भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६६* मत्स्यपुराण *

| भीतोऽहं देव कंसस्य ततस्त्वेतद् ब्रवीमि ते।<br>मम पुत्रा हतास्तेन ज्येष्ठास्ते भीमविक्रमाः॥ ४<br><br>वसुदेववचः श्रुत्वा रूपं संहरतेऽच्युतः।<br>अनुज्ञाप्य ततः शौरिं नन्दगोपगृहेऽनयत्॥ ५<br><br>दत्त्वैनं नन्दगोपस्य रक्ष्यतामिति चाब्रवीत्।<br>अतस्तु सर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति।<br>अयं तु गर्भो देवक्यां जातः कंसं हनिष्यति॥ ६ | 'प्रभो! आप इस रूपको समेट लीजिये। देव! मैं कंससे डरा हुआ हूँ, इसलिये आपसे ऐसा कह रहा हूँ; क्योंकि उसने मेरे उन अत्यन्त पराक्रमी (छः) पुत्रोंको मार डाला है, जो आपसे ज्येष्ठ थे।' वसुदेवजीकी बात सुनकर अच्युतभगवान्‌ने शूरनन्दन वसुदेवजीको (अपनेको नन्दके घर पहुँचा देनेकी) आज्ञा देकर उस रूपका संवरण कर लिया। (तब वसुदेवजी उन्हें नन्दगोपके घर ले गये और) उन्हें नन्दगोपके हाथमें समर्पित करके यों बोले—'सखे! इस (बालक)की रक्षा करो, इससे यदुवंशियोंका सब प्रकारसे कल्याण होगा। देवकीके गर्भसे उत्पन्न हुआ यह बालक कंसका वध करेगा'॥ १—६॥ | | ऋषय ऊचुः<br><br>क एष वसुदेवस्तु देवकी च यशस्विनी।<br>नन्दगोपश्च कस्त्वेष यशोदा च महाव्रता॥ ७<br><br>यो विष्णुं जनयामास यं च तातेत्यभाषत।<br>या गर्भं जनयामास या चैनं त्वभ्यवर्धयत्॥ ८ | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! ये वसुदेव कौन थे, जिन्होंने भगवान् विष्णुको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और जिन्हें भगवान् 'तात-पिता' कहकर पुकारते थे तथा यशस्विनी देवकी कौन थीं, जिन्होंने भगवान्‌को अपने गर्भसे जन्म दिया? साथ ही ये नन्दगोप कौन थे तथा महाव्रतपरायणा यशोदा कौन थीं, जिन्होंने बालकरूपमें भगवान्‌का पालन-पोषण किया?॥ ७-८॥ | | सूत उवाच<br><br>पुरुषः कश्यपस्त्वासीददितिस्तु प्रिया स्मृता।<br>ब्रह्मणः कश्यपस्त्वंशः पृथिव्यास्त्वदितिस्तथा॥ ९<br><br>अथ कामान् महाबाहुर्देवक्याः समपूरयत्।<br>ये तया काङ्क्षिता नित्यमजातस्य महात्मनः॥ १०<br><br>सोऽवतीर्णो महीं देवः प्रविष्टो मानुषीं तनुम्।<br>मोहयन् सर्वभूतानि योगात्मा योगमायया॥ ११<br><br>नष्टे धर्मे तथा जज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले प्रभुः।<br>कर्तुं धर्मस्य संस्थानमसुराणां प्रणाशनम्॥ १२<br><br>रुक्मिणी सत्यभामा च सत्या नाग्नजिती तथा।<br>सुभामा च तथा शैव्या गान्धारी लक्ष्मणा तथा॥ १३<br><br>मित्रविन्दा च कालिन्दी देवी जाम्बवती तथा।<br>सुशीला च तथा माद्री कौसल्या विजया तथा।<br>एवमादीनि देवीनां सहस्राणि च षोडश॥ १४<br><br>रुक्मिणी जनयामास पुत्रान् रणविशारदान्।<br>चारुदेष्णं रणे शूरं प्रद्युम्नं च महाबलम्॥ १५ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! पुरुष (वसुदेवजी) कश्यप हैं और उनकी प्रिय पत्नी देवकी अदिति (प्रकृति) कही गयी हैं। कश्यप ब्रह्माके अंश हैं और अदिति पृथ्वीका। देवकी देवीने अजन्मा एवं महात्मा परमेश्वरसे जो कामनाएँ की थीं, उन सभी कामनाओंको महाबाहु श्रीकृष्णने पूर्ण कर दिया। वे ही योगात्मा भगवान् योगमायाके आश्रयसे समस्त प्राणियोंको मोहित करते हुए मानव-शरीर धारण करके भूतलपर अवतीर्ण हुए। उस समय धर्मका ह्रास हो चुका था, अतः धर्मकी स्थापना और असुरोंका विनाश करनेके लिये उन सामर्थ्यशाली विष्णुने वृष्णिकुलमें जन्म धारण किया। रुक्मिणी, सत्यभामा, नग्नजित्की कन्या सत्या, सुभामा, शैब्या, गान्धारराजकुमारी लक्ष्मणा, मित्रविन्दा, देवी कालिन्दी, जाम्बवती, सुशीला, मद्रराजकुमारी कौसल्या तथा विजया आदि सोलह हजार देवियाँ श्रीकृष्णकी पत्नियाँ थीं। रुक्मिणीने ग्यारह पुत्रोंको जन्म दिया; जो सभी युद्धकर्ममें निष्णात थे। उनके नाम |