भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 163
* अध्याय ४३ *१५३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
च्छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रथमं तरसा बली।<br>तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वां स वधिष्यति भार्गवः॥ ४३हरण कर लेगा। भृगुकुलमें उत्पन्न एक तपस्वी एवं बलवान् ब्राह्मण पहले तुम्हारी सहस्रों भुजाओंको काटकर फिर तुम्हारा वध कर देगा'॥ २९—४३॥
सूत उवाच<br>तस्य रामस्तदा त्वासीन्र्मृत्युः शापेन धीमतः।<br>वरश्चैवं तु राजर्षेः स्वयमेव वृतः पुरा॥ ४४<br>तस्य पुत्रशतं त्वासीत् पञ्च तत्र महारथाः।<br>कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो महाबलाः॥ ४५<br>शूरसेनश्च शूरश्च धृष्टः क्रोष्टुस्तथैव च।<br>जयध्वजश्च वैकर्ता अवन्तिश्च विशांपते॥ ४६<br>जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजङ्घो महाबलः।<br>तस्य पुत्रशतान्येव तालजङ्घा इति श्रुताः॥ ४७<br>तेषां पञ्च कुलाः ख्याता हैहयानां महात्मनाम्।<br>वीतिहोत्राश्च शार्याता भोजाश्चावन्तयस्तथा॥ ४८<br>कुण्डिकेराश्च विक्रान्तास्तालजङ्घास्तथैव च।<br>वीतिहोत्रसुतश्चापि आनर्तो नाम वीर्यवान्।<br>दुर्जयस्तस्य पुत्रस्तु बभूवामित्रकर्शनः॥ ४९<br>सद्भावेन महाप्राज्ञः प्रजा धर्मेण पालयन्।<br>कार्तवीर्यार्जुनो नाम राजा बाहुसहस्रवान्॥ ५०<br>येन सागरपर्यन्ता धनुषा निर्जिता मही।<br>यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानवः॥ ५१<br>न तस्य वित्तनाशः स्यान्नष्टं च लभते पुनः।<br>कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेदिह धीमतः।<br>यथावत् स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महीयते॥ ५२**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! इस प्रकार उस शापके कारण परशुरामजी उसकी मृत्युके कारण तो अवश्य हुए, परंतु पूर्वकालमें उस राजर्षिने स्वयं ही ऐसे वरका वरण किया था। राजन्! सहस्रार्जुनके पुत्र तो एक सौ हुए, परंतु उनमें पाँच महारथी थे। उनके अतिरिक्त शूरसेन, शूर, धृष्ट, क्रोष्टु, जयध्वज, वैकर्ता और अवन्ति—ये सातों अस्त्रविद्यामें निपुण, बलवान्, शूरवीर, धर्मात्मा और महान् पराक्रमशाली थे। जयध्वजका पुत्र महाबली तालजङ्घ हुआ। उसके एक सौ पुत्र हुए जो तालजङ्घके नामसे विख्यात हुए। हैहयवंशी इन महात्मा नरेशोंका कुल विभक्त होकर पाँच भागोंमें विख्यात हुआ। उनके नाम हैं—वीतिहोत्र, शार्यात, भोज, आवन्ति तथा पराक्रमी कुण्डिकेर। ये ही तालजङ्घके भी नामसे प्रसिद्ध थे। वीतिहोत्रका पुत्र प्रतापी आनर्त (गुजरातका शासक) हुआ। उसका पुत्र दुर्जय हुआ जो शत्रुओंका विनाशक था। अमित बुद्धिसम्पन्न एवं सहस्रभुजाधारी कृत्तवीर्य-नन्दन राजा अर्जुन सद्भावना एवं धर्मपूर्वक प्रजाओंका पालन करता था। उसने अपने धनुषके बलसे सागरपर्यन्त पृथ्वीपर विजय पायी थी। जो मानव प्रातःकाल उठकर उसका नाम स्मरण करता है उसके धनका नाश नहीं होता और यदि नष्ट हो गया है तो पुनः प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य कार्तवीर्य अर्जुनके जन्म-वृत्तान्तको कहता है उसका आत्मा यथार्थरूपसे पवित्र हो जाता है और वह स्वर्गलोकमें प्रशंसित होता है॥ ४४—५२॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे सहस्रार्जुनचरिते त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४३॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें सहस्रार्जुनचरित नामक तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४३॥