भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 175
* अध्याय ४७ *१६५

| देवभागसुतश्चापि नाम्नासावुद्धवः स्मृतः।<br>पण्डितं प्रथमं प्राहुर्देवश्रवःसमुद्भवम् ॥ २३<br>ऐक्ष्वाक्यलभतापत्यमनाधृष्टैर्यशस्विनी ।<br>निधूतसत्त्वं शत्रुघ्नं श्राद्धस्तस्मादजायत ॥ २४<br>करूषायानपत्याय कृष्णस्तुष्टः सुतं ददौ।<br>सुचन्द्रं तु महाभागं वीर्यवन्तं महाबलम् ॥ २५<br>जाम्बवत्याः सुतावेतौ द्वौ च सत्कृतलक्षणौ।<br>चारुदेष्णश्च साम्बश्च वीर्यवन्तौ महाबलौ ॥ २६<br>तन्तिपालश्च तन्तिश्च नन्दनस्य सुतावुभौ।<br>शमीकपुत्राश्चत्वारो विक्रान्ताः सुमहाबलाः।<br>विराजश्च धनुश्चैव श्यामश्च सृञ्जयस्तथा ॥ २७<br>अनपत्योऽभवच्छ्यामः शमीकस्तु वनं ययौ।<br>जुगुप्समानो भोजत्वं राजर्षित्वमवाप्तवान्॥ २८<br>कृष्णस्य जन्माभ्युदयं यः कीर्तयति नित्यशः।<br>शृणोति मानवो नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २९ | वह जरा नामक निषाद हुआ, जो महान् धनुर्धर था। देवभागका पुत्र उद्धव नामसे प्रसिद्ध था। देवश्रवाके प्रथम पुत्रको पण्डित नामसे पुकारा जाता था। यशस्विनी ऐक्ष्वाकीने अनाधृष्टिके संयोगसे शत्रुसंहारक निधूतसत्त्व नामक पुत्रको प्राप्त किया। निधूतसत्त्वसे श्राद्धकी उत्पत्ति हुई। संतानहीन करूषपर प्रसन्न होकर श्रीकृष्णने उसे एक सुचन्द्र नामक पुत्र प्रदान किया था, जो महान् भाग्यशाली, पराक्रमी और महाबली था। जाम्बवतीके चारुदेष्ण और साम्ब—ये दोनों पुत्र उत्तम लक्षणोंसे युक्त, पराक्रमी और महान् बलसम्पन्न थे। नन्दनके तन्तिपाल और तन्तिनामक दो पुत्र हुए। शमीकके चारों पुत्र विराज, धनु, श्याम और सृञ्जय अत्यन्त पराक्रमी और महाबली थे। इनमें श्याम तो संतानहीन हो गया और शमीक भोजवंशके आचार-व्यवहारकी निन्दा करता हुआ वनमें चला गया, वहाँ आराधना करके उसने राजर्षिकी पदवी प्राप्त की। जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णके इस जन्म एवं अभ्युदयका नित्य कीर्तन (पाठ) अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥१९–२९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे वृष्णिवंशानुकीर्तनं नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें वृष्णिवंशानुकीर्तन नामक छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४६॥


सैंतालीसवाँ अध्याय

श्रीकृष्ण-चरित्रका वर्णन, दैत्योंका इतिहास तथा देवासुर-संग्रामके प्रसङ्गमें विभिन्न अवान्तर कथाएँ

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
अथ देवो महादेवः पूर्वं कृष्णः प्रजापतिः।<br>विहारार्थं स देवेशो मानुषेष्विह जायते॥ १<br>देवक्यां वसुदेवस्य तपसा पुष्करेक्षणः।<br>चतुर्बाहुस्तदा जातो दिव्यरूपो ज्वलञ्श्रिया॥ २<br>श्रीवत्सलक्षणं देवं दृष्ट्वा दिव्यैश्च लक्षणैः।<br>उवाच वसुदेवस्तं रूपं संहर वै प्रभो ॥ ३ऋषियो! पूर्वकालमें जो प्रजाओंके स्वामी थे, वे ही देवाधिदेव महादेव श्रीकृष्ण लीला-विहार करनेके लिये मृत्युलोकमें मानव-योनिमें अवतीर्ण हुए। वे वसुदेवजीकी तपस्यासे देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुए। उनके नेत्र कमल-सदृश अति रमणीय थे, उनके चार भुजाएँ थीं, उनका दिव्य रूप दिव्य कान्तिसे प्रज्वलित हो रहा था और उनका वक्षःस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे विभूषित था। वसुदेवजीने इन दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न श्रीकृष्णको देखकर उनसे कहा—