भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 178

१६८ * मत्स्यपुराण *


श्लोक (संस्कृत)हिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>सप्तर्षयः कुबेरश्च यक्षो मणिचरस्तथा*।<br>शालङ्किर्नारदश्चैव सिद्धो धन्वन्तरिस्तथा॥ ३०<br>आदिदेवस्तथा विष्णुरेभिस्तु सहदैवतैः।<br>किमर्थं सङ्घशो भूताः स्मृताः सम्भूतयः कति॥ ३१<br>भविष्याः कति चैवान्ये प्रादुर्भावा महात्मनः।<br>ब्रह्मक्षत्रेषु शान्तेषु किमर्थमिह जायते॥ ३२<br>यदर्थमिह सम्भूतो विष्णुर्वृष्ण्यन्धकोत्तमः।<br>पुनः पुनर्मनुष्येषु तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्॥ ३३ऋषियोंने पूछा— सूतजी! सप्तर्षि, कुबेर, यक्ष मणिचर (मणिभद्र), शालङ्कि, नारद, सिद्ध, धन्वन्तरि तथा देवसमाज—इन सबके साथ आदिदेव भगवान् विष्णु संघबद्ध होकर किसलिये अवतीर्ण होते हैं? इन महापुरुषके कितने अवतार हो चुके और भविष्यमें कितने अन्य अवतार होनेवाले हैं? ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके थक जानेपर ये किस कारण भूतलपर उत्पन्न होते हैं? वृष्णि और अन्धकवंशमें सर्वश्रेष्ठ विष्णु (श्रीकृष्ण) जिस प्रयोजनसे भूतलपर बारंबार मानव-योनिमें प्रकट होते हैं, वह सभी कारण हम सब प्रश्नकर्ताओंको बतलाइये॥ ३०—३३॥
सूत उवाच<br>त्यक्त्वा दिव्यां तनुं विष्णुर्मानुषेष्विह जायते।<br>युगे त्वथ परावृत्ते काले प्रशिथिले प्रभुः॥ ३४<br>देवासुरविमर्देषु जायते हरिरीश्वरः।<br>हिरण्यकशिपौ दैत्ये त्रैलोक्यं प्राक् प्रशासति॥ ३५<br>बलिनाधिष्ठिते चैव पुरा लोकत्रये क्रमात्।<br>सख्यमासीत् परमकं देवानामसुरैः सह॥ ३६<br>युगाख्यासुरसम्पूर्णं ह्यासीद्दत्याकुलं जगत्।<br>निदेशस्थायिनश्चापि तयोर्देवासुराः समम्॥ ३७<br>मृधो बलिविमर्दार्थं सम्प्रवृद्धः सुदारुणः।<br>देवानामसुराणां च घोरः क्षयकरो महान्॥ ३८<br>कर्तुं धर्मव्यवस्थानं जायते मानुषेष्विह।<br>भृगोः शापनिमित्तं तु देवासुरकृते तदा॥ ३९सूतजी कहते हैं— ऋषियो! युग-युगमें जब लोग धर्मसे विमुख हो जाते हैं तथा शुभ कर्मोंमें विशेषरूपसे शिथिलता आ जाती है, तब भगवान् विष्णु अपने दिव्य शरीरका त्यागकर भूतलपर मानव-योनिमें प्रकट होते हैं। पूर्वकालमें दैत्यराज हिरण्यकशिपुके त्रिलोकीका शासन करते समय देवासुर-संग्रामके अवसरपर भगवान् श्रीहरि अवतीर्ण हुए थे। इसी प्रकार क्रमशः जब बलि तीनों लोकोंपर अधिष्ठित था, उस समय देवताओंकी असुरोंके साथ प्रगाढ मैत्री हो गयी थी। ऐसा समय एक युगत्तक चलता रहा। उस समय सारा जगत् असुरोंसे व्याप्त होकर अत्यन्त व्याकुल हो उठा था। देवता और असुर—दोनों समानरूपसे उसकी आज्ञाके अधीन थे। अन्तमें (बलि-बन्धनके समय) बलिके विमर्दन करनेके लिये देवताओं और असुरोंके बीच अत्यन्त भयंकर एवं महान् विनाशकारी घोर संग्राम प्रारम्भ हो गया। तब भगवान् विष्णु धर्मकी व्यवस्था करनेके लिये तथा देवताओं और असुरोंके प्रति दिये गये भृगुके शापके कारण पृथ्वीपर मानव-योनिमें उत्पन्न हुए॥ ३४—३९॥
ऋषय ऊचुः<br>कथं देवासुरकृते व्यापारं प्राप्तवान् स्वतः।<br>देवासुरं यथा वृत्तं तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्॥ ४०ऋषियोंने पूछा— सूतजी! उस समय भगवान् विष्णु देवताओं और असुरोंके लिये अपने-आप इस अवताररूप कार्यमें कैसे प्रवृत्त हुए थे? तथा वह देवासुरसंग्राम जिस प्रकार हुआ था? वह सब हमलोगोंको बतलाइये॥ ४०॥
सूत उवाच<br>तेषां दायनिमित्तं ते संग्रामास्तु सुदारुणाः।<br>वराहाद्या दश द्वौ च षण्डामर्कोन्तरे स्मृताः॥ ४१सूतजी कहते हैं— ऋषियो! पूर्वकालमें वराह आदि बारह अत्यन्त भयंकर देवासुर-संग्राम भागप्राप्तिके निमित्त हुए थे।

* वायुपुराण ९७। ३ आदिमें मणिकर और मणिरथ पाठ है, सबका भाव 'मणिभद्र' से ही है।