भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 167
  • अध्याय ४४ * | १५७ ---|---
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदेको निर्वृतेः पुत्रो नाम्ना स तु विदूरथः।<br>दशार्हस्तस्य वै पुत्रो व्योमास्तस्य च वै स्मृतः।<br>दाशार्हाच्चैव व्योमात्तु पुत्रो जीमूत उच्यते॥ ४०<br><br>जीमूतपुत्रो विमलस्तस्य भीमरथः सुतः।<br>सुतो भीमरथस्यासीत् स्मृतो नवरथः किल॥ ४१<br><br>तस्य चासीद् दृढरथः शकुनिस्तस्य चात्मजः।<br>तस्मात् करम्भः कारम्भिर्देवरातो बभूव ह॥ ४२<br><br>देवक्षत्रोऽभवद् राजा देवरातिर्महायशाः।<br>देवगर्भसमो जज्ञे देवनक्षत्रनन्दनः॥ ४३<br><br>मधुर्नाम महातेजा मधोः पुरवसस्तथा।<br>आसीद् पुरवसः पुत्रः पुरुद्वान् पुरुषोत्तमः॥ ४४<br><br>जन्तुर्जज्ञेऽथ वैदर्भ्यां भद्रसेन्यां पुरुद्वतः।<br>ऐक्ष्वाकी चाभवद् भार्या जन्तोस्तस्यामजायत॥ ४५<br><br>सात्त्वतः सत्त्वसंयुक्तः सात्त्वतां कीर्तिवर्धनः।<br>इमां विसृष्टिं विज्ञाय ज्यामघस्य महात्मनः।<br>प्रजावानेति सायुज्यं राज्ञः सोमस्य धीमतः॥ ४६<br><br>सात्त्वतात्सत्त्वसम्पन्नान् कौसल्या सुषुवे सुतान्।<br>भजिनं भजमानं तु दिव्यं देवावृधं नृपम्॥ ४७<br><br>अन्धकं च महाभोजं वृष्णिं च यदुनन्दनम्।<br>तेषां हि सर्गाश्चत्वारो विस्तरेणैव तच्छृणु॥ ४८<br><br>भजमानस्य सृञ्जयां वाह्यकायां च वाह्यकाः।<br>सृञ्जयस्य सुते द्वे तु वाह्यकास्तु तदाभवन्॥ ४९<br><br>तस्य भार्ये भगिन्यौ द्वे सुषुवाते बहून् सुतान्।<br>निमिं च कृमिलं चैव वृष्णिं परपुरंजयम्।<br>ते वाह्यकायां सृञ्जयां भजमानाद् विजज्ञिरे॥ ५०वीरोंका संहारक था। निर्वृतिके एक ही पुत्र था जो विदूरथ नामसे प्रसिद्ध था। विदूरथका पुत्र दशार्ह* और दशार्हका पुत्र व्योम बतलाया जाता है। दशार्हवंशी व्योमसे पैदा हुए पुत्रको जीमूत नामसे कहा जाता है॥ ३५–४०॥<br><br>जीमूतका पुत्र विमल और विमलका पुत्र भीमरथ हुआ। भीमरथका पुत्र नवरथ नामसे प्रसिद्ध था। नवरथका पुत्र दृढरथ और उसका पुत्र शकुनि था। शकुनिसे करम्भ और करम्भसे देवरात उत्पन्न हुआ। देवरातका पुत्र महायशस्वी राजा देवक्षत्र हुआ। देवक्षत्रका पुत्र देव-पुत्रकी-सी कान्तिसे युक्त महातेजस्वी मधु नामसे उत्पन्न हुआ। मधुका पुत्र पुरवस् तथा पुरवस्‌का पुत्र पुरुषश्रेष्ठ पुरुद्वान् था। पुरुद्वान्‌के संयोगसे विदर्भ-राजकुमारी भद्रसेनीके गर्भसे जन्तु नामक पुत्रने जन्म लिया। उस जन्तुकी पत्नी ऐक्ष्वाकी हुई, उसके गर्भसे उत्कृष्ट बल-पराक्रमसे सम्पन्न एवं सात्त्वतवंशियों (या आप)-की कीर्तिका विस्तारक सात्त्वत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इस प्रकार महात्मा ज्यामघकी इस संतान-परम्पराको जानकर मनुष्य पुत्रवान् हो जाता है और अन्तमें बुद्धिमान् राजा सोमका सायुज्य प्राप्त कर लेता है। राजन्! कौसल्या (सात्त्वतकी पत्नी थी। उसने) सात्त्वतके संयोगसे जिन बल-पराक्रमसम्पन्न पुत्रोंको जन्म दिया, उनके नाम हैं—भजि, भजमान, दिव्य राजा देवावृध, अन्धक, महाभोज और यदुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले वृष्णि। इनमें चार वंशका विस्तार हुआ। अब उसका विस्तारपूर्वक वर्णन श्रवण कीजिये। सृंजयकी दो कन्याएँ सृंजयी और वाह्यका भजमानकी पत्नियाँ थीं। इनसे वाह्यक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। इनके अतिरिक्त उन दोनों बहिनोंने और भी बहुत-से पुत्रोंको जन्म दिया था। उनके नाम हैं—निमि, कृमिल और शत्रु-नगरीको जीतनेवाला वृष्णि। ये सभी भजमानके संयोगसे सृंजयी और वाह्यकाके गर्भसे उत्पन्न हुए थे॥ ४१–५०॥

* इन्हींसे श्रीकृष्ण आदि दाशार्हवंशीरूपमें प्रसिद्ध हुए हैं।

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