मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४७ * | १६७ |
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| सुचारुं भद्रचारुं च सुदेष्णं भद्रमेव च।<br>परशुं चारुगुप्तं च चारुभद्रं सुचारुकम्।<br><br>चारुहासं कनिष्ठं च कन्यां चारुमतीं तथा॥ १६ | हैं—महाबली प्रद्युम्न, रणशूर चारुदेष्ण, सुचारु, भद्रचारु, सुदेष्ण, भद्र, परशु, चारुगुप्त, चारुभद्र, सुचारुक और सबसे छोटा चारुहास। रुक्मिणीसे एक चारुमती नामकी कन्या भी उत्पन्न हुई थी॥ ९—१६॥ |
| जज्ञिरे सत्यभामायां भानुर्भ्रमरतेक्षणः।<br>रोहितो दीप्तिमांश्चैव ताम्रश्चक्रो जलंधमः॥ १७<br>चतस्रो जज्ञिरे तेषां स्वसारस्तु यवीयसीः।<br>जाम्बवत्याः सुतो जज्ञे साम्बः समितिशोभनः॥ १८<br>मित्रवान् मित्रविन्दश्च मित्रविन्दा वराङ्गना।<br>मित्रबाहुः सुनीथश्च नाग्नजित्याः प्रजा हि सा॥ १९<br>एवमादीनि पुत्राणां सहस्राणि निबोधत।<br>शतं शतसहस्राणां पुत्राणां तस्य धीमतः॥ २०<br>अशीतिश्च सहस्राणि वासुदेवसुतास्तथा।<br>लक्षमेकं तथा प्रोक्तं पुत्राणां च द्विजोत्तमाः॥ २१<br>उपासङ्गस्य तु सुतौ वज्रः संक्षिम एव च।<br>भूरीन्द्रसेनो भूरिश्च गवेषणसुतावुभौ॥ २२<br>प्रद्युम्नस्य तु दायादो वैदर्भ्यां बुद्धिसत्तमः।<br>अनिरुद्धो रणेऽरुद्धो जज्ञेऽस्य मृगकेतनः॥ २३<br>काश्या सुपार्श्वतनया साम्बाल्लेभे तरस्विनः।<br>सत्यप्रकृतयो देवाः पञ्च वीराः प्रकीर्तिताः॥ २४<br>तिस्रः कोट्यः प्रवीराणां यादवानां महात्मनाम्।<br>षष्टिः शतसहस्राणि वीर्यवन्तो महाबलाः॥ २५<br><br>देवांशाः सर्व एवेह ह्युत्पन्नास्ते महौजसः।<br>देवासुरे हता ये च त्वसुरा ये महाबलाः॥ २६<br><br>इहोत्पन्ना मनुष्येषु बाधन्ते सर्वमानवान्।<br>तेषामुत्सादनार्थाय उत्पन्नो यादवे कुले॥ २७<br><br>कुलानां शतमेकं च यादवानां महात्मनाम्।<br>सर्वमेतत् कुलं यावद् वर्तते वैष्णवे कुले॥ २८<br><br>विष्णुस्तेषां प्रणेता च प्रभुत्वे च व्यवस्थितः।<br>निदेशस्थायिनस्तस्य कथ्यन्ते सर्वयादवाः॥ २९ | सत्यभामाके गर्भसे भानु, भ्रमरतेक्षण, रोहित, दीप्तिमान्, ताम्र, चक्र और जलन्ध नामक पुत्र उत्पन्न हुए थे। इनकी चार छोटी बहनें भी पैदा हुई थीं। जाम्बवतीके संग्रामशोभी साम्ब नामक पुत्र पैदा हुआ। श्रेष्ठ सुन्दरी मित्रविन्दाने मित्रवान् और मित्रविन्दको तथा नाग्नजिती सत्याने मित्रबाहु और सुनीथको पुत्ररूपमें जन्म दिया। इसी प्रकार अन्य पत्नियोंसे भी हजारों पुत्रोंकी उत्पत्ति समझ लीजिये। द्विजवरो! इस प्रकार उन बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके पुत्रोंकी संख्या एक करोड़ एक लाख अस्सी हजार बतलायी गयी है। उपासङ्गके दो पुत्र वज्र और संक्षिस थे। भूरीन्द्रसेन और भूरि—ये दोनों गवेषणके पुत्र थे। प्रद्युम्नके विदर्भ-राजकुमारीके गर्भसे अनिरुद्ध नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो परम बुद्धिमान् एवं युद्धमें उत्साहपूर्वक लड़नेवाला वीर था। अनिरुद्धके पुत्रका नाम मृगकेतन था। पार्श्वनन्दिनी काश्याने साम्बके संयोगसे ऐसे पाँच पुत्रोंको जन्म दिया, जो तरस्वी (एवं फुर्तीले), सत्यवादी, देवोंके समान सौन्दर्यशाली और शूरवीर थे। इस प्रकार प्रबल शूरवीर एवं महात्मा यादवोंकी संख्या तीन करोड़ थी, उनमें साठ लाख तो महाबली और महान् पराक्रमी थे। ये सभी महान् ओजस्वी यादव देवताओंके अंशसे ही भूतलपर उत्पन्न हुए थे। देवासुर-संग्राममें जो महाबली असुर मारे गये थे, वे ही भूतलपर मानव-योनिमें उत्पन्न होकर सभी मानवोंको कष्ट दे रहे थे। उन्हींका संहार करनेके लिये भगवान् यदुकुलमें अवतीर्ण हुए। इन महाभाग यादवोंके एक सौ एक कुल हैं। ये सब-के-सब कुल विष्णुसे सम्बन्धित कुलके अंदर ही वर्तमान थे। भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण) उनके नेता और स्वामी थे तथा वे सभी यादव श्रीकृष्णकी आज्ञाके अधीन रहते थे—ऐसा कहा जाता है॥ १७—२९॥ |