मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४३ * | १५१ |
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| श्लोक | अर्थ |
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| जातः करसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः।<br>वर्षायुतं तपस्तेपे दुष्करं पृथिवीपतिः॥ १४<br><br>दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम्।<br>तस्मै दत्ता वरास्तेन चत्वारः पुरुषोत्तमः॥ १५<br><br>पूर्वं बाहुसहस्रं तु स वव्रे राजसत्तमः।<br>अधर्मं चरमाणस्य सद्भिborder/श्चापि निवारणम्॥ १६<br><br>युद्धेन पृथिवीं जित्वा धर्मेणैवानुपालनम्।<br>संग्रामे वर्तमानस्य वधश्चैवाधिकाद् भवेत्॥ १७ | जो सहस्र भुजाधारी (होनेके कारण सहस्रार्जुन नामसे प्रसिद्ध था) तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर था। पुरुषश्रेष्ठ कृतवीर्यनन्दन राजा सहस्रार्जुनने दस हजार वर्षोंतक घोर तपस्या करते हुए महर्षि अत्रिके पुत्र दत्तात्रेयकी आराधना की। उससे प्रसन्न होकर दत्तात्रेयने उसे चार वर प्रदान किये। उनमें प्रथम वरके रूपमें राजश्रेष्ठ अर्जुनने अपने लिये एक हजार भुजाएँ माँगीं। दूसरे वरसे सत्पुरुषोंके साथ अधर्म करनेवालोंके निवारणका अधिकार माँगा। तीसरे वरसे युद्धद्वारा सारी पृथ्वीको जीतकर धर्मानुसार उसका पालन करना था और चौथा वर यह माँगा कि रणभूमिमें युद्ध करते समय मुझसे अधिक बलवान्के हाथों मेरा वध हो॥ ५—१७॥ |
| तेनेयं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>समोदधिपरिक्षिप्ता क्षात्रेण विधिना जिता॥ १८<br><br>जज्ञे बाहुसहस्रं वै इच्छतस्तस्य धीमतः।<br>रथो ध्वजश्च सञ्जज्ञे इत्येवमनुशुश्रुमः॥ १९<br><br>दशयज्ञसहस्राणि राज्ञा द्वीपेषु वै तदा।<br>निरर्गलानि वृत्तानि श्रूयन्ते तस्य धीमतः॥ २०<br><br>सर्वे यज्ञा महाराजस्तस्यासन् भूरिदक्षिणाः।<br>सर्वे काञ्चनयूपास्ते सर्वाः काञ्चनवेदिकाः॥ २१<br><br>सर्वे देवैः समं प्राप्तैर्विमानस्थैरलङ्कृताः।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिताः॥ २२<br><br>तस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस्तथा।<br>कार्तवीर्यस्य राजर्षेर्महिमानं निरीक्ष्य सः॥ २३<br><br>न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः।<br>यज्ञैर्दानैस्तपोभिश्च विक्रमेण श्रुतेन च॥ २४<br><br>स हि सप्तसु द्वीपेषु खड्गी चक्री शरासनी।<br>रथी द्वीपान्यनुचरन् योगी पश्यति तस्करान्॥ २५<br><br>पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां स नराधिपः।<br>स सर्वरत्नसम्पूर्णश्चक्रवर्ती बभूव ह॥ २६<br><br>स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपालः स एव हि।<br>स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वादर्जुनोऽभवत्॥ २७<br><br>योऽसौ बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा।<br>भाति रश्मिसहस्रेण शारदेनैव भास्करः॥ २८ | उस वरदानके प्रभावसे कार्तवीर्य अर्जुनने क्षात्र-धर्मानुसार सातों समुद्रोंसे परिवेष्टित पर्वतोंसहित सातों द्वीपोंकी समग्र पृथ्वीको जीत लिया; क्योंकि उस बुद्धिमान् अर्जुनके इच्छा करते ही एक हजार भुजाएँ निकल आयीं तथा उसी प्रकार रथ और ध्वज भी प्रकट हो गये—ऐसा हमलोगोंके सुननेमें आया है। साथ ही उस बुद्धिमान् अर्जुनके विषयमें यह भी सुना जाता है कि उसने सातों द्वीपोंमें दस सहस्र यज्ञोंका अनुष्ठान निर्विघ्नतापूर्वक सम्पन्न किया था। उस राजराजेश्वरके सभी यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणाएँ बाँटी गयी थीं। उनमें गड़े हुए यूप (यज्ञस्तम्भ) स्वर्णनिर्मित थे। सभी वेदिकाएँ सुवर्णकी बनी हुई थीं। वे सभी यज्ञ अपना-अपना भाग लेनेके लिये आये हुए विमानारूढ़ देवोंद्वारा सुशोभित थे। गन्धर्व और अप्सराएँ भी नित्य आकर उनकी शोभा बढ़ाती थीं। राजर्षि कार्तवीर्यके महत्त्वको देखकर नारदनामक गन्धर्वने उनके यज्ञमें ऐसी गाथा गायी थी—'भावी क्षत्रिय नरेश निश्चय ही यज्ञ, दान, तप, पराक्रम और शास्त्रज्ञानके द्वारा कार्तवीर्यकी समकक्षताको नहीं प्राप्त होंगे।' योगी अर्जुन रथपर आरूढ़ हो हाथमें खड्ग, चक्र और धनुष धारण करके सातों द्वीपोंमें भ्रमण करता हुआ चोरों-डाकुओंपर कड़ी दृष्टि रखता था। राजा अर्जुन पचासी हजार वर्षोंतक भूतलपर शासन करके समस्त रत्नोंसे परिपूर्ण हो चक्रवर्ती सम्राट् बना रहा। राजा अर्जुन ही अपने योगबलसे पशुओंका पालक था, वही खेतोंका भी रक्षक था और वही समयानुसार मेघ बनकर वृष्टि भी करता था। प्रत्यञ्चाके आघातसे कठोर हुई त्वचाओंवाली अपनी सहस्रों भुजाओंसे वह उसी प्रकार शोभा पाता था, जिस प्रकार सहस्रों किरणोंसे युक्त शारदीय सूर्य शोभित होते हैं॥ १८–२८॥ |