मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१५२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एष नागं मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः।<br>कर्कोटकसुतं जित्वा पुर्यां तत्र न्यवेशयत्॥ २९ | मनुष्योंमें महान् तेजस्वी अर्जुनने कर्कोटक नागके पुत्रको जीतकर अपनी माहिष्मती पुरीमें बाँध रखा था। |
| एष वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले भजेत वै।<br>क्रीडन्नेव सुखोद्विग्नः प्रतिस्रोतो महीपतिः॥ ३० | भूपाल अर्जुन वर्षा-ऋतुमें प्रवाहके सम्मुख सुखपूर्वक क्रीडा करते हुए ही समुद्रके वेगको रोक देता था। |
| ललनाः क्रीडता तेन प्रतिस्रग्दाममालिनीः।<br>ऊर्मिभ्रुकुटिसंत्रासाच्चकिताभ्येति नर्मदा॥ ३१ | ललनाओंके साथ जलविहार करते समय उसके गलेसे टूटकर गिरी हुई मालाओंको धारण करनेवाली तथा लहररूपी भ्रुकुटियोंके व्याजसे भयभीत-सी हुई नर्मदा चकित होकर उसके निकट आ जाती थी। |
| एको बाहुसहस्रेण वगाहे स महार्णवः।<br>करोत्युद्वृत्तवेगां तु नर्मदां प्रावृडुद्धताम्॥ ३२ | वह अकेला ही अपनी सहस्र भुजाओंसे अगाध समुद्रको विलोडित कर देता था एवं वर्षाकालमें वेगसे बहती हुई नर्मदाको और भी उद्धत वेगवाली बना देता था। |
| तस्य बाहुसहस्रेण क्षोभ्यमाणे महोदधौ।<br>भवन्त्यतीव निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः॥ ३३ | उसकी हजारों भुजाओं द्वारा विलोडन करनेसे महासागरके क्षुब्ध हो जानेपर पातालनिवासी बड़े-बड़े असुर अत्यन्त निश्चेष्ट हो जाते थे। |
| चूर्णीकृतमहावीचिलीनमीनमहातिमिम् ।<br>मारुताविद्धफेनौघमावर्ताक्षिप्तदुःसहम् ॥ ३४<br><br>करोत्यालोडयन्नेव दोःसहस्रेण सागरम्।<br>मन्दरक्षोभचकिता ह्यमृतोत्पादशङ्किताः॥ ३५<br><br>तदा निश्चलमूर्धानो भवन्ति च महोरगाः।<br>सायाह्ने कदलीखण्डा निर्वातस्तिमिता इव॥ ३६ | अपनी सहस्र भुजाओंसे महासागरका विलोडन करते समय वह समुद्रकी उठती हुई विशाल लहरोंके मध्य आयी हुई मछलियों और बड़े-बड़े तिमिङ्गिलोंके चूर्णसे उसे व्याप्त कर देता था तथा वायुके झकोरेसे उठे हुए फेनसमूहसे फेनिल और भँवरोंके चपेटसे दुःसह बना देता था। उस समय पूर्वकालमें मन्दराचलके मन्थनके विक्षोभसे चकित एवं पुनः अमृतोत्पादनकी आशङ्कासे सशङ्कित-से हुए बड़े-बड़े नागोंके मस्तक इस प्रकार निश्चल हो जाते थे, जैसे सायंकाल वायुके स्थगित हो जानेपर केलेके पत्ते प्रशान्त हो जाते हैं। |
| एवं बद्ध्वा धनुर्ज्यायामुत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः।<br>लङ्कायां मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात्॥ ३७<br><br>निर्जित्य बद्ध्वा चानीय माहिष्मत्यां बबन्ध च।<br>ततो गत्वा पुलस्त्यस्तु ह्यर्जुनः सम्प्रसादयत्॥ ३८ | इसी प्रकार अर्जुनने एक बार लंकामें जाकर अपने पाँच बाणोंद्वारा सेनासहित रावणको मोहित कर दिया और उसे बलपूर्वक जीतकर अपने धनुषकी प्रत्यञ्चामें बाँध लिया, फिर माहिष्मती पुरीमें लाकर उसे बंदी बना लिया। यह सुनकर महर्षि पुलस्त्यने माहिष्मतीपुरीमें जाकर अर्जुनको अनेकों प्रकारसे समझा-बुझाकर प्रसन्न किया। |
| मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनेह सान्वितम्।<br>तस्य बाहुसहस्रेण बभूव ज्यातलस्वनः॥ ३९ | तब अर्जुनने महर्षि पुलस्त्यद्वारा सान्त्वना दिये जानेपर उस पुलस्त्य-पौत्र राक्षसराज रावणको बन्धनमुक्त कर दिया। |
| युगान्ताभ्रसहस्रस्य आस्फोटस्त्वशनेरिव।<br>अहो बत विधेर्वीर्यं भार्गवोऽयं यदाच्छिनत्॥ ४०<br><br>तद् वै सहस्रं बाहूनां हेमतालवनं यथा।<br>यत्रापवस्तु संक्रुद्धो ह्यर्जुनं शप्तवान् प्रभुः॥ ४१ | उसकी हजारों भुजाओं द्वारा धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचनेपर ऐसा भयंकर शब्द होता था, मानो प्रलयकालीन सहस्रों बादलोंकी घटाके मध्य वज्रकी गड़गड़ाहट हो रही हो; परंतु विधिको पराक्रम धन्य है जो भृगुकुलोत्पन्न परशुरामजीने उसकी हजारों भुजाओंको हेमतालके वनकी भाँति काटकर छिन्न-भिन्न कर दिया। इसका कारण यह है कि एक बार सामर्थ्यशाली महर्षि आपव* (वसिष्ठ)-ने क्रुद्ध होकर अर्जुनको शाप देते हुए कहा था— |
| यस्माद् वनं प्रदग्धं वै विश्रुतं मम हैहय।<br>तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतमन्यो हरिष्यति॥ ४२ | 'हैहय! चूँकि तुमने मेरे लोकप्रसिद्ध वनको जलाकर भस्म कर दिया है, इसलिये तुम्हारे द्वारा किये गये इस दुष्कर कर्मका फल कोई दूसरा |
* आप शब्द वरुणका वाचक है। उनके पुत्र मैत्रावरुणिके होनेसे यहाँ महर्षि वसिष्ठ ही महाभारत, हरिवंश, देवीभागवत तथा उसके व्याख्याताओंके अनुसार 'आपव' नामसे निर्दिष्ट हैं।