भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 180
१७०* मत्स्यपुराण *
दैत्यांश्च दानवांश्चैव संयतान् किल संयुतान्।<br>जयन् कोलाहले सर्वान् देवैः परिवृतो वृषा॥ ५३<br>यज्ञस्यावभृथे दृश्यौ षण्डामर्कौ तु दैवतैः।<br>एते देवासुरे वृत्ताः संग्रामा द्वादशैव तु॥ ५४<br>हिरण्यकशिपू राजा वर्षाणामर्बुदं बभौ॥ ५५<br>द्विसप्तति तथान्यानि नियुतान्यधिकानि च।<br>अशीतिं च सहस्राणि त्रैलोक्यैश्वर्यतां गतः॥ ५६<br>पर्यायेण तु राजाभूद् बलिवर्षायुतं पुनः।<br>षष्टिवर्षसहस्त्राणि नियुतानि च विंशतिः॥ ५७<br>बले राज्याधिकारस्तु यावत्कालं बभूव ह।<br>तावत्कालं तु प्रह्लादो निवृत्तो ह्यसुरैः सह॥ ५८<br>इन्द्रास्त्रयस्ते विज्ञेया असुराणां महौजसः।<br>दैत्यसंस्थमिदं सर्वमासीद् दशयुगं पुनः॥ ५९<br>त्रैलोक्यमिदमव्यग्रं महेन्द्रेणानुपाल्यते।<br>असपत्नमिदं सर्वमासीद् दशयुगं पुनः॥ ६०<br>प्रह्लादस्य हते तस्मिंस्त्रैलोक्ये कालपर्ययात्।<br>पर्यायेण तु सम्प्राप्ते त्रैलोक्यं पाकशासने।<br>ततोऽसुरान् परित्यज्य शुक्लो देवानगच्छत॥ ६१<br>यज्ञे देवानथ गतान् दितिजाः काव्यमाह्वयन्।<br>किं त्वं नो मिषतां राज्यं त्यक्त्वा यज्ञं पुनर्गतः॥ ६२<br>स्थातुं न शक्नुमो ह्यत्र प्रविशामो रसातलम्।<br>एवमुक्तोऽब्रवीद् दैत्यान् विषण्णान् सान्त्वयन् गिरा॥ ६३<br>मा भैष्ट धारयिष्यामि तेजसा स्वेन वोऽसुराः।<br>मन्त्राश्चौषधयश्चैव रसा वसु च यत्परम्॥ ६४<br>कृत्स्नानि मयि तिष्ठन्ति पादस्तेषां सुरेषु वै।<br>तत् सर्वं वः प्रदास्यामि युष्मदर्थे धृता मया॥ ६५समय षण्ड और अमर्क नामक दोनों दैत्यपुरोहित देवताओंके दृष्टिगोचर हुए थे। इस प्रकार ये बारह युद्ध देवताओं और असुरोंके बीच घटित हुए थे, जो देवताओं और असुरोंके विनाशक और प्रजाओंके लिये हितकारी थे॥ ४१—५४॥<br><br>पूर्वकालमें राजा हिरण्यकशिपु एक अरब सात करोड़ बीस लाख अस्सी हजार वर्षोंतक त्रिलोकीके ऐश्वर्यका उपभोग करता हुआ (सिंहासनपर) विराजमान था। तदनन्तर पर्यायक्रमसे बलि राजा हुए। इनका शासनकाल दो करोड़ सत्तर हजार वर्षोंतक था। जितने समयतक बलिको शासनकाल था, उतने कालतक प्रह्लाद अपने अनुयायी असुरोंके साथ निवृत्तिमार्गपर अवलम्बित रहे। इन महान् ओजस्वी तीनों दैत्योंको असुरोंका इन्द्र (अध्यक्ष) जानना चाहिये। इस प्रकार दस युगपर्यन्त यह सारा विश्व दैत्योंके अधीन था। पुनः कालक्रमानुसार गत युद्धमें प्रह्लादके मारे जानेपर पर्याय-क्रमसे त्रिलोकीका राज्य इन्द्रके हाथोंमें आ गया। उस समय दस युगतक यह विश्व शत्रुहीन था, तब इन्द्र निश्चिन्ततापूर्वक त्रिलोकीका पालन कर रहे थे। उसी समय शुक्राचार्य असुरोंका परित्याग कर एक देवयज्ञमें चले आये। इस प्रकार यज्ञके अवसरपर शुक्राचार्यको देवताओंके पक्षमें गया हुआ देखकर दैत्योंने शुक्राचार्यको उपालम्भ देते हुए कहा—'गुरुदेव! आप हमलोगोंके देखते-देखते हमारे राज्यको छोड़कर देवताओंके यज्ञमें क्यों चले गये? अब हमलोग यहाँ किसी प्रकार ठहर नहीं सकते, अतः रसातलमें प्रवेश कर जायँगे।' दैत्योंके इस प्रकार गिड़गिड़ानेपर शुक्राचार्य उन दुःखी दैत्योंको मधुर वाणीसे सान्त्वना देते हुए बोले—'असुरो! तुमलोग डरो मत, मैं अपने तेजोबलसे पुनः तुमलोगोंको धारण करूँगा अर्थात् अपनाऊँगा; क्योंकि त्रिलोकीमें जितने मन्त्र, ओषधि, रस और धन-सम्पत्ति हैं, वे सब-के-सब मेरे पास हैं।* इनका चतुर्थांश ही देवोंके अधिकारमें है। मैं वह सारा-का-सारा तुमलोगोंको प्रदान कर दूंगा; क्योंकि तुम्हीं लोगोंके लिये ही मैंने उन्हें धारण कर रखा है'॥ ५५—६५॥

* महाभारत उद्योगपर्व तथा भीष्मपर्व ६। २२-२३ में भी शुक्रको ही धन-रत्नोंका अधिकारी कहा गया है।