मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 185, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ें- अध्याय ४७ * | १७५ ---|---
| संचिन्त्य मतिमान् वाक्यं स्वां कन्यां पाकशासनः।<br>एष काव्यो ह्यमित्राय व्रतं चरति दारुणम्।<br>तेनाहं व्याकुलः पुत्रि कृतो मतिमता भृशम्॥ ११५<br><br>गच्छ संसाधयस्वैनं श्रमापनयनैः शुभैः।<br>तैस्तैर्मनोऽनुकूलैश्च ह्युपचारैरतन्द्रिता॥ ११६<br><br>काव्यमाराधयस्वैनं यथा तुष्येत स द्विजः।<br>गच्छ त्वं तस्य दत्तासि प्रयत्नं कुरु मत्कृते॥ ११७<br><br>एवमुक्ता जयन्ती सा वचः संगृह्य वै पितुः।<br>अगच्छद् यत्र घोरं स तप आरभ्य तिष्ठति॥ ११८<br><br>तं दृष्ट्वा तु पिबन्तं सा कणधूममवाङ्मुखम्।<br>यक्षेण पात्यमानं च कुण्डधारेण पातितम्॥ ११९<br><br>दृष्ट्वा च तं पात्यमानं देवी काव्यमवस्थितम्।<br>स्वरूपध्यानशाम्यं तं दुर्बलं भूतिमास्थितम्।<br>पित्रा यथोक्तं वाक्यं सा काव्ये कृतवती तदा॥ १२०<br><br>गीर्भिश्चैवानुकूलाभिः स्तुवती वल्गुभाषिणी।<br>गात्रसंवाहनैः काले सेवमाना त्वचः सुखैः।<br>व्रतचर्यानुकूलाभिरुवास बहुलाः समाः॥ १२१<br><br>पूर्वेऽथवा व्रते तस्मिन् घोरे वर्षसहस्रके।<br>वरेण च्छन्दयामास काव्यं प्रीतो भवस्तदा॥ १२२ | 'बेटी! ये शुक्राचार्य मेरे शत्रुओंके हितार्थ भीषण व्रतका अनुष्ठान कर रहे हैं। इससे बुद्धिमान् काव्य (उन शुक्राचार्य)-ने मुझे अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, अतः तुम उनके पास जाओ और मेरा कार्य सिद्ध करो। वहाँ तुम आलस्यरहित होकर थकावटको दूर करनेवाले तथा उनके मनोऽनुकूल विभिन्न प्रकारके शुभ उपचारोंद्वारा शुक्राचार्यकी ऐसी उत्तम आराधना करो, जिससे वे ब्राह्मण प्रसन्न हो जायें। जाओ, आज मैं तुम्हें शुक्राचार्यको समर्पित कर दे रहा हूँ। तुम मेरे कल्याणके लिये प्रयत्न करो।' इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्रपुत्री जयन्ती पिताके वचनको अङ्गीकार करके उस स्थानके लिये प्रस्थित हुई, जहाँ बैठकर शुक्राचार्य भीषण तपका अनुष्ठान कर रहे थे। वहाँ जाकर जयन्तीने शुक्राचार्यको नीचे मुख किये हुए कुण्डधार नामक यक्षद्वारा गिराये गये तथा गिराये जाते हुए कण-धूमका पान करते हुए देखा। उनके निकट जाकर जयन्तीने जब यह लक्ष्य किया कि शुक्राचार्य उस गिराये जाते हुए धूमका पान करते हुए अपने स्वरूपके ध्यानमें शान्तभावसे अवस्थित हैं, उनके शरीरपर विभूति लगी है और वे अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं, तब पिताने जैसी सीख दी थी, उसीके अनुसार वह शुक्राचार्यके प्रति व्यवहार करने लगी। मधुर भाषण करनेवाली जयन्ती अनुकूल वचनोंद्वारा शुक्राचार्यकी स्तुति करती थी, समय-समयपर उनके सिर-हाथ-पैर आदि अङ्गोंको दबाकर उनकी सेवा करती थी। इस प्रकार व्रतचर्याके अनुकूल प्रवृत्तियोंद्वारा उनकी सेवा करती हुई वह बहुत वर्षोंतक उनके निकट निवास करती रही। एक सहस्र वर्षकी अवधिवाले उस भयंकर धूमव्रतके पूर्ण होनेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और शुक्राचार्यको वर प्रदान करते हुए बोले— ॥ ११४—१२२ ॥ |