मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततस्तु त्वरया युक्तः शीघ्रकारी भयान्वितः।<br>ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्याः क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्।<br>क्रुद्धः स्वमस्त्रमादाय शिरश्चिच्छेद वै भिया॥ १०४<br><br>तं दृष्ट्वा स्त्रीवधं घोरं चुक्रोध भृगुरीश्वरः।<br>ततोऽभिशप्तो भृगुणा विष्णुर्भार्यावधे तदा॥ १०५<br><br>यस्मात् ते जानतो धर्ममवध्या स्त्री निषूदिता।<br>तस्मात् त्वं सप्तकृत्वेह मानुषेषूपपत्स्यसि॥ १०६<br><br>ततस्तेनाभिशापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ १०७ | भीषण दुर्भावना—दुश्चेष्टा तथा दूसरी ओर स्त्रीवधरूप घोर पापको देखकर गम्भीर चिन्तामें पड़ गये। फिर उस देवीके क्रूर विचारको जानकर उस आपत्तिसे उद्धार पानेके लिये उन्होंने अपने सुदर्शन चक्रका ध्यान किया। अस्त्रके आ जानेपर शीघ्र ही कार्य-सम्पादन करनेमें निपुण एवं भयभीत विष्णु क्रुद्ध हो उठे और तुरंत ही उन्होंने अपना अस्त्र लेकर (पापसे) डरते-डरते उसके सिरको काट गिराया। इधर ऐश्वर्यशाली भृगु उस भयंकर स्त्री-वधको देख कुपित हो गये और वे उस भार्या-वधको निमित्त बनाकर भगवान् विष्णुको शाप देते हुए बोले—'विष्णो! चूँकि 'स्त्री अवध्य होती है'—इस धर्मको जानते हुए भी तुमने मेरी भार्याका प्राण हरण किया है, अतः तुम मृत्युलोकमें सात बार मानव-योनिमें जन्म धारण करोगे।' उसी शापके कारण धर्मका ह्रास हो जानेपर भगवान् विष्णु लोकके कल्याणके लिये मृत्युलोकमें पुनः-पुनः मानव-योनिमें अवतीर्ण होते हैं*॥ १०४-१०७॥ |
| अनुव्याहृत्य विष्णुं स तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>समानीय ततः कायमसौ गृहेदमब्रवीत्॥ १०८<br><br>एषा त्वं विष्णुना देवि हता संजीवयाम्यहम्।<br>ततस्तां योज्य शिरसा अभिजीवेति सोऽब्रवीत्॥ १०९<br><br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा।<br>तेन सत्येन जीवस्व यदि सत्यं वदाम्यहम्॥ ११०<br><br>ततस्तां प्रोक्ष्य शीताभिरद्भिर्जीवेति सोऽब्रवीत्।<br>ततोऽभव्व्याहृते तस्य देवी सा जीविता तदा॥ १११<br><br>ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति चक्रुस्ते वचसा सर्वतो दिशम्॥ ११२<br><br>एवं प्रत्याहृता तेन देवी सा भृगुणा तदा।<br>मिषतां देवतानां हि तदद्भुतमिवाभवत्॥ ११३ | भगवान् विष्णुको ऐसा शाप देकर भृगुने फिर तुरंत ही (ख्यातिके) उस सिरको उठा लिया और उसे देवीके शरीरके निकट लाकर तथा उस शरीरसे जोड़कर इस प्रकार कहा—'देवि! यह तुम विष्णुद्वारा मार डाली गयी हो, अब मैं तुम्हें पुनः जिलाये देता हूँ।' यों कहकर उसके शरीरको सिरसे जोड़कर कहा—'जी उठो'। पुनः वे प्रतिज्ञा करते हुए बोले—'यदि मैं सम्पूर्ण धर्मोंको जानता हूँ तथा मेरे द्वारा सम्पूर्ण धर्मोंका आचरण भी किया गया हो अथवा यदि मैं सत्यवादी होऊँ तो उस सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ।' तत्पश्चात् देवीके शरीरका शीतल जलसे प्रोक्षण करके उन्होंने पुनः कहा—'जीवित हो जाओ!' भृगुके यों कहते ही देवी तुरंत जीवित होकर उठ बैठी। उस देवीको सोकर उठी हुईकी भाँति जीवित देखकर सभी प्राणी 'ठीक है, ठीक है'—ऐसा कहने लगे। उनका वह साधुवाद सभी दिशाओंमें गूँज उठा। इस प्रकार महर्षि भृगुने सभी देवताओंके देखते-देखते देवीको पुनः जीवन प्रदान कर दिया, यह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ १०८-११३॥ |
| असम्भ्रान्तेन भृगुणा पत्नीं संजीवितां पुनः।<br>दृष्ट्वा चेन्द्रो नालभत शर्म काव्यभयात् पुनः।<br>प्रजागरे ततश्चेन्द्रो जयन्तीमिदमब्रवीत्॥ ११४ | इस प्रकार व्यवस्थित चित्तवाले भृगुद्वारा अपनी पत्नीको जीवित किया हुआ देखकर इन्द्रको शुक्राचार्यके भयसे शान्ति नहीं मिल पा रही थी। वे रातभर जागते ही रहते। अन्तमें बुद्धिमान् इन्द्र बहुत कुछ सोच-विचारकर अपनी कन्या जयन्तीसे यह वचन बोले— |
* यह कथा वाल्मीकीय रामायण १। २४। २१-२५, योगवासिष्ठ १। १। ६१-६५ तथा भविष्यपुराण ४। ६३। १-१३ में भी आती है।