मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४७ * | १६९ |
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| नामतस्तु समासेन शृणु तेषां विवक्षतः।<br>प्रथमो नारसिंहस्तु द्वितीयश्चापि वामनः॥ ४२<br><br>देवासुरक्षयकराः प्रजानां तु हिताय वै।<br>तृतीयस्तु वराहश्च चतुर्थोऽमृतमन्थनः।<br>संग्रामः पञ्चमश्चैव संजातस्तारकामयः॥ ४३<br><br>षष्ठो ह्याडीवकाख्यस्तु सप्तमस्त्रैपुरस्तथा।<br>अन्धकाख्योऽष्टमस्तेषां नवमो वृत्रघातकः॥ ४४<br><br>धात्रश्च दशमश्चैव ततो हालाहलः स्मृतः।<br>प्रथितो द्वादशस्तेषां घोरः कोलाहलस्तथा॥ ४५<br><br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो नारसिंहेन पातितः।<br>वामनेन बलिर्बद्धस्त्रैलोक्याक्रमणे पुरा॥ ४६<br><br>हिरण्याक्षो हतो द्वन्द्वे प्रतिघाते तु दैवतैः।<br>दंष्ट्रया तु वराहेण समुद्रस्तु द्विधा कृतः॥ ४७<br><br>प्रह्लादो निर्जितो युद्धे इन्द्रेणामृतमन्थने।<br>विरोचनस्तु प्रह्लादिर्नित्यमिन्द्रवधोद्यतः॥ ४८<br><br>इन्द्रेणैव तु विक्रम्य निहतस्तारकामये।<br>अशक्नुवन् स देवानां सर्वं सोढुं सदैवतम्॥ ४९<br><br>निहता दानवाः सर्वे त्रैलोक्ये त्र्यम्बकेण तु।<br>असुराश्च पिशाचाश्च दानवाश्चान्धकाहवे॥ ५०<br><br>हता देवमनुष्ये स्वे पितृभिश्चैव सर्वशः।<br>सम्पृक्तो दानवैर्वृत्रो घोरो हालाहले हतः॥ ५१<br><br>तदा विष्णुसहायेन महेन्द्रेण निवर्तितः।<br>हतो ध्वजे महेन्द्रेण मायाच्छन्नस्तु योगवित्।<br>ध्वजलक्षणमाविश्य विप्रचित्तिः सहानुजः॥ ५२ | ये सभी युद्ध शण्डामर्कके पौरोहित्यकालमें घटित हुए बतलाये जाते हैं। मैं संक्षेपमें नामनिर्देशानुसार उनका वर्णन कर रहा हूँ, सुनिये। प्रथम युद्ध नरसिंह (नृसिंहावतार)में, दूसरा वामन, तीसरा वाराह (वराहावतार)-में और चौथा अमृत-मन्थनके अवसरपर हुआ था। पाँचवाँ तारकामय संग्राम घटित हुआ था। इसी प्रकार छठा युद्ध आडीवक, सातवाँ त्रैपुर (त्रिपुरसम्बन्धी), आठवाँ अन्धक, नवाँ वृत्रघातक, दसवाँ धात्र (या वार्त्र), ग्यारहवाँ हालाहल और बारहवाँ भयंकर संग्राम कोलाहलके नामसे विख्यात है।<br>(इन संग्रामोंमें) भगवान् विष्णुने दैत्यराज हिरण्यकशिपुको नृसिंह-रूप धारण करके मार डाला था। पूर्वकालमें त्रिलोकीको नापते समय भगवान्ने वामन-रूपसे बलिको बाँध लिया था। देवताओंके साथ भगवान्ने वराहका रूप धारण करके द्वन्द्व-युद्धमें अपनी दाढ़ोंसे हिरण्याक्षको विदीर्ण कर मार डाला था और समुद्रको दो भागोंमें विभक्त कर दिया था। अमृत-मन्थनके अवसरपर घटित हुए युद्धमें इन्द्रने प्रह्लादको पराजित किया था। उससे अपमानित होकर प्रह्लाद-पुत्र विरोचन नित्य इन्द्रका वध करनेकी ताकमें लगा रहता था। वह पृथक्-पृथक् देवोंको तथा पूरे देवसमाजको सहन नहीं कर पाता था, किंतु इन्द्रने तारकामय युद्धमें पराक्रम प्रकट करके उसे यमलोकका पथिक बना दिया। त्रिलोकीमें जितने दानव, असुर और पिशाच थे, वे सभी शंकरजीद्वारा अन्धक नामक युद्धमें मौतके घाट उतारे गये। उस युद्धमें देवता, मनुष्य और पितृगण भी सब ओरसे सहायक-रूपमें उपस्थित थे। दानवोंसे घिरा हुआ भयंकर वृत्रासुर हालाहल-युद्धमें मारा गया था।* तत्पश्चात् इन्द्रने विष्णुकी सहायतासे विप्रचित्तिको युद्धसे विमुख कर दिया, परंतु योगका ज्ञाता विप्रचित्ति अपनेको मायासे छिपाकर ध्वजरूपमें परिणत कर दिया, फिर भी इन्द्रने ध्वजमें छिपे होनेपर भी अनुज-समेत उसका सफाया कर दिया। इस प्रकार देवोंकी सहायतासे इन्द्रने कोलाहल नामक युद्धमें संगठित होकर आये हुए सभी पराक्रमी दानवों और दैत्योंको पराजित किया था। (ऐसा प्रतीत होता है कि युद्धके उपरान्त देवताओंने किसी यज्ञका अनुष्ठान किया था, उस) यज्ञकी समाप्तिके अवसरपर अवभृथ-स्नानके |
* इसके ९ से ११ वीं संख्यातकके निर्दिष्ट संग्राम वृत्र-इन्द्र-विष्णु-युद्धसे ही सम्बद्ध दीखते हैं।