भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६२ * मत्स्यपुराण *


| कैकेयस्य सुता भार्या दश सत्राजितः शुभाः।<br>तासूत्पन्नाः सुतास्तस्य शतमेकं तु विश्रुताः।<br>ख्यातिमन्तो महावीर्या भङ्गकारस्तु पूर्वजः ॥ १९<br>अथ व्रतवती तस्माद् भङ्गकारात् तु पूर्वजात्।<br>सुषुवे सुकुमारीस्तु तिस्रः कमललोचनाः ॥ २०<br>सत्यभामा वरा स्त्रीणां व्रतिनी च दृढव्रता।<br>तथा पद्मावती चैव ताश्च कृष्णाय सोऽददात् ॥ २१<br>अनमित्राच्छिनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्।<br>सत्यकस्तस्य पुत्रस्तु सात्यकिस्तस्य चात्मजः ॥ २२<br>सत्यवान् युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान्।<br>असङ्गो युयुधानस्य द्युम्निस्तस्यात्मजोऽभवत् ॥ २३<br>द्युम्नेर्युगंधरः पुत्र इति शैनेयाः प्रकीर्तिताः।<br>अनमित्रान्वयो ह्येष व्याख्यातो वृष्णिवंशजः ॥ २४<br>अनमित्रस्य संजज्ञे पृथ्व्यां वीरो युधाजितः।<br>अन्यो तु तनयौ वीरौ वृषभः क्षत्र एव च ॥ २५<br>वृषभः काशिराजस्य सुतां भार्यामविन्दत।<br>जयन्तस्तु जयन्त्यां तु पुत्रः सम्भवच्छुभः ॥ २६<br>सदायज्ञोऽतिवीरश्च श्रुतवानतिथिप्रियः।<br>अक्रूरः सुषुवे तस्मात् सदायज्ञोऽतिदक्षिणः ॥ २७<br>रत्ना कन्या च शैब्यस्य अक्रूरस्तामवाप्तवान्।<br>पुत्रानुत्पादयामास त्वेकादश महाबलान् ॥ २८<br>उपलम्भः सदालम्भो वृकलो वीर्य एव च।<br>सवीतरः सदापक्षः शत्रुघ्नो वारिमेजायः ॥ २९<br>धर्मभृद् धर्मवर्माणो धृष्टमानस्तथैव च।<br>सर्वे च प्रतिहोतारो रत्नायां जज्ञिरे च ते ॥ ३०<br>अक्रूरादुग्रसेनायां सुतौ द्वौ कुलवर्धनौ।<br>देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसंनिभौ ॥ ३१<br>अश्विन्यां च ततः पुत्राः पृथुर्विपृथुरेव च।<br>अश्वत्थामा सुबाहुश्च सुपार्श्वकगवेषणौ ॥ ३२<br>वृष्टिनेमिः सुधर्मा च तथा शर्यातिरेव च।<br>अभूमिवर्जभूमिश्च श्रमिष्ठः श्रवणस्तथा ॥ ३३<br>इमां मिथ्याभिशस्तिं यो वेद कृष्णादपोहिताम्।<br>न स मिथ्याभिशापेन अभिशाप्योऽथ केनचित् ॥ ३४ | केकयराजकी दस सौन्दर्यशालिनी कन्याएँ सत्राजित्की पत्नियाँ थीं। उनके गर्भसे सत्राजित्के एक सौ पुत्र उत्पन्न हुए थे, जो विश्वविख्यात, प्रशंसित एवं महान् पराक्रमी थे। उनमें भंगकार ज्येष्ठ था। उस ज्येष्ठ भंगकारके संयोगसे व्रतवतीने तीन कमलनयनी सुकुमारी कन्याओंको जन्म दिया। उनके नाम हैं—स्त्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ सत्यभामा, दृढव्रतपरायणा व्रतिनी तथा पद्मावती। भंगकारने इन तीनोंको पत्नीरूपमें श्रीकृष्णको प्रदान किया था। कनिष्ठ वृष्णिनन्दन अनमित्रसे शिनिका जन्म हुआ। उसका पुत्र सत्यक और सत्यकका पुत्र सात्यकि हुआ। सत्यवान् और प्रतापी युयुधान—ये दोनों शिनिके नाती थे। युयुधानका पुत्र असंग और उसका पुत्र द्युम्नि हुआ। द्युम्निका पुत्र युगंधर हुआ। इस प्रकार यह शिनि-वंशका वर्णन किया गया॥ १५—२३ १/२॥<br><br>अब मैं वृष्णि-वंशमें उत्पन्न अनमित्रके वंशका वर्णन कर रहा हूँ। अनमित्रकी दूसरी पत्नी पृथ्वीके गर्भसे वीरवर युधाजित् पैदा हुए। उनके वृषभ और क्षत्र नामवाले दो अन्य शूरवीर पुत्र थे। वृषभने काशिराजकी जयन्ती नामकी कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त (ग्रहण) किया। उन्हें उस जयन्तीके गर्भसे जयन्त नामक अत्यन्त सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ, जो सदा यज्ञानुष्ठानमें निरत रहनेवाला, महान् शूरवीर, शास्त्रज्ञ तथा अतिथियोंका प्रेमी था। उससे अक्रूर नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई। वह भी आगे चलकर सदा यज्ञानुष्ठानशील और विपुल दक्षिणा देनेवाला हुआ। शिवि-नरेशकी एक रत्ना नामकी कन्या थी, जिसे अक्रूरने पत्नीरूपमें प्राप्त किया और उसके गर्भसे ग्यारह महाबली पुत्रोंको उत्पन्न किया। उनके नाम इस प्रकार हैं—उपलम्भ, सदालम्भ, वृकल, वीर्य, सविता, सदापक्ष, शत्रुघ्न, वारिमेज, धर्मभृद्, धर्मवर्मा और धृष्टमान। रत्नाके गर्भसे उत्पन्न हुए ये सभी पुत्र यज्ञादि शुभ कर्म करनेवाले थे। अक्रूरके संयोगसे उग्रसेनाके गर्भसे देववान् और उपदेव नामक दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे, जो देवताके सदृश शोभाशाली और वंश-विस्तारक थे। उन्हींकी दूसरी पत्नी अश्विनीके गर्भसे पृथु, विपृथु, अश्वत्थामा, सुबाहु, सुपार्श्वक, गवेषण, वृष्टिनेमि, सुधर्मा, शर्याति, अभूमि, वर्जभूमि, श्रमिष्ठ तथा श्रवण—ये तेरह पुत्र भी पैदा हुए थे। जो मनुष्य श्रीकृष्णके शरीरसे हटाये गये इस मिथ्यापवादको जानता है, वह किसीके भी द्वारा मिथ्याभिशापसे अभिशस्त नहीं किया जा सकता॥२४—३४॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशो नाम पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णनमें पैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥