मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 183
| * अध्याय ४७ * | १७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यापयामः कृच्छ्रमिदं यावदभ्येति नो गुरुः।<br>निवृत्ते च तथा शुक्रे योत्स्यामो दंशितायुधाः ॥ ९१<br><br>एवमुक्त्वासुरान्योऽन्यं शरणं काव्यमातरम्।<br>प्रापद्यन्त ततो भीतास्तेभ्योऽदादभयं तु सा॥ ९२<br><br>न भेतव्यं न भेतव्यं भयं त्यजत दानवाः।<br>मत्संनिधौ वर्ततां वो न भीर्भवितुमर्हति ॥ ९३ | वहाँ हमलोग इस विषम संकटके समयको तबतक व्यतीत करेंगे, जबतक हमारे गुरुदेव लौटकर आ नहीं जाते। गुरुदेव शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर हमलोग कवच और शस्त्रास्त्रसे लैस होकर आपलोगोंके साथ युद्ध करेंगे।' इस प्रकार भयभीत हुए असुरगण परस्पर परामर्श करके शुक्राचार्यकी माताकी शरणमें चले गये। तब उन्होंने असुरोंको अभयदान देते हुए कहा—'दानवो! मत डरो, मत डरो, भय छोड़ दो। मेरे निकट रहते हुए तुमलोगोंको किसी प्रकारका भय नहीं प्राप्त हो सकता' ॥८७—९३॥ |
| तथा चाभ्युपपन्नांस्तान् दृष्ट्वा देवास्ततोऽसुरान्।<br>अभिजग्मुः प्रसह्यैतानविचार्य बलाबलम् ॥ ९४<br><br>ततस्तान् बाध्यमानांस्तु देवैर्दृष्ट्वासुरांस्तदा।<br>देवी क्रुद्धाब्रवीद् देवाननिन्द्रान् वः करोम्यहम् ॥ ९५<br><br>सम्भृत्य सर्वसम्भारानिन्द्रं साभ्यचरत् तदा।<br>तस्तम्भ देवी बलवद् योगयुक्ता तपोधना ॥ ९६<br><br>ततस्तं स्तम्भितं दृष्ट्वा इन्द्रं देवाश्च मूकवत्।<br>प्राद्रवन्त ततो भीता इन्द्रं दृष्ट्वा वशीकृतम् ॥ ९७<br><br>गतेषु सुरसंघेषु शक्रं विष्णुरभाषत।<br>मां त्वं प्रविश भद्रं ते नयिष्ये त्वां सुरोत्तम ॥ ९८<br><br>एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरंदरः।<br>विष्णुना रक्षितं दृष्ट्वा देवी क्रुद्धा वचोऽब्रवीत् ॥ ९९<br><br>एषा त्वां विष्णुना सार्धं दहामि मघवन् बलात्।<br>मिषतां सर्वभूतानां दृश्यतां मे तपोबलम् ॥१०० | तत्पश्चात् शुक्रमाताद्वारा असुरोंको सुरक्षित देखकर देवताओंने बलाबलका (कौन बलवान् है, कौन दुर्बल है—ऐसा) विचार न करके बलपूर्वक उनपर धावा बोल दिया। उस समय देवताओंद्वारा उन असुरोंको पीड़ित किया जाता हुआ देखकर (शुक्रमाता ख्याति) देवी क्रुद्ध होकर देवताओंसे बोलीं—'मैं अभी-अभी तुमलोगोंको इन्द्र-रहित कर देती हूँ।' उस समय उन तपस्विनी एवं योगिनी देवीने सभी सामग्रियोंको एकत्र करके अभिचार-मन्त्रका प्रयोग किया और बलपूर्वक इन्द्रको स्तम्भित कर दिया। अपने स्वामी इन्द्रको स्तम्भित हुआ देखकर देवगण मूक-से हो गये और इन्द्रको असुरोंके वशीभूत हुआ देखकर वहाँसे भाग खड़े हुए। देवगणके भाग जानेपर भगवान् विष्णुने इन्द्रसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरे शरीरमें प्रवेश कर जाओ, मैं तुम्हें यहाँसे अन्यत्र पहुँचा दूँगा।' ऐसा कहे जानेपर इन्द्र भगवान् विष्णुके शरीरमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार भगवान् विष्णुद्वारा इन्द्रको सुरक्षित देखकर (ख्याति) देवी कुपित होकर ऐसा वचन बोली—'मघवन्! यह मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके देखते-देखते विष्णुसहित तुमको बलपूर्वक जलाये देती हूँ। तुम दोनों मेरे तपोबलको देखो' ॥९४—१००॥ |
| भयाभिभूतौ तौ देवाविन्द्रविष्णू बभूवतुः।<br>कथं मुच्येव सहितौ विष्णुरिन्द्रमभाषत ॥ १०१<br><br>इन्द्रोऽब्रवीज्जहि होनां यावन्नौ न दहेत् प्रभो।<br>विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं जहि मा चिरम् ॥ १०२<br><br>ततः समीक्ष्य विष्णुस्तां स्त्रीवधे कृच्छ्रमास्थितः।<br>अभिध्याय ततश्चक्रमापदुद्धरणे तु तत् ॥ १०३ | यह सुनकर वे दोनों देवता—इन्द्र और विष्णु भयभीत हो गये। तब विष्णुने इन्द्रसे कहा—'हम दोनों एक साथ किस प्रकार (इस संकटसे) मुक्त हो सकेंगे?' यह सुनकर इन्द्र बोले—'प्रभो! जबतक यह हम दोनोंको जला नहीं देती है, उसके पूर्व ही आप इसे मार डालिये। मैं तो आपके द्वारा विशेषरूपसे अभिभूत हो चुका हूँ, इसलिये आप ही इसका वध कर दीजिये, अब विलम्ब मत कीजिये।' तब भगवान् विष्णु एक ओर उस देवीकी |