भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६० * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
शमिपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः।<br>प्रतिक्षेत्रः सुतो भोजो हृदीकस्तस्य चात्मजः॥ ८०<br>हृदीकस्याभवन् पुत्रा दश भीमपराक्रमाः।<br>कृतवर्माग्रजस्तेषां शतधन्वा च मध्यमः॥ ८१<br>देवार्हश्चैव नाभश्च धिषणश्च महाबलः।<br>अजातो वनजातश्च कनीयककरम्भकौ॥ ८२<br>देवार्हस्य सुतो विद्वाञ्जज्ञे कम्बलवर्हिषः।<br>असोमजाः सुतस्तस्य तमोजास्तस्य चात्मजः॥ ८३<br>अजातपुत्रा विक्रान्तास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>सुदंष्ट्रश्च सुनाभश्च कृष्ण इत्यन्धका मताः॥ ८४<br>अन्धकानामिमं वंशं यः कीर्तयति नित्यशः।<br>आत्मनो विपुलं वंशं प्रजावानाप्नुते नरः॥ ८५शमीका पुत्र प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्रका पुत्र प्रतिक्षेत्र, उसका पुत्र भोज और उसका पुत्र हृदीक हुआ। हृदीकके दस अनुपम पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए, उनमें कृतवर्मा ज्येष्ठ और शतधन्वा मँझला था। शेषके नाम (इस प्रकार) हैं—देवार्ह, नाभ, धिषण, महाबल, अजात, वनजात, कनीयक और करम्भक। देवार्हके कम्बलवर्हिष नामक विद्वान् पुत्र हुआ। उसका पुत्र असोमजा और असोमजाका पुत्र तमोजा हुआ। इसके बाद सुदंष्ट्र, सुनाभ और कृष्ण नामके तीन राजा और हुए जो परम पराक्रमी और उत्तम कीर्तिवाले थे। इनके कोई संतान नहीं हुई। ये सभी अन्धकवंशी माने गये हैं। जो मनुष्य अन्धकोंके इस वंशका नित्य कीर्तन करता है वह स्वयं पुत्रवान् होकर अपने वंशकी वृद्धि करता है॥ ७४—८५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णनमें चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४४॥


पैंतालीसवाँ अध्याय

वृष्णिवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें स्यमन्तकमणिकी कथा

श्लोकअर्थ
सूत उवाच<br>गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः।<br>गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्॥ १<br>माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम्।<br>अनमित्रं शिबिं चैव पञ्चमं कृतलक्षणम्॥ २<br>अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापि तु द्वौ सुतौ।<br>प्रसेनश्च महावीर्यः शक्तिसेनश्च तावुभौ॥ ३<br>स्यमन्तकः प्रसेनस्य मणिरत्नमनुत्तमम्।<br>पृथिव्यां सर्वरत्नानां राजा वै सोऽभवन्मणिः॥ ४<br>हृदि कृत्वा तु बहुशो मणिं तमभियाचितः।<br>गोविन्दोऽपि न तं लेभे शक्तोऽपि न जहार सः॥ ५<br>कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनस्तेन भूषितः।<br>यथाशब्दं स शुश्राव बिले सत्त्वेन पूरिते॥ ६**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (अब आपलोग सात्त्वतके कनिष्ठ पुत्र वृष्णिका वंश-वर्णन सुनिये।) गान्धारी और माद्री—ये दोनों वृष्णिकी पत्नियाँ हुईं। उनमें गान्धारीने सुमित्र और मित्रनन्दन नामक दो पुत्रोंको तथा माद्रीने युधाजित्, तत्पश्चात् देवमीढुष, अनमित्र, शिबि और पाँचवें कृतलक्षण नामक पुत्रोंको जन्म दिया। अनमित्रका पुत्र निघ्न हुआ और निघ्नके महान् पराक्रमी प्रसेन और शक्तिसेन नामक दो पुत्र हुए। इसी प्रसेनके पास स्यमन्तक नामक सर्वश्रेष्ठ मणिरत्न था। वह मणिरत्न भूतलपर समस्त रत्नोंका राजा था। भगवान् श्रीकृष्णने भी अनेकों बार मनमें उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करके प्रसेनसे याचना की, परंतु वे उसे प्राप्त न कर सके। साथ ही समर्थ होनेपर भी उन्होंने उसका अपहरण भी नहीं किया। एक बार प्रसेन उस मणिसे विभूषित हो शिकार खेलनेके लिये वनमें गया। वहाँ उसने एक बिल (गुफा)-में, जिसका स्वामी जीव उसमें विद्यमान था, होनेवाले कोलाहलको सुना।