोऽर्जुनः॥ १३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अब मैं ययातिके ज्येष्ठ पुत्र परम तेजस्वी यदुके वंशका क्रमसे एवं विस्तारपूर्वक* वर्णन कर रहा हूँ, आपलोग मेरे कथनानुसार उसे ध्यानपूर्वक सुनिये। यदुके पाँच पुत्र हुए जो सभी देवपुत्र-सदृश तेजस्वी, महारथी और महान् धनुर्धर थे। उन्हें नामनिर्देशानुसार यों जानिये—उनमें ज्येष्ठका नाम सहस्रजि था, शेष चारोंका नाम क्रमशः क्रोष्टु, नील, अन्तिक और लघु था। सहस्रजिका पुत्र राजा शतजि हुआ। शतजिके हैहय, हय और वेणुहय नामक परम यशस्वी तीन पुत्र हुए। हैहयका विश्वविख्यात पुत्र धर्मनेत्र हुआ। धर्मनेत्रका पुत्र कुन्ति और उसका पुत्र संहत हुआ। संहतका पुत्र राजा महिष्मान् हुआ। महिष्मान्‌का पुत्र प्रतापी रुद्रश्रेण्य था, जो वाराणसी नगरीका राजा हुआ। इसका वृत्तान्त पहले ही कहा जा चुका है। रुद्रश्रेण्यका पुत्र दुर्दम नामका राजा हुआ। दुर्दमका पुत्र परम बुद्धिमान् एवं पराक्रमी कनक था। कनकके चार विश्वविख्यात पुत्र हुए, जिनके नाम हैं—कृतवीर्य, कृताग्नि, कृतवर्मा और चौथा कृतौजा। इनमें कृतवीर्यसे अर्जुनका जन्म हुआ,

* यह वर्णन भागवत ९। २३। १९ से २४। ६७ तक तथा वायु, ब्रह्माण्ड, विष्णु, मार्कण्डेय आदि पुराणोंमें भी मिलता है।