मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ४७ * १७१
| ततो देवास्तु तान् दृष्ट्वा वृतान् काव्येन धीमता।<br>सम्मन्त्रयन्ति देवा वै संविज्ञास्तु जिघृक्षया॥ ६६<br>काव्यो ह्येष इदं सर्वं व्यावर्तयति नो बलात्।<br>साधु गच्छामहे तूर्णं यावन्नाध्यापयिष्यति॥ ६७<br>प्रसह्य हत्वा शिष्टांस्तु पातालं प्रापयामहे।<br>ततो देवास्तु संरब्धा दानवानुपसृत्य ह॥ ६८<br>ततस्ते वध्यमानास्तु काव्यमेवाभिदुद्रुवुः।<br>ततः काव्यस्तु तान् दृष्ट्वा तूर्णं देवैरभिद्रुतान्॥ ६९<br>रक्षां काव्येन संहृत्य देवास्तेऽप्यसुरादिताः।<br>काव्यं दृष्ट्वा स्थितं देवा निःशङ्कमसुरा जहुः॥ ७०<br>ततः काव्योऽनुचिन्त्याथ ब्राह्मणो वचनं हितम्।<br>तानुवाच ततः काव्यः पूर्वं वृत्तमनुस्मरन्॥ ७१<br>त्रैलोक्यं वो हृतं सर्वं वामनेन त्रिभिः क्रमैः।<br>बलिर्बद्धो हतो जम्भो निहतश्च विरोचनः॥ ७२<br>महासुरा द्वादशसु संग्रामेषु शरैर्हताः।<br>तैस्तैरुपायैर्भूयिष्ठं निहता वः प्रधानतः॥ ७३<br>किञ्चिच्छिष्टास्तु यूयं वै युद्धं मास्त्विति मे मतम्।<br>नीतयो वोऽभिधास्यामि तिष्ठध्वं कालपर्ययात्॥ ७४<br>यास्याम्यहं महादेवं मन्त्रार्थं विजयावहम्।<br>अप्रतीपांस्ततो मन्त्रान् देवात् प्राप्य महेश्वरात्।<br>युध्यामहे पुनर्देवांस्ततः प्राप्स्यथ वै जयम्॥ ७५<br>ततस्ते कृतसंवादा देवानूचुस्तदासुराः।<br>न्यस्तशस्त्रा वयं सर्वे निःसंनाहा रथैर्विना॥ ७६<br>वयं तपश्चरिष्यामः संवृता वल्कलैर्वने।<br>प्रह्लादस्य वचः श्रुत्वा सत्याभिव्याहृतं तु तत्॥ ७७<br>ततो देवा न्यवर्तन्त विज्वरा मुदिताश्च ते।<br>न्यस्तशस्त्रेषु दैत्येषु विनिवृत्तास्तदा सुराः॥ ७८ | तदनन्तर जब देवताओंने देखा कि बुद्धिमान् शुक्राचार्यने पुनः असुरोंका पक्ष ग्रहण कर लिया है, तब विचारशील देवगण समग्र राज्य ग्रहण करनेके विषयमें मन्त्रणा करते हुए कहने लगे—'भाइयो! ये शुक्राचार्य हमलोगोंके सभी कार्योंको बलपूर्वक उलट-पलट देंगे, अतः ठीक तो यही होगा कि जबतक ये उन असुरोंको सिखा-पढ़ाकर बली नहीं बना देते, उसके पूर्व ही हमलोग यहाँसे शीघ्र चलें और उन्हें बलपूर्वक मार डालें तथा बचे हुए लोगोंको पातालमें भाग जानेके लिये विवश कर दें।' ऐसा परामर्श करके देवगण दानवोंके निकट जाकर उनपर टूट पड़े। इस प्रकार अपना संहार होते देखकर असुरगण शुक्राचार्यकी शरणमें भाग चले। तब शुक्राचार्यने असुरोंको देवताओंद्वारा खदेड़ा गया देखकर तुरंत ही उनकी रक्षाका विधान किया। इससे उलटे देवता ही असुरोंद्वारा पीड़ित किये जाने लगे। तब देवगण वहाँ शुक्राचार्यको निःशङ्क भावसे स्थित देखकर असुरोंके सामनेसे हट गये। तदनन्तर ब्राह्मण शुक्राचार्य पूर्वमें घटित हुए वृत्तान्तका स्मरण करते हुए बहुत सोच-विचारकर असुरोंसे हितकारक वचन बोले—'असुरो! वामनद्वारा अपने तीन पगोंसे (बलिद्वारा शासित) सम्पूर्ण त्रिलोकीका राज्य छीन लिया गया, बलि बाँध लिया गया, जम्भासुरका वध हुआ और विरोचनका भी निधन हुआ। इस प्रकार बारह युद्धोंमें तुमलोगोंमें जो प्रधान-प्रधान महाबली असुर थे, वे सभी देवताओंद्वारा तरह-तरहके उपायोंका आश्रय लेकर मार डाले गये। अब थोड़ा-बहुत तुमलोग शेष रह गये हो, अतः मेरा विचार है कि अभी तुमलोग युद्ध बंद कर दो और कालके विपर्ययको देखते हुए चुपचाप शान्त हो जाओ। पीछे मैं तुमलोगोंको नीति बतलाऊँगा। मैं आज ही विजय प्रदान करनेवाले मन्त्रकी प्राप्तिके लिये महादेवजीके पास जा रहा हूँ। जब मैं देवाधिदेव महेश्वरसे उन अमोघ मन्त्रोंको प्राप्त करके लौटूँ, तब पुनः मेरे सहयोगसे तुमलोग देवताओंके साथ युद्ध करना, उस समय तुम्हें विजय प्राप्त होगी'—॥ ६६-७५ ॥<br><br>इस प्रकार परस्पर युद्धविषयक परामर्श करके उन असुरोंने देवताओंके पास जाकर कहा—'देवगण! इस समय हम सभी लोगोंने अपने शस्त्रास्त्रोंको रख दिया है, कवचोंको उतार दिया है और रथोंको छोड़ दिया है। अब हमलोग वल्कल-वस्त्र धारण करके वनमें छिपकर तपस्या करेंगे।' सत्यवादी प्रह्लादके उस सत्य वचनको सुनकर तथा दैत्योंके शस्त्रास्त्र रख देनेपर देवतालोग प्रसन्न हो गये। उनकी चिन्ता नष्ट हो गयी और वे युद्धसे विरत |