भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 173
* अध्याय ४६ *१६३

छियालीसवाँ अध्याय

वृष्णि-वंशका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
ऐक्ष्वाकी सुषुवे शूरं ख्यातमद्भुतमीढुषम्।<br>पौरुषाज्जज्ञिरे शूराद् भोजायां पुत्रका दश॥ १ऋषियो! ऐक्ष्वाकी (माद्री)-ने शूर (शूरसेन) नामक एक अद्भुत पुत्रको जन्म दिया, जो आगे चलकर ईढुष (देवमीढुष) नामसे विख्यात हुआ। पुरुषार्थी शूरके सम्पर्कसे भोजाके गर्भसे दस पुत्रों और पाँच सुन्दरी कन्याओंकी उत्पत्ति हुई।
वसुदेवो महाबाहुः पूर्वमानकदुन्दुभिः।<br>देवभागस्ततो जज्ञे ततो देवश्रवाः पुनः॥ २पुत्रोंमें सर्वप्रथम महाबाहु वसुदेव उत्पन्न हुए, जिनकी आनकदुन्दुभि नामसे भी प्रसिद्धि हुई। उसके बाद देवभाग-(देवमार्ग)-का जन्म हुआ। तत्पश्चात् पुनः देवश्रवा,
अनाधृष्टिः शिनिश्चैव नन्दश्चैव ससृञ्जयः।<br>श्यामः शमीकः संयूपः पञ्च चास्य वराङ्गनाः॥ ३अनाधृष्टि, शिनि, नन्द, सृञ्जय, श्याम, शमीक और संयूप पैदा हुए। कन्याओंके नाम हैं—
श्रुतकीर्तिः पृथा चैव श्रुतदेवी श्रुतश्रवाः।<br>राजाधिदेवी च तथा पञ्चैता वीरमातरः॥ ४श्रुतकीर्ति, पृथा, श्रुतादेवी, श्रुतश्रवा और राजाधिदेवी। ये पाँचों शूरवीर पुत्रोंकी माताएँ हुईं।
कृतस्य तु श्रुतादेवी सुग्रीवं सुषुवे सुतम्।<br>कैकेय्यां श्रुतकीर्त्यां तु जज्ञे सोऽनुव्रतो नृपः॥ ५कृतकी पत्नी श्रुतदेवीने सुग्रीव नामक पुत्रको जन्म दिया। केकय देशकी राजमहिषी श्रुतकीर्तिके गर्भसे राजा अनुव्रतने जन्म लिया।
श्रुतश्रवसि चैद्यस्य सुनीथः समपद्यत।<br>बहुशो धर्मचारी स सम्बभूवारिमर्दनः॥ ६चेदि-नरेशकी पत्नी श्रुतश्रवाके गर्भसे एक सुनीथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो अनेकों प्रकारके धर्मोंका आचरण करनेवाला एवं शत्रुओंका विनाशक था।
अथ सख्येन वृद्धोऽसौ कुन्तिभोजे सुतां ददौ।<br>एवं कुन्ती समाख्याता वसुदेवस्वसा पृथा॥ ७तत्पश्चात् शूरने अपनी पृथा नाम्नी कन्याको मित्रतावश वृद्ध राजा कुन्तिभोजको पुत्रीरूपमें दे दिया। इसी कारण वसुदेवकी बहन यह पृथा कुन्ती नामसे विख्यात हुई।
वसुदेवेन सा दत्ता पाण्डोर्भार्या ह्यनिन्दिता।<br>पाण्डोरर्थेन सा जज्ञे देवपुत्रान् महारथान्॥ ८उसे वसुदेवने पाण्डुको (पत्नीरूपमें) प्रदान किया था। उस अनिन्द्यसुन्दरी पाण्डु-पत्नी कुन्तीने पाण्डुकी वंशवृद्धिके लिये (पतिकी आज्ञासे) महारथी देवपुत्रोंको जन्म दिया था।
धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे वायोरर्जज्ञे वृकोदरः।<br>इन्द्राद् धनञ्जयश्चैव शक्रतुल्यपराक्रमः॥ ९उनमें धर्मके संयोगसे युधिष्ठिर पैदा हुए, वायुके सम्पर्कसे वृकोदर (भीमसेन)-का जन्म हुआ और इन्द्रके सकाशसे इन्द्रके ही समान पराक्रमी धनञ्जय (अर्जुन)-की उत्पत्ति हुई।
माद्रवत्यां तु जनितावश्विभ्यामिति शुश्रुमः।<br>नकुलः सहदेवश्च रूपशीलगुणान्वितौ॥ १०साथ ही अश्विनीकुमारोंके संयोगसे माद्रवती (माद्री)-के गर्भसे रूप, शील एवं सद्गुणोंसे समन्वित नकुल और सहदेव पैदा हुए—ऐसा हमलोगोंने सुना है॥ १–१०॥