भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४४ * । १५९

| तस्मिन् प्रविते यज्ञे अभिजातः पुनर्वसुः।<br>अश्वमेधं च पुत्रार्थमाजहार नरोत्तमः॥ ६४<br>तस्य मध्येऽतिरात्रस्य सभामध्यात् समुत्थितः।<br>अतस्तु विद्वान् कर्मज्ञो यज्वा दाता पुनर्वसुः॥ ६५<br>तस्यासीत् पुत्रमिथुनं बभूवाविजितं किल।<br>आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातं मतिमतां वर॥ ६६<br>इमांश्चोदाहरन्त्यत्र श्लोकान् प्रति तमाहुकम्।<br>सोपासङ्गानुकर्षाणां सध्वजानां वरूथिनाम्॥ ६७<br>रथानां मेघघोषाणां सहस्राणि दशैव तु।<br>नासत्यवादी नातेजा नायज्वा नासहस्रदः॥ ६८<br>नाशुचिर्नाप्यविद्वान् हि यो भोजेष्वभ्यजायत।<br>आहुकस्य भृतिं प्राप्ता इत्येतद् वै तदुच्यते॥ ६९<br>आहुकश्चाप्यवन्तीषु स्वसारं चाहुकीं ददौ।<br>आहुकात् काश्यदुहिता द्वौ पुत्रौ समसूत ॥ ७०<br>देवकश्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमावुभौ।<br>देवकस्य सुता वीरा जज्ञिरे त्रिदशोपमाः॥ ७१<br>देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः।<br>तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ॥ ७२<br>देवकी श्रुतदेवी च मित्रदेवी यशोधरा।<br>श्रीदेवी सत्यदेवी च सुतापी चेति सप्तमी॥ ७३<br>नवोग्रसेनस्य सुताः कंसस्तेषां तु पूर्वजः।<br>न्यग्रोधश्च सुनामा च कङ्कः शङ्कुश्च भूयशः॥ ७४<br>अजभू राष्ट्रपालश्च युद्धमुष्टिः सुमुष्टिदः।<br>तेषां स्वसारः पञ्चासन् कंसा कंसवती तथा॥ ७५<br>सुतन्तू राष्ट्रपाली च कङ्का चेति वराङ्गनाः।<br>उग्रसेनः सहापत्यो व्याख्यातः कुकुरोद्भवः॥ ७६<br>भजमानस्य पुत्रोऽथ रथिमुख्यो विदूरथः।<br>राजाधिदेवः शूरश्च विदूरथसुतोऽभवत्॥ ७७<br>राजाधिदेवस्य सुतो जज्ञाते देवसम्मितौ।<br>नियमव्रतप्रधानौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः॥ ७८<br>शोणाश्वस्य सुताः पञ्च शूरा रणविशारदाः।<br>शमी च देवशर्मा च निकुन्तः शक्रशत्रुजित्॥ ७९ | नरश्रेष्ठ दरदुन्दुभि पुत्रप्राप्तिके लिये अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे। उस विशाल यज्ञमें पुनर्वसु नामक पुत्र प्रादुर्भूत हुआ। पुनर्वसु अतिरात्रके मध्यमें सभाके बीच प्रकट हुआ था, इसलिये वह विद्वान्, शुभाशुभ कर्मोंका ज्ञाता, यज्ञपरायण और दानी था। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजन्! पुनर्वसुके आहुक नामका पुत्र और आहुकी नामकी कन्या—ये जुड़वीं संतान पैदा हुई। इनमें आहुक अजेय और लोकप्रसिद्ध था। उन आहुकके प्रति विद्वान् लोग इन श्लोकोंको गाया करते हैं—'राजा आहुकके पास दस हजार ऐसे रथ रहते थे, जिनमें सुदृढ़ उपासङ्ग (कूबर) एवं अनुकर्ष (धुरे) लगे रहते थे, जिनपर ध्वजाएँ फहराती रहती थीं, जो कवचसे सुसज्जित रहते थे तथा जिनसे मेघकी घरघराहटके सदृश शब्द निकलते थे। उस भोजवंशमें ऐसा कोई राजा नहीं पैदा हुआ जो असत्यवादी, निस्तेज, यज्ञविमुख, सहस्रोंकी दक्षिणा देनेमें असमर्थ, अपवित्र और मूर्ख हो।' राजा आहुकसे भरण-पोषणकी वृत्ति पानेवाले लोग ऐसा कहा करते थे। आहुकने अपनी बहन आहुकीको अवन्ती-नरेशको प्रदान किया था। आहुकके संयोगसे काश्यकी कन्याने देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों देव-पुत्रोंके सदृश कान्तिमान् थे। देवकके देवताओंके समान कान्तिमान् एवं पराक्रमी चार शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम हैं—देववान्, उपदेव, सुदेव और देवरक्षित। इनके सात बहनें भी थीं, जिन्हें देवकने वसुदेवको समर्पित किया था। उनके नाम हैं—देवकी, श्रुतदेवी, मित्रदेवी, यशोधरा, श्रीदेवी, सत्यदेवी और सातवीं सुतापी॥ ६४–७३॥<br><br>उग्रसेनके नौ पुत्र थे, उनमें कंस ज्येष्ठ था। उनके नाम हैं—न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, शङ्कु अजभू, राष्ट्रपाल, युद्धमुष्टि और सुमुष्टिद। उनके कंसा,कंसवती, सतन्तू, राष्ट्रपाली और कङ्का नामकी पाँच बहनें भी थीं, जो परम सुन्दरी थीं। अपनी संतानोंसहित उग्रसेन कुकुर-वंशमें उत्पन्न हुए कहे जाते हैं। भजमानका पुत्र महारथी विदूरथ और शूरवीर राजाधिदेव विदूरथका पुत्र हुआ। राजाधिदेवके शोणाश्व और श्वेतवाहन नामक दो पुत्र हुए, जो देवोंके सदृश कान्तिमान् और नियम एवं व्रतके पालनमें तत्पर रहनेवाले थे। शोणाश्वके शमी, देवशर्मा, निकुन्त, शक्र और शत्रुजित् नामक पाँच शूरवीर एवं युद्धनिपुण पुत्र हुए। |