भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रोहिणी पौरवी चैव पत्न्यावानकदुन्दुभेः।<br>लेभे ज्येष्ठं सुतं रामं सारणं च सुतं प्रियम्॥ ११<br>दुर्दमं दमनं सुभ्रुं पिण्डारकमहाहनू।<br>चित्राक्ष्यौ द्वे कुमार्यौ तु रोहिण्यां जज्ञिरे तदा॥ १२<br>देवक्यां जज्ञिरे शौरेः सुषेणः कीर्तिमानपि।<br>उदारो भद्रसेनश्च भद्रवासस्तथैव च।<br>षष्ठो भद्रविदेहश्च कंसः सर्वानघातयत्॥ १३<br>अथ तस्यामवस्थायामायुष्मान् संबभूव ह।<br>लोकनाथो महाबाहुः पूर्वकृष्णः प्रजापतिः॥ १४<br>अनुजा त्वभवत् कृष्णात् सुभद्रा भद्रभाषिणी।<br>देवक्यां तु महातेजा जज्ञे शूरी महायशाः॥ १५<br>सहदेवस्तु ताम्रायां जज्ञे शौरिकुलोद्वहः।<br>उपासङ्गधरं लेभे तनयं देवरक्षिता।<br>एकां कन्यां च सुभगां कंसस्तामभ्यघातयत्॥ १६<br>विजयं रोचमानं च वर्धमानं तु देवलम्।<br>एते सर्वे महात्मानो ह्युपदेव्यां प्रजज्ञिरे॥ १७<br>अवगाहो महात्मा च वृकदेव्यामजायत।<br>वृकदेव्यां स्वयं जज्ञे नन्दनो नाम नामतः॥ १८आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-के संयोगसे रोहिणी (उनकी चौबीस पत्नियोंमें प्रथम)-ने विश्वविख्यात ज्येष्ठ पुत्र राम-(बलराम)-को, तत्पश्चात् प्रिय पुत्र सारण, दुर्दम, दमन, सुभ्रु, पिण्डारक और महाहनुको प्राप्त किया। (उनकी दूसरी पत्नी पौरवीके भी भद्र, सुभद्रादि पुत्र हुए।) उसी समय रोहिणीके गर्भसे चित्रा और अक्षी नामवाली (अथवा सुन्दर नेत्रोंवाली) दो कन्याएँ भी पैदा हुई। वसुदेवजीके सम्पर्कसे देवकीके गर्भसे सुषेण, कीर्तिमान्, उदार, भद्रसेन, भद्रवास और छठा भद्रविदेह नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे, जिन्हें कंसने मार डाला। फिर उसी समय (देवकीके गर्भसे) आयुष्मान् लोकनाथ महाबाहु प्रजापति श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए। श्रीकृष्णके बाद उनकी छोटी बहन शुभभाषिणी सुभद्रा पैदा हुई। तदनन्तर देवकीके गर्भसे महान् तेजस्वी एवं महायशस्वी शूरी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। ताम्राके गर्भसे शौरिकुलका उद्वहन करनेवाला सहदेव नामक पुत्र पैदा हुआ। देवरक्षिताने उपासङ्गधर नामक पुत्रको और एक सुन्दरी कन्याको, जिसे कंसने मार डाला, उत्पन्न किया। विजय, रोचमान, वर्धमान और देवल—ये सभी महान् आत्मबलसे सम्पन्न पुत्र उपदेवीके गर्भसे पैदा हुए थे। महात्मा अवगाह वृकदेवीके गर्भसे उत्पन्न हुए। इसी वृकदेवीके गर्भसे नन्दन नामक एक और पुत्र पैदा हुआ था॥ ११–१८॥
सप्तमं देवकीपुत्रं मदनं सुषुवे नृप।<br>गवेषणं महाभागं संग्रामेष्वपराजितम्॥ १९<br>श्रद्धादेव्या विहारे तु वने हि विचरन् पुरा।<br>वैश्यायामदधाच्छौरिः पुत्रं कौशिकमग्रजम्॥ २०<br>सुतनू रथराजी च शौरेरास्तां परिग्रहौ।<br>पुण्ड्रश्च कपिलश्चैव वसुदेवात्मजौ बलौ॥ २१<br>जरा नाम निषादोऽभूत् प्रथमः स धनुर्धरः।<br>सौभद्रश्च भवश्चैव महासत्त्वौ बभूवतुः॥ २२राजन्! देवकीने अपने सातवें पुत्र मदनको तथा संग्राममें अजेय एवं महान् भाग्यशाली गवेषणको जन्म दिया था। इससे पूर्व श्रद्धादेवीके साथ विहारके अवसरपर वनमें विचरण करते हुए शूरनन्दन वसुदेवने एक वैश्य-कन्याके उदरमें गर्भाधान किया, जिससे कौशिक नामक ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ। वसुदेवजीकी (नवीं) सुतनु और (दसवीं)* रथराजी नामकी दो पत्नियाँ और थीं। उनके गर्भसे वसुदेवके पुण्ड्र और कपिल नामक दो पुत्र तथा महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न सौभद्र और भव नामक दो पुत्र और उत्पन्न हुए थे। उनमें जो ज्येष्ठ था,

* यहाँ वसुदेवजीकी दस, पर हरिवंशपु० १, ब्रह्मपु० ४। ३६ आदिमें चौदह पत्नियाँ और उनकी संततियाँ निर्दिष्ट हैं।