भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ४४ * १५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एतस्मिन्नेव काले तु आपवो जलमास्थितः।<br>दशवर्षसहस्राणि तत्रास्ते स महान् ऋषिः॥ १२<br><br>पूर्णे व्रते महातेजा उदतिष्ठत्तपोधनः।<br>सोऽपश्यदाश्रमं दग्धमर्जुनेन महामुनिः॥ १३भ्रष्ट हो गयी। उसी समय महर्षि आपव जो महान् तेजस्वी और तपस्याके धनी थे, दस हजार वर्षोंसे जलके भीतर बैठकर तप कर रहे थे, व्रत पूर्ण होनेपर बाहर निकले तो उन महामुनिने अर्जुनद्वारा अपने आश्रमको जलाया हुआ देखा। तब उन्होंने क्रुद्ध होकर राजर्षि अर्जुनको उक्त शाप दे दिया, जैसा कि मैंने अभी आप लोगोंको बतलाया है॥ ९–१३ १/२॥
क्रोधाच्छाप राजर्षि कीर्तितं वो यथा मया।<br>क्रोष्टोः शृणुत राजर्षेर्वंशमुत्तमपौरुषम्॥ १४<br>यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णुर्वृष्णिकुलोद्वहः।ऋषियो! (अब) आपलोग राजर्षि क्रोष्टुके उस उत्तम बल-पौरुषसे सम्पन्न वंशका वर्णन सुनिये, जिस वंशमें वृष्णिवंशावतंस भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) अवतीर्ण हुए थे।
क्रोष्टोरेवाभवत् पुत्रो वृजिनीवान् महारथः॥ १५क्रोष्टुका पुत्र महारथी वृजिनीवान् हुए।
वृजिनीवतश्च पुत्रोऽभूत् स्वाहो नाम महाबलः।<br>स्वाहुपुत्रोऽभवद् राजन् रुषङ्गुर्वदतां वरः॥ १६वृजिनीवान्‌के स्वाह (पद्मपुराणमें स्वाति) नामक महाबली पुत्र उत्पन्न हुआ। राजन्! वक्ताओंमें श्रेष्ठ रुषङ्गु स्वाहके पुत्ररूपमें पैदा हुए।
स तु प्रसूतिमिच्छन् वै रुषङ्गुः सौम्यमात्मजम्।<br>चित्रश्वित्ररथश्चास्य पुत्रः कर्मभिरन्वितः॥ १७रुषङ्गुने संतानकी इच्छासे सौम्य स्वभाववाले पुत्रकी कामना की। तब उनके सत्कर्मोंसे समन्वित एवं चित्र-विचित्र रथसे युक्त चित्ररथ नामक पुत्र हुआ।
अथ चैत्ररथिर्वीरो जज्ञे विपुलदक्षिणः।<br>शशबिन्दुरिति ख्यातश्चक्रवर्ती बभूव ह॥ १८चित्ररथके एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ जो शशबिन्दु नामसे विख्यात था। वह आगे चलकर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। वह यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाला था।
अत्रानुवंशश्लोकोऽयं गीतस्तस्मिन् पुरावभवत्।<br>शशबिन्दोस्तु पुत्राणां शतानामभवच्छतम्॥ १९पूर्वकालमें इस शशबिन्दुके विषयमें वंशानुक्रमणिकारूप यह श्लोक गाया जाता रहा है कि शशबिन्दुके सौ पुत्र हुए।
धीमतां चाभिरूपाणां भूरिद्रविणतेजसाम्।<br>तेषां शतप्रधानानां पृथुसाह्ना महाबलाः॥ २०उनमें भी प्रत्येकके सौ-सौ पुत्र हुए। वे सभी प्रचुर धन-सम्पत्ति एवं तेजसे परिपूर्ण, सौन्दर्यशाली एवं बुद्धिमान् थे। उन पुत्रोंके नामके अग्रभागमें 'पृथु' शब्दसे संयुक्त छः महाबली पुत्र हुए।
पृथुश्रवाः पृथुयशाः पृथुधर्मा पृथुञ्जयः।<br>पृथुकीर्तिः पृथुमना राजानः शशबिन्दवः॥ २१उनके पूरे नाम इस प्रकार हैं—पृथुश्रवा, पृथुयशा, पृथुधर्मा, पृथुंजय, पृथुकीर्ति और पृथुमना। ये शशबिन्दुके वंशमें उत्पन्न हुए राजा थे।
शंसन्ति च पुराणज्ञाः पृथुश्रवसमुत्तमम्।<br>अन्तरस्य सुयज्ञस्य सुयज्ञस्तनयोऽभवत्॥ २२पुराणोंके ज्ञाता विद्वान्‌लोग इनमें सबसे ज्येष्ठ पृथुश्रवाकी विशेष प्रशंसा करते हैं। उत्तम यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले पृथुश्रवाका पुत्र सुयज्ञ हुआ।
उशना तु सुयज्ञस्य यो रक्षेत् पृथिवीमिमाम्।<br>आजहाराश्वमेधानां शतमुत्तमधार्मिकः॥ २३सुयज्ञका पुत्र उशना हुआ, जो सर्वश्रेष्ठ धर्मात्मा था। उसने इस पृथ्वीकी रक्षा करते हुए सौ अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था।
तितिक्षुरभवत् पुत्र औशनः शत्रुतापनः।<br>मरुत्तस्तस्य तनयो राजर्षीणामनुत्तमः॥ २४उशनाका पुत्र तितिक्षु हुआ जो शत्रुओंको संतप्त कर देनेवाला था। राजर्षियोंमें सर्वश्रेष्ठ मरुत्त तितिक्षुके पुत्र हुए।
आसीन्मरुत्ततनयो वीरः कम्बलबर्हिषः।<br>पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान् कम्बलबर्हिषः॥ २५मरुत्तका पुत्र वीरवर कम्बलबर्हिष था। कम्बलबर्हिषका पुत्र विद्वान् रुक्मकवच हुआ।
निहत्य रुक्मकवचः परान् कवचधारिणः।<br>धन्विनो विविधैर्बाणैरवाप्य पृथिवीमिमाम्॥ २६रुक्मकवचने अपने अनेकों प्रकारके बाणोंके प्रहारसे धनुर्धारी एवं कवचसे सुसज्जित शत्रुओंको मारकर इस पृथ्वीको प्राप्त किया था।

१. भागवत ९। २३। ३१ तथा विष्णुपुराण ४। १२। २ में 'रुशङ्गु' एवं पद्म० १। १३। ४ में 'कुशङ्क' पाठ है।
२. अन्यत्र शिमेयु, रुचक या शितपु पाठ भी मिलता है।