भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५८* मत्स्यपुराण *

| जज्ञे देवावृधो राजा बन्धूनां मित्रवर्धनः।<br>अपुत्रस्त्वभवद् राजा चचार परमं तपः।<br>पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्पृहन्॥ ५१<br>संयोज्य मन्त्रमेवाथ पर्णाशाजलमस्पृशत्।<br>तदोपस्पर्शनात् तस्य चकार प्रियमपगा॥ ५२<br>कल्याणत्वान्नृपतेस्तस्मै सा निम्नगोत्तमा।<br>चिन्तयाथ परीतात्मा जगामाथ विनिश्चयम्॥ ५३<br>नाधिगच्छाम्यहं नारीं यस्यामेवंविधः सुतः।<br>जायेत तस्मादद्याहं भवाम्यथ सहस्रशः॥ ५४<br>अथ भूत्वा कुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः।<br>ज्ञापयामास राजानं तामियेष महाव्रतः॥ ५५<br>अथ सा नवमे मासि सुषुवे सरितां वरा।<br>पुत्रं सर्वगुणोपेतं बभ्रुं देवावृधान्नृपात्॥ ५६<br>अनुवंशे पुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम्।<br>गुणान् देवावृधस्यापि कीर्तयन्तो महात्मनः॥ ५७<br>यथैव शृणुमो दूरादपश्यामस्तथान्तिकात्।<br>बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः॥ ५८<br>षष्टिशतं च पूर्वपुरुषाः सहस्राणि च सप्ततिः।<br>एतेऽमृतत्वं सम्प्राप्ता बभ्रोर्देवावृधान्नृप॥ ५९<br>यज्वा दानपतिर्वीरो ब्रह्मण्यश्च दृढव्रतः।<br>रूपवान् सुमहातेजाः श्रुतवीर्यधरस्तथा॥ ६०<br>अथ कङ्कस्य दुहिता सुषुवे चतुरः सुतान्।<br>कुकुरं भजमानं च शंशिं कम्बलबर्हिषम्॥ ६१<br>कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णोस्तु तनयो धृतिः।<br>कपोतरोमा तस्याथ तैत्तिरिस्तस्य चात्मजः॥ ६२<br>तस्यासीत् तनुजः सर्पो विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते तस्य नाम्ना स नन्दनो दरदुन्दुभिः॥ ६३ | तत्पश्चात् राजा देवावृधका जन्म हुआ, जो बन्धुओंके साथ सुदृढ़ मैत्रीके प्रवर्धक थे। परंतु राजा (देवावृध)-को कोई पुत्र न था। उन्होंने 'मुझे सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न पुत्र पैदा हो' ऐसी अभिलाषासे युक्त हो अत्यन्त घोर तप किया। अन्तमें उन्होंने मन्त्रको संयुक्त कर पर्णाशा^१ नदीके जलका स्पर्श किया। इस प्रकार स्पर्श करनेके कारण पर्णाशा नदी राजाका प्रिय करनेका विचार करने लगी। वह श्रेष्ठ नदी उस राजाके कल्याणकी चिन्तासे व्याकुल हो उठी। अन्तमें वह इस निश्चयपर पहुँची कि मैं ऐसी किसी दूसरी स्त्रीको नहीं देख पा रही हूँ, जिसके गर्भसे इस प्रकारका (राजाकी अभिलाषाके अनुसार) पुत्र पैदा हो सके, इसलिये आज मैं स्वयं ही हजारों प्रकारका रूप धारण करूँगी। तत्पश्चात् पर्णाशाने परम सुन्दर शरीर धारण करके कुमारीरूपमें प्रकट होकर राजाको सूचित किया। तब महान् व्रतशाली राजाने उसे (पत्नीरूपसे) स्वीकार कर लिया। तदुपरान्त नदियोंमें श्रेष्ठ पर्णाशाने राजा देवावृधके संयोगसे नवें महीनेमें सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न बभ्रु नामक पुत्रको जन्म दिया। पुराणोंके ज्ञाता विद्वान्लोग वंशानुकीर्तनप्रसङ्गमें महात्मा देवावृधके गुणोंका कीर्तन करते हुए ऐसी गाथा गाते हैं—'उद्गार प्रकट करते हैं—'इन (बभ्रु)-के विषयमें हमलोग जैसा (दूरसे) सुन रहे थे, उसी प्रकार (इन्हें) निकट आकर भी देख रहे हैं। बभ्रु तो सभी मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और देवावृध (साक्षात्) देवताओंके समान हैं। राजन्! बभ्रु और देवावृधके प्रभावसे इनके छिहत्तर हजार पूर्वज अमरत्वको प्राप्त हो गये। राजा बभ्रु यज्ञानुष्ठानी, दानशील, शूरवीर, ब्राह्मणभक्त, सुदृढ़व्रती, सौन्दर्यशाली, महान् तेजस्वी तथा विख्यात बल-पराक्रमसे सम्पन्न थे। तदनन्तर (बभ्रुके संयोगसे) कङ्ककी कन्याने कुकुर, भजमान, शशि और कम्बलबर्हिष नामक चार पुत्रोंको जन्म दिया। कुकुरका पुत्र वृष्णि,^२ वृष्णिका पुत्र धृति, उसका पुत्र कपोतरोमा, उसका पुत्र तैत्तिरि, उसका पुत्र सर्प, उसका पुत्र विद्वान् नल था। नलका पुत्र दरदुन्दुभि^३ नामसे कहा जाता था॥ ५१–६३॥ |


१. भारतमें पर्णाशा नामकी दो नदियाँ हैं। ये दोनों राजस्थानकी पूर्वी सीमापर स्थित हैं और पारियात्र पर्वतसे निकली हैं। (द्रष्टव्य मत्स्य० १२।५० तथा वायुपुराण ३८।१७६)।
२. ऊपर ४८वें श्लोकमें 'वृष्णि'का उल्लेख हो चुका है, अतः अधिकांश अन्य पुराणसम्मत यहाँ 'धृष्णु' पाठ मानना चाहिये, या इन्हें द्वितीय वृष्णि मानना चाहिये।
३. पद्म० १।१३।४० में चन्दनोदकदुंदुभि नाम है।