मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१५४ * मत्स्यपुराण *
चौवालीसवाँ अध्याय
कार्तवीर्यका आदित्यके तेजसे सम्पन्न होकर वृक्षोंको जलाना, महर्षि आपवद्वारा कार्तवीर्यको शाप और क्रोष्टुके वंशका वर्णन
| ऋषय ऊचुः<br>किमर्थं तद् वनं दग्धमापवस्य महात्मनः।<br>कार्तवीर्येण विक्रम्य सूत प्रब्रूहि तत्त्वतः॥ १<br>रक्षिता स तु राजर्षिः प्रजानामिति नः श्रुतम्।<br>स कथं रक्षिता भूत्वा अदहत् तत् तपोवनम्॥ २ | ऋषियोंने पूछा—सूतजी! कार्तवीर्यने बलपूर्वक महात्मा आपवके उस वनको किस कारण जलाया था? अभी-अभी हम लोगोंने सुना है कि वे राजर्षि कार्तवीर्य प्रजाओंके रक्षक थे तो फिर रक्षक होकर उन्होंने महर्षिके तपोवनको कैसे जला दिया?॥ १-२॥ |
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| सूत उवाच<br>आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः।<br>तृप्तिमेकां प्रयच्छस्व आदित्योऽहं नरेश्वर॥ ३ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! एक बार सूर्य* ब्राह्मणका रूप धारण करके कार्तवीर्यके निकट पहुँचे और कहने लगे—'नरेश्वर! मैं सूर्य हूँ, आप मुझे एक बार तृप्ति प्रदान कीजिये'॥ ३॥ |
| राजोवाच<br>भगवन् केन तृप्तिस्ते भवत्येव दिवाकर।<br>कीदृशं भोजनं दद्मि श्रुत्वा तु विदधाम्यहम्॥ ४ | राजाने पूछा—भगवन्! किस पदार्थसे आपकी तृप्ति होगी? दिवाकर! मैं आपको किस प्रकारका भोजन प्रदान करूँ? आपकी बात सुनकर मैं उसी प्रकारका विधान करूँगा॥ ४॥ |
| आदित्य उवाच<br>स्थावरं देहि मे सर्वमाहारं ददतां वर।<br>तेन तृप्तो भवेयं वै सा मे तृप्तिर्हि पार्थिव॥ ५ | सूर्य बोले—दानिशिरोमणे! मुझे समस्त स्थावर अर्थात् वृक्ष आदिको आहाररूपमें प्रदान कीजिये। मैं उसीसे तृप्त होऊँगा। राजन्! वही मेरे लिये सर्वश्रेष्ठ तृप्ति होगी॥ ५॥ |
| कार्तवीर्य उवाच<br>न शक्याः स्थावराः सर्वे तेजसा च बलेन च।<br>निर्दग्धुं तपतां श्रेष्ठ तेन त्वां प्रणमाम्यहम्॥ ६ | कार्तवीर्यने कहा—तेजस्वियोंमें श्रेष्ठ सूर्य! ये समस्त वृक्ष मेरे तेज और बलद्वारा जलाये नहीं जा सकते; अतः मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ६॥ |
| आदित्य उवाच<br>तुष्टस्तेऽहं शरान् दद्मि अक्षयान् सर्वतोमुखान्।<br>ये प्रक्षिप्ता ज्वलिष्यन्ति मम तेजः समन्विताः॥ ७<br>आविष्टा मम तेजोभिः शोषयिष्यन्ति स्थावरान्।<br>शुष्कान् भस्मीकरिष्यन्ति तेन तृप्तिर्नराधिप॥ ८ | सूर्य बोले—नरेश्वर! मैं आपपर प्रसन्न हूँ, इसलिये मैं आपको ऐसे अक्षय एवं सर्वतोमुखी बाण दे रहा हूँ, जो मेरे तेजसे युक्त होनेके कारण चलाये जानेपर स्वयं जल उठेंगे और मेरे तेजसे परिपूर्ण हुए वे सारे वृक्षोंको सुखा देंगे; फिर सूख जानेपर उन्हें जलाकर भस्म कर देंगे। उससे मेरी तृप्ति हो जायगी॥ ७-८॥ |
| सूत उवाच<br>ततः शरांस्तदादित्यस्त्वर्जुनाय प्रयच्छत।<br>ततो ददाह सम्प्राप्तान् स्थावरान् सर्वमेव च॥ ९<br>ग्रामांस्तथाऽऽश्रमांश्चैव घोषाणि नगराणि च।<br>तपोवनानि रम्याणि वनान्युपवनानि च॥ १०<br>एवं प्राचीनमन्वदहं ततः सर्वां सदक्षिणाम्।<br>निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर्हता घोरेण तेजसा॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर सूर्यने कार्तवीर्य अर्जुनको अपने बाण प्रदान कर दिये। तब अर्जुनने सम्मुख आये हुए समस्त वृक्षों, ग्रामों, आश्रमों, घोषों, नगरों, तपोवनों तथा रमणीय वनों एवं उपवनोंको जलाकर राखका ढेर बना दिया। इस प्रकार पूर्व दिशाको जलाकर फिर समूची दक्षिण दिशाको भी भस्म कर दिया। उस भयंकर तेजसे पृथ्वी वृक्षों एवं तृणोंसे रहित होकर नष्ट- |
* यहाँ आदित्य सूर्य हैं, पर हरिवंशपु० १।३३ आदिके अनुसार अग्निदेव ही ब्राह्मणवेषमें आये थे।