भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१७२ * मत्स्यपुराण *


| ततस्तानब्रवीत् काव्यः कञ्चित्कालमुपास्यथ।<br>निरुत्सिक्तास्तपोयुक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम्॥ ७९<br><br>पितुर्ममाश्रमस्था वै मां प्रतीक्षथ दानवाः।<br>तत्सन्दिश्यासुरान् काव्यो महादेवं प्रपद्यत॥ ८०<br><br>शुक्र उवाच<br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ।<br>पराभवाय देवानामसुरणां जयाय च॥ ८१<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् देवो व्रतं त्वं चर भार्गव।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ ८२<br><br>तथेति समनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनन्दनः।<br>पादौ संस्पृश्य देवस्य बाढमित्यब्रवीद् वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाऽऽदिष्टोऽद्य वै प्रभो॥ ८३<br><br>ततोऽनुसृष्टो देवेन कुण्डधारोऽस्य धूमकृत्।<br>तदा तस्मिन् गते शुक्रे ह्यसुराणां हिताय वै।<br>मन्त्रार्थं तत्र वसति ब्रह्मचर्यं महेश्वरे॥ ८४<br><br>तद् बुद्ध्वा नीतिपूर्वं तु राज्ये न्यस्ते तदा सुरैः।<br>अस्मिंश्छिद्रे तदामर्षाद् देवास्तान् समुपाद्रवन्॥ ८५<br><br>दंशिताः सायुधाः सर्वे बृहस्पतिपुरःसराः॥ ८६<br><br>दृष्ट्वासुरगणा देवान् प्रगृहीतायुधान् पुनः।<br>उत्पेतुः सहसा ते वै संत्रस्तास्तान् वचोऽब्रुवन्॥ ८७<br><br>न्यस्ते शस्त्रेऽभये दत्ते आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वा भवन्तो ह्यभयं सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ८८<br><br>अनाचार्या वयं देवास्त्यक्तशस्त्रास्तवस्थिताः।<br>चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ८९<br><br>रणे विजेतुं देवांश्च न शक्ष्यामः कथञ्चन।<br>अयुद्धेन प्रपत्स्यामः शरणं काव्यमातरम्॥ ९० | हो गये। युद्ध बंद हो जानेपर शुक्राचार्यने असुरोंसे कहा—'दानवो! तुमलोग अपने अभिमान आदि कुप्रवृत्तियोंका त्याग कर तपस्यामें लग जाओ और कुछ कालतक उपासना करो; क्योंकि काल ही अभीष्ट कार्यका साधक होता है। इस प्रकार तुमलोग मेरे पिताजीके आश्रममें निवास करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षा करो।' असुरोंको ऐसी शिक्षा देकर शुक्राचार्य महादेवजीके पास जा पहुँचे (और उनसे निवेदन करने लगे)॥ ७६—८०॥<br><br>शुक्राचार्यने कहा—'देव! मैं देवताओंके पराभव तथा असुरोंकी विजयके लिये आपसे उन मन्त्रोंको जानना चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके पास नहीं हैं।' ऐसा कहे जानेपर महादेवजीने कहा—'भार्गव! तुम्हारा कल्याण हो। इसके लिये तुम्हें कठोर व्रतका पालन करना पड़ेगा। यदि तुम पूरे एक सहस्र वर्षोंतक नीचा सिर करके कनीके धुएँका पान करोगे, तब कहीं तुम्हें उन मन्त्रोंकी प्राप्ति हो सकेगा।' तब भृगुनन्दन शुक्रने महादेवजीकी आज्ञा शिरोधार्य कर उनके चरणोंका स्पर्श किया और कहा—'देव! ठीक है, मैं वैसा ही करूँगा। प्रभो! मैं आजसे ही आपके आदेशानुसार व्रतपालनमें लग रहा हूँ।' इस प्रकार महादेवजीसे विदा होकर शुक्राचार्य धूमको उत्पन्न करनेवाले कुण्डधार यक्षके निकट गये और असुरोंके हितार्थ मन्त्रप्राप्तिके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक महेश्वरके आश्रममें निवास करने लगे। तदनन्तर जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि असुरोंद्वारा राज्य छोड़नेमें ऐसी कूटनीति और यह छिद्र था, तब वे अमर्षसे भर गये; फिर तो वे संगठित हो कवच धारणकर हथियारोंसे सुसज्जित हो बृहस्पतिजीको आगे करके असुरोंपर टूट पड़े॥ ८१—८६॥<br><br>इस प्रकार पुनः देवताओंको आयुध धारण करके आक्रमण करते देख असुरगण सहसा भयभीत होकर उठ खड़े हुए और देवताओंसे बोले—'देवगण! हमलोगोंने शस्त्रास्त्र रख दिया है, आपलोगोंद्वारा हमें अभयदान मिल चुका है, मेरे गुरुदेव इस समय व्रतमें स्थित हैं—ऐसी परिस्थितिमें अभय-दान देकर भी आपलोग हमारा वध करनेकी इच्छासे क्यों आये हैं? इस समय हमलोग बिना गुरुके हैं, शस्त्रास्त्रोंका परित्याग करके निहत्थे खड़े हैं, तपस्वियोंकी भाँति चीर और काला मृगचर्म धारण किये हुए हैं, निष्क्रिय और परिग्रहरहित हैं। ऐसी दशामें हम किसी प्रकार भी युद्धमें आप देवताओंको जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः बिना युद्ध किये ही काव्यकी माताकी शरणमें जा रहे हैं। |