भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171
* अध्याय ४५ *१६१
ततः प्रविश्य स बिलं प्रसेनो ह्यक्षमैक्षत।<br>ऋक्षः प्रसेनं च तथा ऋक्षं चैव प्रसेनजित् ॥ ७<br>हत्वा ऋक्षः प्रसेनं तु ततस्तं मणिमाददात्।<br>अदृष्टस्तु हतस्तेन अन्तर्बिलगतस्तदा ॥ ८<br>प्रसेनं तु हतं ज्ञात्वा गोविन्दः परिशङ्कितः।<br>गोविन्देन हतो व्यक्तं प्रसेनो मणिकारणात् ॥ ९<br>प्रसेनस्तु गतोऽरण्यं मणिरत्नेन भूषितः।<br>तं दृष्ट्वा स हतस्तेन गोविन्दः प्रत्युवाच ह।<br>हन्मि चैनं दुराचारं शत्रुभूतं हि वृष्णिषु ॥ १०<br>अथ दीर्घेण कालेन मृगयां निर्गतः पुनः।<br>यदृच्छया च गोविन्दो बिलस्याभ्याशमागमत् ॥ ११<br>तं दृष्ट्वा तु महाशब्दं स चक्रे ऋक्षराड् बली।<br>शब्दं श्रुत्वा तु गोविन्दः खड्गपाणिः प्रविश्य सः।<br>अपश्यज्जाम्बवन्तं तमृक्षराजं महाबलम् ॥ १२<br>ततस्तूर्णं हृषीकेशस्तमृक्षपतिमञ्जसा।<br>जाम्बवन्तं स जग्राह क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ १३<br>तुष्टावैनं तदा ऋक्षः कर्मभिर्वैष्णवैः प्रभुम्।<br>ततस्तुष्टस्तु भगवान् वरेणैनमरोचयत् ॥ १४कुतूहलवश प्रसेनने उसमें प्रवेश करके एक रीछको देखा। फिर तो रीछकी दृष्टि प्रसेनपर और प्रसेनकी दृष्टि रीछपर पड़ी। (तत्पश्चात् दोनोंमें युद्ध छिड़ गया।) रीछने प्रसेनको मारकर वह मणि ले ली।$^१$ बिलके भीतर प्रविष्ट हुआ प्रसेन रीछद्वारा मार डाला गया, इसलिये उसे कोई देख न सका। इधर प्रसेनको मारा गया जानकर भगवान् श्रीकृष्णको आशङ्का हो गयी कि लोग स्पष्टरूपसे कहते होंगे कि मणि लेनेके लिये श्रीकृष्णने ही प्रसेनका वध किया है। ऐसी किंवदन्तीके फैलनेपर भगवान् गोविन्दने उत्तर दिया कि 'उस मणिरत्नको धारण करके प्रसेन वनमें गया था, उसे देखकर (मणिको हथियानेके लिये) किसीके द्वारा (सम्भवतः) वह मार डाला गया है। अतः वृष्णिवंशके शत्रुरूप उस दुराचारीका मैं वध करूँगा।' तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् आखेटके लिये निकले हुए भगवान् श्रीकृष्ण इच्छानुसार भ्रमण करते हुए उसी बिल (गुफा)-के निकट जा पहुँचे। उन्हें देखकर महाबली रीछराजने उच्चस्वरसे गर्जना की। उस शब्दको सुनकर भगवान् गोविन्द हाथमें तलवार लिये हुए उस बिलमें घुस गये। वहाँ उन्होंने उन महाबली रीछराज जाम्बवान्‌को देखा। तब जिनके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे, उन हृषीकेश श्रीकृष्णने शीघ्र ही रीछराज जाम्बवान्‌को वेगपूर्वक अपने वशमें कर लिया। उस समय रीछराजने विष्णुसम्बन्धी स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुका स्तवन किया। उससे संतुष्ट होकर भगवान् श्रीकृष्णने जाम्बवान्‌को भी वरप्रदानद्वारा प्रसन्न कर दिया॥ १—१४॥
जाम्बवानुवाच<br>इच्छे चक्रप्रहारेण त्वत्तोऽहं मरणं प्रभो।<br>कन्या चेयं मम शुभा भर्तारं त्वामवाप्नुयात्।<br>योऽयं मणिः प्रसेनं तु हत्वा प्राप्तो मया प्रभो ॥ १५जाम्बवान्‌ने कहा— प्रभो! मेरी अभिलाषा है कि मैं आपके चक्र-प्रहारसे मृत्युको प्राप्त होऊँ। यह मेरी सौन्दर्यशालिनी कन्या आपको पतिरूपमें प्राप्त करे। प्रभो! यह मणि, जिसे मैंने प्रसेनको मारकर प्राप्त किया है, आपके ही पास रहे।
ततः स जाम्बवन्तं तं हत्वा चक्रेण वै प्रभुः।<br>कृतकर्मा महाबाहुः सकन्यं मणिमाहरत् ॥ १६<br>ददौ सत्राजितायै तं सर्वसात्त्वतसंसदि।<br>तेन मिथ्यापवादेन संतप्तोऽयं जनार्दनः ॥ १७<br>ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमथाब्रुवन्।<br>अस्माकं तु मतिर्ह्यासीत् प्रसेनस्तु त्वया हतः ॥ १८तत्पश्चात् सामर्थ्यशाली एवं महाबाहु श्रीकृष्णने अपने चक्रसे उन जाम्बवान्‌का वध करके कृतकृत्य हो कन्यासहित मणिको ग्रहण कर लिया।$^२$ घर लौटकर भगवान् जनार्दनने समस्त सात्वतोंकी भरी सभामें वह मणि सत्राजित्‌को समर्पित कर दी; क्योंकि वे उस मिथ्यापवादसे अत्यन्त दुःखी थे। उस समय सभी यदुवंशियोंने वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्णसे यों कहा—'श्रीकृष्ण! हमलोगोंका तो यह दृढ़ निश्चय था कि प्रसेन तुम्हारे ही हाथों मारा गया है।

१. अन्य भागवत, विष्णु आदि पुराणोंके अनुसार सिंहने प्रसेनको और जाम्बवान्ने सिंहको मारा है। परिष्कारदृष्ट्या मत्स्यपुराणकी भागवतादिसे पूर्व स्थिति सिद्ध होती है।
२. यह कथा प्रायः कल्किपुराणसे मिलती है। शेष अन्य भागवत, विष्णु आदि पुराणोंमें जाम्बवान् कन्या-दान करनेके बाद भी जीवित ही रहते हैं। कल्किपुराणके अन्तमें जाम्बवान् तथा शशविन्दुकी ऐसी स्थिति हुई है।