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मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

१७२ * मत्स्यपुराण *


| ततस्तानब्रवीत् काव्यः कञ्चित्कालमुपास्यथ।<br>निरुत्सिक्तास्तपोयुक्ताः कालं कार्यार्थसाधकम्॥ ७९<br><br>पितुर्ममाश्रमस्था वै मां प्रतीक्षथ दानवाः।<br>तत्सन्दिश्यासुरान् काव्यो महादेवं प्रपद्यत॥ ८०<br><br>शुक्र उवाच<br>मन्त्रानिच्छाम्यहं देव ये न सन्ति बृहस्पतौ।<br>पराभवाय देवानामसुरणां जयाय च॥ ८१<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीद् देवो व्रतं त्वं चर भार्गव।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं तु कणधूममवाक्शिराः।<br>यदि पास्यसि भद्रं ते ततो मन्त्रानवाप्स्यसि॥ ८२<br><br>तथेति समनुज्ञाप्य शुक्रस्तु भृगुनन्दनः।<br>पादौ संस्पृश्य देवस्य बाढमित्यब्रवीद् वचः।<br>व्रतं चराम्यहं देव त्वयाऽऽदिष्टोऽद्य वै प्रभो॥ ८३<br><br>ततोऽनुसृष्टो देवेन कुण्डधारोऽस्य धूमकृत्।<br>तदा तस्मिन् गते शुक्रे ह्यसुराणां हिताय वै।<br>मन्त्रार्थं तत्र वसति ब्रह्मचर्यं महेश्वरे॥ ८४<br><br>तद् बुद्ध्वा नीतिपूर्वं तु राज्ये न्यस्ते तदा सुरैः।<br>अस्मिंश्छिद्रे तदामर्षाद् देवास्तान् समुपाद्रवन्॥ ८५<br><br>दंशिताः सायुधाः सर्वे बृहस्पतिपुरःसराः॥ ८६<br><br>दृष्ट्वासुरगणा देवान् प्रगृहीतायुधान् पुनः।<br>उत्पेतुः सहसा ते वै संत्रस्तास्तान् वचोऽब्रुवन्॥ ८७<br><br>न्यस्ते शस्त्रेऽभये दत्ते आचार्ये व्रतमास्थिते।<br>दत्त्वा भवन्तो ह्यभयं सम्प्राप्ता नो जिघांसया॥ ८८<br><br>अनाचार्या वयं देवास्त्यक्तशस्त्रास्तवस्थिताः।<br>चीरकृष्णाजिनधरा निष्क्रिया निष्परिग्रहाः॥ ८९<br><br>रणे विजेतुं देवांश्च न शक्ष्यामः कथञ्चन।<br>अयुद्धेन प्रपत्स्यामः शरणं काव्यमातरम्॥ ९० | हो गये। युद्ध बंद हो जानेपर शुक्राचार्यने असुरोंसे कहा—'दानवो! तुमलोग अपने अभिमान आदि कुप्रवृत्तियोंका त्याग कर तपस्यामें लग जाओ और कुछ कालतक उपासना करो; क्योंकि काल ही अभीष्ट कार्यका साधक होता है। इस प्रकार तुमलोग मेरे पिताजीके आश्रममें निवास करते हुए मेरे लौटनेकी प्रतीक्षा करो।' असुरोंको ऐसी शिक्षा देकर शुक्राचार्य महादेवजीके पास जा पहुँचे (और उनसे निवेदन करने लगे)॥ ७६—८०॥<br><br>शुक्राचार्यने कहा—'देव! मैं देवताओंके पराभव तथा असुरोंकी विजयके लिये आपसे उन मन्त्रोंको जानना चाहता हूँ, जो बृहस्पतिके पास नहीं हैं।' ऐसा कहे जानेपर महादेवजीने कहा—'भार्गव! तुम्हारा कल्याण हो। इसके लिये तुम्हें कठोर व्रतका पालन करना पड़ेगा। यदि तुम पूरे एक सहस्र वर्षोंतक नीचा सिर करके कनीके धुएँका पान करोगे, तब कहीं तुम्हें उन मन्त्रोंकी प्राप्ति हो सकेगा।' तब भृगुनन्दन शुक्रने महादेवजीकी आज्ञा शिरोधार्य कर उनके चरणोंका स्पर्श किया और कहा—'देव! ठीक है, मैं वैसा ही करूँगा। प्रभो! मैं आजसे ही आपके आदेशानुसार व्रतपालनमें लग रहा हूँ।' इस प्रकार महादेवजीसे विदा होकर शुक्राचार्य धूमको उत्पन्न करनेवाले कुण्डधार यक्षके निकट गये और असुरोंके हितार्थ मन्त्रप्राप्तिके लिये ब्रह्मचर्यपूर्वक महेश्वरके आश्रममें निवास करने लगे। तदनन्तर जब देवताओंको यह ज्ञात हुआ कि असुरोंद्वारा राज्य छोड़नेमें ऐसी कूटनीति और यह छिद्र था, तब वे अमर्षसे भर गये; फिर तो वे संगठित हो कवच धारणकर हथियारोंसे सुसज्जित हो बृहस्पतिजीको आगे करके असुरोंपर टूट पड़े॥ ८१—८६॥<br><br>इस प्रकार पुनः देवताओंको आयुध धारण करके आक्रमण करते देख असुरगण सहसा भयभीत होकर उठ खड़े हुए और देवताओंसे बोले—'देवगण! हमलोगोंने शस्त्रास्त्र रख दिया है, आपलोगोंद्वारा हमें अभयदान मिल चुका है, मेरे गुरुदेव इस समय व्रतमें स्थित हैं—ऐसी परिस्थितिमें अभय-दान देकर भी आपलोग हमारा वध करनेकी इच्छासे क्यों आये हैं? इस समय हमलोग बिना गुरुके हैं, शस्त्रास्त्रोंका परित्याग करके निहत्थे खड़े हैं, तपस्वियोंकी भाँति चीर और काला मृगचर्म धारण किये हुए हैं, निष्क्रिय और परिग्रहरहित हैं। ऐसी दशामें हम किसी प्रकार भी युद्धमें आप देवताओंको जीतनेमें समर्थ नहीं हैं, अतः बिना युद्ध किये ही काव्यकी माताकी शरणमें जा रहे हैं। |

* अध्याय ४७ *१७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यापयामः कृच्छ्रमिदं यावदभ्येति नो गुरुः।<br>निवृत्ते च तथा शुक्रे योत्स्यामो दंशितायुधाः ॥ ९१<br><br>एवमुक्त्वासुरान्योऽन्यं शरणं काव्यमातरम्।<br>प्रापद्यन्त ततो भीतास्तेभ्योऽदादभयं तु सा॥ ९२<br><br>न भेतव्यं न भेतव्यं भयं त्यजत दानवाः।<br>मत्संनिधौ वर्ततां वो न भीर्भवितुमर्हति ॥ ९३वहाँ हमलोग इस विषम संकटके समयको तबतक व्यतीत करेंगे, जबतक हमारे गुरुदेव लौटकर आ नहीं जाते। गुरुदेव शुक्राचार्यके वापस आ जानेपर हमलोग कवच और शस्त्रास्त्रसे लैस होकर आपलोगोंके साथ युद्ध करेंगे।' इस प्रकार भयभीत हुए असुरगण परस्पर परामर्श करके शुक्राचार्यकी माताकी शरणमें चले गये। तब उन्होंने असुरोंको अभयदान देते हुए कहा—'दानवो! मत डरो, मत डरो, भय छोड़ दो। मेरे निकट रहते हुए तुमलोगोंको किसी प्रकारका भय नहीं प्राप्त हो सकता' ॥८७—९३॥
तथा चाभ्युपपन्नांस्तान् दृष्ट्वा देवास्ततोऽसुरान्।<br>अभिजग्मुः प्रसह्यैतानविचार्य बलाबलम् ॥ ९४<br><br>ततस्तान् बाध्यमानांस्तु देवैर्दृष्ट्वासुरांस्तदा।<br>देवी क्रुद्धाब्रवीद् देवाननिन्द्रान् वः करोम्यहम् ॥ ९५<br><br>सम्भृत्य सर्वसम्भारानिन्द्रं साभ्यचरत् तदा।<br>तस्तम्भ देवी बलवद् योगयुक्ता तपोधना ॥ ९६<br><br>ततस्तं स्तम्भितं दृष्ट्वा इन्द्रं देवाश्च मूकवत्।<br>प्राद्रवन्त ततो भीता इन्द्रं दृष्ट्वा वशीकृतम् ॥ ९७<br><br>गतेषु सुरसंघेषु शक्रं विष्णुरभाषत।<br>मां त्वं प्रविश भद्रं ते नयिष्ये त्वां सुरोत्तम ॥ ९८<br><br>एवमुक्तस्ततो विष्णुं प्रविवेश पुरंदरः।<br>विष्णुना रक्षितं दृष्ट्वा देवी क्रुद्धा वचोऽब्रवीत् ॥ ९९<br><br>एषा त्वां विष्णुना सार्धं दहामि मघवन् बलात्।<br>मिषतां सर्वभूतानां दृश्यतां मे तपोबलम् ॥१००तत्पश्चात् शुक्रमाताद्वारा असुरोंको सुरक्षित देखकर देवताओंने बलाबलका (कौन बलवान् है, कौन दुर्बल है—ऐसा) विचार न करके बलपूर्वक उनपर धावा बोल दिया। उस समय देवताओंद्वारा उन असुरोंको पीड़ित किया जाता हुआ देखकर (शुक्रमाता ख्याति) देवी क्रुद्ध होकर देवताओंसे बोलीं—'मैं अभी-अभी तुमलोगोंको इन्द्र-रहित कर देती हूँ।' उस समय उन तपस्विनी एवं योगिनी देवीने सभी सामग्रियोंको एकत्र करके अभिचार-मन्त्रका प्रयोग किया और बलपूर्वक इन्द्रको स्तम्भित कर दिया। अपने स्वामी इन्द्रको स्तम्भित हुआ देखकर देवगण मूक-से हो गये और इन्द्रको असुरोंके वशीभूत हुआ देखकर वहाँसे भाग खड़े हुए। देवगणके भाग जानेपर भगवान् विष्णुने इन्द्रसे कहा—'सुरश्रेष्ठ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मेरे शरीरमें प्रवेश कर जाओ, मैं तुम्हें यहाँसे अन्यत्र पहुँचा दूँगा।' ऐसा कहे जानेपर इन्द्र भगवान् विष्णुके शरीरमें प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार भगवान् विष्णुद्वारा इन्द्रको सुरक्षित देखकर (ख्याति) देवी कुपित होकर ऐसा वचन बोली—'मघवन्! यह मैं सम्पूर्ण प्राणियोंके देखते-देखते विष्णुसहित तुमको बलपूर्वक जलाये देती हूँ। तुम दोनों मेरे तपोबलको देखो' ॥९४—१००॥
भयाभिभूतौ तौ देवाविन्द्रविष्णू बभूवतुः।<br>कथं मुच्येव सहितौ विष्णुरिन्द्रमभाषत ॥ १०१<br><br>इन्द्रोऽब्रवीज्जहि होनां यावन्नौ न दहेत् प्रभो।<br>विशेषेणाभिभूतोऽस्मि त्वत्तोऽहं जहि मा चिरम् ॥ १०२<br><br>ततः समीक्ष्य विष्णुस्तां स्त्रीवधे कृच्छ्रमास्थितः।<br>अभिध्याय ततश्चक्रमापदुद्धरणे तु तत् ॥ १०३यह सुनकर वे दोनों देवता—इन्द्र और विष्णु भयभीत हो गये। तब विष्णुने इन्द्रसे कहा—'हम दोनों एक साथ किस प्रकार (इस संकटसे) मुक्त हो सकेंगे?' यह सुनकर इन्द्र बोले—'प्रभो! जबतक यह हम दोनोंको जला नहीं देती है, उसके पूर्व ही आप इसे मार डालिये। मैं तो आपके द्वारा विशेषरूपसे अभिभूत हो चुका हूँ, इसलिये आप ही इसका वध कर दीजिये, अब विलम्ब मत कीजिये।' तब भगवान् विष्णु एक ओर उस देवीकी
१७४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्तु त्वरया युक्तः शीघ्रकारी भयान्वितः।<br>ज्ञात्वा विष्णुस्ततस्तस्याः क्रूरं देव्याश्चिकीर्षितम्।<br>क्रुद्धः स्वमस्त्रमादाय शिरश्चिच्छेद वै भिया॥ १०४<br><br>तं दृष्ट्वा स्त्रीवधं घोरं चुक्रोध भृगुरीश्वरः।<br>ततोऽभिशप्तो भृगुणा विष्णुर्भार्यावधे तदा॥ १०५<br><br>यस्मात् ते जानतो धर्ममवध्या स्त्री निषूदिता।<br>तस्मात् त्वं सप्तकृत्वेह मानुषेषूपपत्स्यसि॥ १०६<br><br>ततस्तेनाभिशापेन नष्टे धर्मे पुनः पुनः।<br>लोकस्य च हितार्थाय जायते मानुषेष्विह॥ १०७भीषण दुर्भावना—दुश्चेष्टा तथा दूसरी ओर स्त्रीवधरूप घोर पापको देखकर गम्भीर चिन्तामें पड़ गये। फिर उस देवीके क्रूर विचारको जानकर उस आपत्तिसे उद्धार पानेके लिये उन्होंने अपने सुदर्शन चक्रका ध्यान किया। अस्त्रके आ जानेपर शीघ्र ही कार्य-सम्पादन करनेमें निपुण एवं भयभीत विष्णु क्रुद्ध हो उठे और तुरंत ही उन्होंने अपना अस्त्र लेकर (पापसे) डरते-डरते उसके सिरको काट गिराया। इधर ऐश्वर्यशाली भृगु उस भयंकर स्त्री-वधको देख कुपित हो गये और वे उस भार्या-वधको निमित्त बनाकर भगवान् विष्णुको शाप देते हुए बोले—'विष्णो! चूँकि 'स्त्री अवध्य होती है'—इस धर्मको जानते हुए भी तुमने मेरी भार्याका प्राण हरण किया है, अतः तुम मृत्युलोकमें सात बार मानव-योनिमें जन्म धारण करोगे।' उसी शापके कारण धर्मका ह्रास हो जानेपर भगवान् विष्णु लोकके कल्याणके लिये मृत्युलोकमें पुनः-पुनः मानव-योनिमें अवतीर्ण होते हैं*॥ १०४-१०७॥
अनुव्याहृत्य विष्णुं स तदादाय शिरस्त्वरन्।<br>समानीय ततः कायमसौ गृहेदमब्रवीत्॥ १०८<br><br>एषा त्वं विष्णुना देवि हता संजीवयाम्यहम्।<br>ततस्तां योज्य शिरसा अभिजीवेति सोऽब्रवीत्॥ १०९<br><br>यदि कृत्स्नो मया धर्मो ज्ञायते चरितोऽपि वा।<br>तेन सत्येन जीवस्व यदि सत्यं वदाम्यहम्॥ ११०<br><br>ततस्तां प्रोक्ष्य शीताभिरद्भिर्जीवेति सोऽब्रवीत्।<br>ततोऽभव्व्याहृते तस्य देवी सा जीविता तदा॥ १११<br><br>ततस्तां सर्वभूतानि दृष्ट्वा सुप्तोत्थितामिव।<br>साधु साध्विति चक्रुस्ते वचसा सर्वतो दिशम्॥ ११२<br><br>एवं प्रत्याहृता तेन देवी सा भृगुणा तदा।<br>मिषतां देवतानां हि तदद्भुतमिवाभवत्॥ ११३भगवान् विष्णुको ऐसा शाप देकर भृगुने फिर तुरंत ही (ख्यातिके) उस सिरको उठा लिया और उसे देवीके शरीरके निकट लाकर तथा उस शरीरसे जोड़कर इस प्रकार कहा—'देवि! यह तुम विष्णुद्वारा मार डाली गयी हो, अब मैं तुम्हें पुनः जिलाये देता हूँ।' यों कहकर उसके शरीरको सिरसे जोड़कर कहा—'जी उठो'। पुनः वे प्रतिज्ञा करते हुए बोले—'यदि मैं सम्पूर्ण धर्मोंको जानता हूँ तथा मेरे द्वारा सम्पूर्ण धर्मोंका आचरण भी किया गया हो अथवा यदि मैं सत्यवादी होऊँ तो उस सत्यके प्रभावसे तुम जीवित हो जाओ।' तत्पश्चात् देवीके शरीरका शीतल जलसे प्रोक्षण करके उन्होंने पुनः कहा—'जीवित हो जाओ!' भृगुके यों कहते ही देवी तुरंत जीवित होकर उठ बैठी। उस देवीको सोकर उठी हुईकी भाँति जीवित देखकर सभी प्राणी 'ठीक है, ठीक है'—ऐसा कहने लगे। उनका वह साधुवाद सभी दिशाओंमें गूँज उठा। इस प्रकार महर्षि भृगुने सभी देवताओंके देखते-देखते देवीको पुनः जीवन प्रदान कर दिया, यह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ १०८-११३॥
असम्भ्रान्तेन भृगुणा पत्नीं संजीवितां पुनः।<br>दृष्ट्वा चेन्द्रो नालभत शर्म काव्यभयात् पुनः।<br>प्रजागरे ततश्चेन्द्रो जयन्तीमिदमब्रवीत्॥ ११४इस प्रकार व्यवस्थित चित्तवाले भृगुद्वारा अपनी पत्नीको जीवित किया हुआ देखकर इन्द्रको शुक्राचार्यके भयसे शान्ति नहीं मिल पा रही थी। वे रातभर जागते ही रहते। अन्तमें बुद्धिमान् इन्द्र बहुत कुछ सोच-विचारकर अपनी कन्या जयन्तीसे यह वचन बोले—

* यह कथा वाल्मीकीय रामायण १। २४। २१-२५, योगवासिष्ठ १। १। ६१-६५ तथा भविष्यपुराण ४। ६३। १-१३ में भी आती है।

  • अध्याय ४७ * | १७५ ---|---

| संचिन्त्य मतिमान् वाक्यं स्वां कन्यां पाकशासनः।<br>एष काव्यो ह्यमित्राय व्रतं चरति दारुणम्।<br>तेनाहं व्याकुलः पुत्रि कृतो मतिमता भृशम्॥ ११५<br><br>गच्छ संसाधयस्वैनं श्रमापनयनैः शुभैः।<br>तैस्तैर्मनोऽनुकूलैश्च ह्युपचारैरतन्द्रिता॥ ११६<br><br>काव्यमाराधयस्वैनं यथा तुष्येत स द्विजः।<br>गच्छ त्वं तस्य दत्तासि प्रयत्नं कुरु मत्कृते॥ ११७<br><br>एवमुक्ता जयन्ती सा वचः संगृह्य वै पितुः।<br>अगच्छद् यत्र घोरं स तप आरभ्य तिष्ठति॥ ११८<br><br>तं दृष्ट्वा तु पिबन्तं सा कणधूममवाङ्मुखम्।<br>यक्षेण पात्यमानं च कुण्डधारेण पातितम्॥ ११९<br><br>दृष्ट्वा च तं पात्यमानं देवी काव्यमवस्थितम्।<br>स्वरूपध्यानशाम्यं तं दुर्बलं भूतिमास्थितम्।<br>पित्रा यथोक्तं वाक्यं सा काव्ये कृतवती तदा॥ १२०<br><br>गीर्भिश्चैवानुकूलाभिः स्तुवती वल्गुभाषिणी।<br>गात्रसंवाहनैः काले सेवमाना त्वचः सुखैः।<br>व्रतचर्यानुकूलाभिरुवास बहुलाः समाः॥ १२१<br><br>पूर्वेऽथवा व्रते तस्मिन् घोरे वर्षसहस्रके।<br>वरेण च्छन्दयामास काव्यं प्रीतो भवस्तदा॥ १२२ | 'बेटी! ये शुक्राचार्य मेरे शत्रुओंके हितार्थ भीषण व्रतका अनुष्ठान कर रहे हैं। इससे बुद्धिमान् काव्य (उन शुक्राचार्य)-ने मुझे अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, अतः तुम उनके पास जाओ और मेरा कार्य सिद्ध करो। वहाँ तुम आलस्यरहित होकर थकावटको दूर करनेवाले तथा उनके मनोऽनुकूल विभिन्न प्रकारके शुभ उपचारोंद्वारा शुक्राचार्यकी ऐसी उत्तम आराधना करो, जिससे वे ब्राह्मण प्रसन्न हो जायें। जाओ, आज मैं तुम्हें शुक्राचार्यको समर्पित कर दे रहा हूँ। तुम मेरे कल्याणके लिये प्रयत्न करो।' इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्रपुत्री जयन्ती पिताके वचनको अङ्गीकार करके उस स्थानके लिये प्रस्थित हुई, जहाँ बैठकर शुक्राचार्य भीषण तपका अनुष्ठान कर रहे थे। वहाँ जाकर जयन्तीने शुक्राचार्यको नीचे मुख किये हुए कुण्डधार नामक यक्षद्वारा गिराये गये तथा गिराये जाते हुए कण-धूमका पान करते हुए देखा। उनके निकट जाकर जयन्तीने जब यह लक्ष्य किया कि शुक्राचार्य उस गिराये जाते हुए धूमका पान करते हुए अपने स्वरूपके ध्यानमें शान्तभावसे अवस्थित हैं, उनके शरीरपर विभूति लगी है और वे अत्यन्त दुर्बल हो गये हैं, तब पिताने जैसी सीख दी थी, उसीके अनुसार वह शुक्राचार्यके प्रति व्यवहार करने लगी। मधुर भाषण करनेवाली जयन्ती अनुकूल वचनोंद्वारा शुक्राचार्यकी स्तुति करती थी, समय-समयपर उनके सिर-हाथ-पैर आदि अङ्गोंको दबाकर उनकी सेवा करती थी। इस प्रकार व्रतचर्याके अनुकूल प्रवृत्तियोंद्वारा उनकी सेवा करती हुई वह बहुत वर्षोंतक उनके निकट निवास करती रही। एक सहस्र वर्षकी अवधिवाले उस भयंकर धूमव्रतके पूर्ण होनेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और शुक्राचार्यको वर प्रदान करते हुए बोले— ॥ ११४—१२२ ॥ |

१७६* मत्स्यपुराण *

| महादेव उवाच | महादेवजीने कहा—भृगुनन्दन! अबतक एकमात्र तुमने ही इस व्रतका अनुष्ठान किया है, किसी अन्यके द्वारा इस व्रतका पालन नहीं हो सका है; इसलिये तुम अकेले ही अपने तप, बुद्धि, शास्त्रज्ञान, बल और तेजसे समस्त देवताओंको पराजित कर दोगे। ब्रह्मन्! तुम्हारी जो कुछ भी अभिलाषा है, वह सारी-की-सारी तुम्हें प्राप्त हो जायगी, किंतु तुम यह मन्त्र किसी दूसरेको मत बतलाना। द्विजोत्तम! इससे तुम सम्पूर्ण शत्रुओंके दमनकर्ता हो जाओगे।' भृगुनन्दन शुक्राचार्यको इतना वरदान देनेके पश्चात् शंकरजीने पुनः उन्हें प्रजेशत्व (प्रजापति), धनेशत्व (धनाध्यक्ष) और अवध्यत्वका भी वर प्रदान किया। इन वरदानोंको पाकर शुक्राचार्यका शरीर हर्षसे पुलकित हो उठा। उसी हर्षावेगके कारण उनके हृदयमें भगवान् शंकरके प्रति एक दिव्य स्तोत्र प्रादुर्भूत हो गया। तब वे उसी तिर्यक्-अवस्थामें पड़े-पड़े नीललोहित शंकरजीकी स्तुति करने लगे॥ १२३—१२७॥ | | एतद् व्रतं त्वयैकेन चीर्णं नान्येन केनचित्।<br>तस्माद् वै तपसा बुद्ध्या श्रुतेन च बलेन च॥ १२३<br><br>तेजसा च सुरान् सर्वांस्त्वमेकोऽभिभविष्यसि।<br>यच्चाभिलषितं ब्रह्मन् विद्यते भृगुनन्दन॥ १२४<br><br>प्रपत्स्यसे तु तत् सर्वं नानुवाच्यं तु कस्यचित्।<br>सर्वाभिभावी तेन त्वं भविष्यसि द्विजोत्तम॥ १२५<br><br>एतान् दत्त्वा वरांस्तस्मै भार्गवाय भवः पुनः।<br>प्रजेशत्वं धनेशत्वमवध्यत्वं च वै ददौ॥ १२६<br><br>एताँल्लब्ध्वा वरान् काव्यः सम्प्रहृष्टतनूरुहः।<br>हर्षात् प्रादुर्बभौ तस्य दिव्यस्तोत्रं महेश्वरे।<br>तथा तिर्यक् स्थितश्चैव तुष्टवे नीललोहितम्॥ १२७ | | | शुक्र उवाच | शुक्राचार्यने कहा—प्रभो! आप शितिकण्ठ—जगत्की रक्षाके लिये हालाहल विषका पान करके उसके नील चिह्नको कण्ठमें धारण करनेवाले (अथवा कर्पूर-गौरकण्ठवाले), कनिष्ठ—ब्रह्माके पुत्रोंमें सबसे छोटे रुद्र या अदितिके छोटे पुत्ररूप, सुवर्चा—अध्ययन एवं तप आदिसे उत्पन्न हुए सुन्दर तेजवाले, लेलिहान—प्रलय-कालमें त्रिलोकीके संहारार्थ वारंवार जीभ लपलपानेवाले, काव्य—कवि या पण्डितके लक्षणोंसे सम्पन्न, वत्सर—संवत्सररूप, अन्धस्पति—सोमलताके अथवा सभी अन्नोंके स्वामी, कपर्दी—जटाजूटधारी, कराल—भीषण रूपधारी, हर्यक्ष—पीले नेत्रोंवाले, वरद—वरप्रदाता, संस्तुत—पूर्णरूपसे प्रशंसित, सुतीर्थ—महान् गुरुस्वरूप अथवा उत्तम तीर्थस्वरूप, देवदेव—देवताओंके अधीश्वर, रंहस—वेगशाली, उष्णीषी—सिरपर पगड़ी धारण करनेवाले, सुवक्त्र—सुन्दर मुखवाले, बहुरूप—एकादश रुद्रोंमेंसे एक, वेधा—विधानकर्ता, वसुरेता—अग्निरूप, रुद्र—समस्त प्राणियोंके प्राणस्वरूप, तपः—तपः-स्वरूप, चित्रवासा—चित्र-विचित्र वस्त्रधारी, ह्रस्व—बौना, मुक्तकेश—खुली हुई जटाओंवाले, सेनानी—सेनापति, रोहित—मृगरूपधारी, कवि—अतीन्द्रिय विषयोंके ज्ञाता, राजवृक्ष—रुद्राक्ष-वृक्षस्वरूप, तक्षकक्रीडन—नागराज तक्षकके साथ क्रीडा करनेवाले, सहस्रशिरा—हजारों मस्तकोंवाले, सहस्राक्ष—सहस्र नेत्रधारी, मीढुष—सेक्ता अथवा स्तुतिकी वृद्धि करनेवाले, वर—वरण करनेयोग्य, वरस्वरूप, भव्यरूप—सौन्दर्यशाली, श्वेत—गौरवर्णवाले, | | नमोऽस्तु शितिकण्ठाय कनिष्ठाय सुवर्चसे।<br>लेलिहानाय काव्याय वत्सरायान्धसःपते*॥ १२८<br><br>कपर्दिने करालाय हर्यक्ष्णे वरदाय च।<br>संस्तुताय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे॥ १२९<br><br>उष्णीषिणे सुवक्त्राय बहुरूपाय वेधसे।<br>वसुरेताय रुद्राय तपसे चित्रवाससे॥ १३०<br><br>ह्रस्वाय मुक्तकेशाय सेनान्ये रोहिताय च।<br>कवये राजवृक्षाय तक्षकक्रीडनाय च॥ १३१<br><br>सहस्रशिरसे चैव सहस्राक्षाय मीढुषे।<br>वराय भव्यरूपाय श्वेताय पुरुषाय च॥ १३२ | |


* यहाँ प्रायः २५० नामोंद्वारा भगवान् शंकरकी दिव्य स्तुति है। ये नाम प्रसिद्ध 'वाजसनेयि-संहिता' (यजुर्वेद १६) आदिपर आदृत हैं। ये नाम विभिन्न शिवसहस्रनामोंमें भी आते हैं। यह स्तोत्र वायु और ब्रह्माण्डपुराणोंमें भी प्राप्त है।

* अध्याय ४७ *१७७
श्लोकहिन्दी व्याख्या
गिरिशाय नमोऽर्काय बलिने आज्यपाय च।<br>सुतृप्ताय सुवस्त्राय धन्विने भार्गवाय च॥ १३३<br><br>निषङ्गिणे च ताराय स्वक्षाय क्षपणाय च।<br>ताम्राय चैव भीमाय उग्राय च शिवाय च॥ १३४पुरुष—आत्मनिष्ठ, गिरिश—कैलासपर्वतपर शयनकर्ता, अर्क—सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत सूर्य, बली—बलसम्पन्न, आज्यप—घृतपायी, सुतृप्त—परम संतुष्ट, सुवस्त्र—सुन्दर वस्त्र पहननेवाले, धन्वी—धनुर्धर, भार्गव—परशुरामस्वरूप, निषङ्गी—तूणीरधारी, तार—विश्वके रक्षक, स्वक्ष—सुशोभन नेत्रोंसे युक्त, क्षपण—भिक्षुकस्वरूप, ताम्र—अरुण अधरोंवाले, भीम—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, संहारक होनेके कारण भयंकर, उग्र—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, निष्ठुर तथा शिव—कल्याणस्वरूपको नमस्कार है ॥ १२८–१३४ ॥
महादेवाय शर्वाय विश्वरूपशिवाय च।<br>हिरण्याय वरिष्ठाय ज्येष्ठाय मध्यमाय च॥ १३५महादेव—देवताओंके भी पूज्य, शर्व—प्रलयकालमें सबके संहारक, विश्वरूप शिव—विश्वरूप धारण करके जीवोंके कल्याणकर्ता, हिरण्य—सुवर्णकी उत्पत्तिके मूल कारण, वरिष्ठ—सर्वश्रेष्ठ, ज्येष्ठ—आदिदेव, मध्यम—मध्यस्थ,
वास्तोष्पते पिनाकाय मुक्तये केवलाय च।<br>मृगव्याधाय दक्षाय स्थाणवे भीषणाय च॥ १३६वास्तोष्पति—गृहक्षेत्रके पालक, पिनाक—पिनाक नामक धनुषके स्वामी, मुक्ति—मुक्तिदाता, केवल—असाधारण पुरुष, मृगव्याध—मृगरूपधारी यज्ञके लिये व्याधस्वरूप, दक्ष—उत्साही, स्थाणु—गृहके आधारभूत स्तम्भके समान जगत्‌के आधारस्तम्भ, भीषण—अमङ्गल वेषधारी,
बहुनेत्राय धुर्याय त्रिनेत्रायेश्वराय च।<br>कपालिने च वीराय मृत्यवे त्र्यम्बकाय च॥ १३७बहुनेत्र—सर्वद्रष्टा, धुर्य—अग्रगण्य, त्रिनेत्र—सोम-सूर्य-अग्निरूप त्रिनेत्रधारी, ईश्वर—सबके शासक, कपाली—चौथे हाथमें कपालधारी, वीर—शूरवीर, मृत्यु—संहारकर्ता, त्र्यम्बक—त्रिनेत्रधारी, एकादश रुद्रोंमें अन्यतम,
बभ्रुवे च पिशङ्गाय पिङ्गलायारुणाय च।<br>पिनाकिने चेषुमते चित्राय रोहिताय च॥ १३८बभ्रु—विष्णुस्वरूप, पिशङ्ग—भूरे रंगवाले, पिङ्गल—नील-पीतमिश्रित वर्णवाले, अरुण—आदित्यरूप, पिनाकी—पिनाक नामक धनुष या त्रिशूल धारण करनेवाले, इषुमान्—बाणधारी, चित्र—अद्भुत रूपधारी, रोहित—लाल रंगका मृगविशेष,
दुन्दुभ्यायैकपादाय अजाय बुद्धिदाय च।<br>आरण्याय गृहस्थाय यतये ब्रह्मचारिणे॥ १३९दुन्दुभ्य—दुन्दुभिके शब्दोंको सुनकर प्रसन्न होनेवाले, एकपाद—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, एकमात्र शरण लेने योग्य, अज—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, अजन्मा, बुद्धिद—बुद्धिदाता, आरण्य—अरण्यनिवासी, गृहस्थ—गृहमें निवास करनेवाले, यति—संन्यासी, ब्रह्मचारी—ब्रह्मनिष्ठ,
सांख्याय चैव योगाय व्यापिने दीक्षिताय च।<br>अनाहताय शर्वाय भव्येशाय यमाय च॥ १४०सांख्य—आत्मानात्मविवेकशील, योग—चित्तवृत्तियोंके निरोधस्वरूप अथवा निर्बीज समाधिस्वरूप, व्यापी—सर्वव्यापक, दीक्षित—अष्ट मूर्तियोंमें एक मूर्ति, सोमयागके विशिष्ट यागकर्ता, अनाहत—हृदयस्थित द्वादशदल कमलरूप चक्रके निवासी, शर्व—दारुकावनमें स्थित मुनियोंको मोहित करनेवाले, भव्येश—पार्वतीके प्राणपति, यम—संहारकालमें यमस्वरूप,
रोधसे चेकितानाय ब्रह्मिष्ठाय महर्षये।<br>चतुष्पदाय मेध्याय रक्षिणे शीघ्रगाय च॥ १४१रोधा—समुद्र-तटकी भाँति धर्म-ह्रासके निरोधक, चेकितान—

१७८ * मत्स्यपुराण *

श्लोकअर्थ
शिखण्डिने करालाय दंष्ट्रिणे विश्ववेधसे।<br>भास्वराय प्रतीताय सुदीप्ताय सुमेधसे॥ १४२अतिशय ज्ञानसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ—वेदोंके पारंगत विद्वान्, महर्षि—वसिष्ठ आदि, चतुष्पाद—विश्व, तैजस, प्राज्ञ और शिव-ध्यानरूप चार पादोंवाले, मेध्य—पवित्रस्वरूप, रक्षी—रक्षक, शीघ्रग—शीघ्रगामी, शिखण्डी—जटाके ऊपर जटाग्र-गुच्छको धारण करनेवाले, कराल—भयानक, दंष्ट्री—दाढ़वाले, विश्ववेधा—विश्वके सृष्टिकर्ता, भास्वर—दीप्तिमान् स्वरूपवाले, प्रतीत—विख्यात, सुदीप्त—परम प्रकाशमान तथा सुमेधा—उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्नको नमस्कार है॥ १३५—१४२॥
कूरायाविकृतायैव भीषणाय शिवाय च।<br>सौम्याय चैव मुख्याय धार्मिकाय शुभाय च॥ १४३<br><br>अवध्यायामृतायैव नित्याय शाश्वताय च।<br>व्यापृताय विशिष्टाय भरताय च साक्षिणे॥ १४४<br><br>क्षेमाय सहमानाय सत्याय चामृताय च।<br>कर्त्रे परशवे चैव शूलिने दिव्यचक्षुषे॥ १४५<br><br>सोमपायाज्यपायैव धूमपायोष्मपाय च।<br>शुचये परिधानाय सद्योजाताय मृत्यवे॥ १४६<br><br>पिशिताशाय शर्वाय मेघाय वैद्युताय च।<br>व्यावृत्ताय वरिष्ठाय भरिताय तरक्षवे॥ १४७<br><br>त्रिपुरघ्नाय तीर्थायावक्राय रोमशाय च।<br>तिग्मायुधाय व्याख्याय सुसिद्धाय पुलस्तये॥ १४८<br><br>रोचमानाय चण्डाय स्फीताय ऋषभाय च।<br>व्रतिने युञ्जमानाय शुचये चोर्ध्वरेतसे॥ १४९<br><br>असुरघ्नाय स्वाघ्नाय मृत्युघ्ने यज्ञियाय च।<br>कृशानवे प्रचेताय वह्नये निर्मलाय च॥ १५०क्रूर—निर्दयी, अविकृत—सम्पूर्ण विपरीत क्रियाओंसे रहित, भीषण—भयंकर, शिव—धर्मचिन्तारहित, सौम्य—शान्तस्वरूप, मुख्य—सर्वश्रेष्ठ, धार्मिक—धर्मका आचरण करनेवाले, शुभ—मङ्गलस्वरूप, अवध्य—वधके अयोग्य, अमृत—मृत्युरहित, नित्य—अविनाशी, शाश्वत—सनातन स्थायी, व्यापृत—कर्मसचिव, विशिष्ट—सर्वश्रेष्ठ, भरत—लोकोंका भरण-पोषण करनेवाले, साक्षी—जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंके साक्षीरूप, क्षेम—मोक्षस्वरूप, सहमान—सहनशील, सत्य—सत्यस्वरूप, अमृत—धन्वन्तरिस्वरूप, कर्ता—सबके उत्पादक, परशु—परशुधारी, शूली—त्रिशूलधारी, दिव्यचक्षु—दिव्य नेत्रोंवाले, सोमप—सोमरसका पान करनेवाले, आज्यप—घृतपायी अथवा एक विशिष्ट पितरस्वरूप, धूमप—धूमपान करनेवाले, ऊष्मप—एक विशिष्ट पितरस्वरूप, ऊष्माको पी जानेवाले, शुचि—सर्वथा शुद्ध, परिधान—ताण्डवके समय साज-सज्जासे विभूषित, सद्योजात—पञ्च मूर्तियोंमेंसे एक मूर्ति, तत्काल प्रकट होनेवाले, मृत्यु—कालस्वरूप, पिशिताश—फलका गूदा खानेवाले, सर्व—विश्वात्मा होनेके कारण सर्वस्वरूप, मेघ—बादलकी भाँति दाता, विद्युत्—बिजलीकी तरह दीप्तिमान्, व्यावृत्त—गजचर्म या व्याघ्रचर्मसे आवृत्त, सबसे अलग मुक्तस्वरूप, वरिष्ठ—सर्वश्रेष्ठ, भरित—परिपूर्ण, तरक्षु—व्याघ्रविशेष, त्रिपुरघ्न—त्रिपुरासुरके वधकर्ता, तीर्थ—महान् गुरुस्वरूप, अवक्र—सौम्य स्वभाववाले, रोमश—लम्बी जटाओंवाले, तिग्मायुध—तीखे हथियारोंवाले, व्याख्या—विशेषरूपसे व्याख्येय या प्रशंसित, सुसिद्ध—परम सिद्धिसम्पन्न, पुलस्ति—पुलस्त्य ऋषिरूप, रोचमान—आनन्दप्रद, चण्ड—अत्यन्त क्रोधी, स्फीत—वृद्धिंगत, ऋषभ—सर्वोत्कृष्ट, व्रती—व्रतपरायण, युञ्मान—सर्वदा कार्यरत, शुचि—निर्मलचित्त, ऊर्ध्वरेता—अखण्डित ब्रह्मचर्यवाले, असुरघ्न—राक्षसोंके विनाशक, स्वाघ्न—निजजनोंके रक्षक, मृत्युघ्न—मृत्यु-संकटको टालनेवाले, यज्ञिय—यज्ञके लिये हितकारी, कृशानु—अपने तेजसे तृण-काष्ठादि वस्तुओंको सूक्ष्म कर देनेवाले, प्रचेता—उत्कृष्ट चेतनावाले, वह्नि—अग्निरूप और निर्मल—जागतिक मलोंसे रहितको नमस्कार है॥ १४३—१५०॥
* अध्याय ४७ *१७१
रक्षोघ्नाय पशुघ्नायाविघ्नाय श्वसिताय च।<br>विभ्रान्ताय महान्ताय अत्यन्तं दुर्गमाय च॥ १५१<br><br>कृष्णाय च जयन्ताय लोकानामीश्वराय च।<br>अनाश्रिताय वेध्याय समत्वाधिष्ठिताय च॥ १५२<br><br>हिरण्यबाहवे चैव व्यासाय च महाय च।<br>सुकर्मणे प्रसह्याय चेशानाय सुचक्षुषे॥ १५३<br><br>क्षिप्रेषवे सदश्वाय शिवाय मोक्षदाय च।<br>कपिलाय पिशङ्गाय महादेवाय धीमते॥ १५४<br><br>महाकल्पाय दीप्ताय रोदनाय हसाय च।<br>दृढधन्विने कवचिने रथिने च वरूथिने॥ १५५<br><br>भृगुनाथाय शुक्राय गह्वरेष्ठाय वेधसे।<br>अमोघाय प्रशान्ताय सुमेधाय वृषाय च॥ १५६<br><br>नमोऽस्तु तुभ्यं भगवन् विश्वाय कृत्तिवाससे।<br>पशूनां पतये तुभ्यं भूतानां पतये नमः॥ १५७रक्षोघ्न—राक्षसोंके संहारकर्ता, पशुघ्न—जीवोंके संहारक, अविघ्न—विघ्नरहित, श्वसित—ताण्डवकालमें ऊँची श्वास लेनेवाले, विभ्रान्त—भ्रान्तिहीन, महान्त—विशाल मर्यादावाले, अत्यन्त दुर्गम—परम दुष्प्राप्य, कृष्ण—सच्चिदानन्दस्वरूप, जयन्त—बारंबार शत्रुओंपर विजय पानेवाले, लोकानामीश्वर—समस्त लोकोंके स्वामी, अनाश्रित—स्वतन्त्र, वेध्य—भक्तोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये लक्ष्यस्वरूप, समत्वाधिष्ठित—समतासम्पन्न, हिरण्यबाहु—सुनहरी कान्तिवाली सुन्दर भुजाओंसे सुशोभित, व्यास—सर्वव्यापी, मह—दीप्तिशाली, सुकर्मा—उत्तम कर्मवाले, प्रसह्य—विशेषरूपसे सहन करनेयोग्य, ईशान—नियन्ता, सुचक्षुः—सुशोभन नेत्रोंसे युक्त, क्षिप्रेषु—शीघ्रतापूर्वक बाण चलानेवाले, सदश्व—उच्चैःश्रवा आदि उत्तम अश्वरूप, शिव—निरुपाधि, मोक्षद—मोक्षदाता, कपिल—कपिल वर्ण, पिशङ्ग—कनक-सदृश कान्तिमान्, महादेव—ब्रह्मादि देवताओंके तथा ब्रह्मवादी मुनियोंके देवता, धीमान्—उत्तम बुद्धिसम्पन्न, महाकल्प—महाप्रलयकालमें विशाल शरीर धारण करनेवाले, दीप्त—अत्यन्त तेजस्वी, रोदन—रुलानेवाले, हस—हसनशील, दृढधन्वा—सुदृढ़ धनुषवाले, कवची—कवचधारी, रथी—रथके स्वामी, वरूथी—भूतों एवं पिशाचोंकी सेनावाले, भृगुनाथ—महर्षि भृगुके रक्षक, शुक्र—अग्निस্বরূপ, गह्वरेष्ठ—निकुञ्जप्रिय, वेधा—ब्रह्मस्वरूप, अमोघ—निष्फलतारहित, प्रशान्त—शान्तचित्त, सुमेध—सुन्दर बुद्धिवाले और वृष—धर्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। भगवन्! आप विश्व—विश्वस्वरूप, कृत्तिवासा—गजासुरके चर्मको धारण करनेवाले, पशुपति—पशुओंके स्वामी और भूतपति—भूत-प्रेतोंके अधीश्वर हैं, आपको बारंबार प्रणाम है॥ १५१-१५७॥
प्रणवे ऋग्यजुःसाम्ने स्वाहाय च स्वधाय च।<br>वषट्कारात्मने चैव तुभ्यं मन्त्रात्मने नमः॥ १५८आप प्रणव—ॐकारस्वरूप एवं ऋग्यजुःसाम—वेदत्रयीरूप हैं, स्वाहा, स्वधा, वषट्कार—ये तीनों आपके स्वरूप हैं तथा मन्त्रात्मा—मन्त्रोंके आत्मा आप ही हैं, आपको अभिवादन है।
त्वष्ट्रे धात्रे तथा कर्त्रे चक्षुःश्रोत्रमयाय च।<br>भूतभव्यभवैशाय तुभ्यं कर्मात्मने नमः॥ १५९आप त्वष्टा—प्रजापति विश्वकर्मा, धाता—सबको धारण करनेवाले, कर्ता—कर्मनिष्ठ, चक्षुःश्रोत्रमय—दिव्य नेत्र एवं दिव्य श्रोत्रसे युक्त, भूतभव्यभवैश—भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता और कर्मात्मा—कर्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।
वसवे चैव साध्याय रुद्रादित्यसुराय च।<br>विश्वाय मारुतायैव तुभ्यं देवात्मने नमः॥ १६०आप वसु—आठ वसुओंमें एक वसु, साध्य—गणदेवोंकी एक कोटि, रुद्र—दुःखोंके विनाशक, आदित्य—अदितिपुत्र, सुर—देवरूप, विश्व—विश्वेदेवतारूप, मारुत—वायुस्वरूप एवं देवात्मा—देवताओंके आत्मस्वरूप हैं, आपको प्रणाम है।
अग्नीषोमविधिज्ञाय पशुमन्त्रौषधाय च।<br>स्वयम्भुवे ह्यजायैव अपूर्वप्रथमाय च।आप अग्नीषोमविधिज्ञ—अग्नीषोम नामक यज्ञकी विधिके ज्ञाता, पशुमन्त्रौषध—यज्ञमें प्रयुक्त होनेवाले पशु,

४८ तुर्वसु और द्रुह्यके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

१८० * मत्स्यपुराण *

| प्रजानां पतये चैव तुभ्यं ब्रह्मात्मने नमः ॥ १६१<br><br>आत्मेशायात्मवश्याय सर्वेशातिशयाय च।<br>सर्वभूताङ्गभूताय तुभ्यं भूतात्मने नमः ॥ १६२ | मन्त्र और औषधके निर्माता, स्वयम्भू—स्वयं उत्पन्न होनेवाले, अज—जन्मरहित, अपूर्वप्रथम—आद्यन्तरूप, प्रजापति—प्रजाओंके स्वामी और ब्रह्मात्मा—ब्रह्मस्वरूप हैं, आपको अभिवादन है। आप आत्मेश—मनके स्वामी, आत्मवश्य—मनको वशमें रखनेवाले, सर्वेशातिशय—समस्त ईश्वरोंमें सबसे बढ़कर, सर्वभूताङ्गभूत—सम्पूर्ण जीवोंके अङ्गभूत तथा भूतात्मा—समस्त प्राणियोंके आत्मा हैं, आपको नमस्कार है ॥ १५८–१६२ ॥ | | निर्गुणाय गुणज्ञाय व्याकृतायामृताय च।<br>निरुपाख्याय मित्राय तुभ्यं योगात्मने नमः ॥ १६३<br><br>पृथिव्यै चान्तरिक्षाय महसे त्रिदिवाय च।<br>जनस्तपाय सत्याय तुभ्यं लोकात्मने नमः ॥ १६४<br><br>अव्यक्ताय च महते भूतादेरिन्द्रियाय च।<br>आत्मज्ञाय विशेषाय तुभ्यं सर्वात्मने नमः ॥ १६५<br><br>नित्याय चात्मलिङ्गाय सूक्ष्मायैवेतराय च।<br>शुद्धाय विभवे चैव तुभ्यं मोक्षात्मने नमः ॥ १६६<br><br>नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु।<br>सत्यान्तेषु महाद्येषु चतुर्षु च नमोऽस्तु ते ॥ १६७<br><br>नमः स्तोत्रे मया ह्यस्मिन् सदसद् व्याहृतं विभो।<br>मद्भक्त इति ब्रह्मण्य तत् सर्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ १६८ | आप निर्गुण—सत्त्व, रजस्, तमस्—तीनों गुणोंसे परे, गुणज्ञ—तीनों गुणोंके रहस्यके ज्ञाता, व्याकृत—रूपान्तरित, अमृत—अमृतस्वरूप, निरुपाख्य—अदृश्य, मित्र—जीवोंके हितैषी और योगात्मा—योगस्वरूप हैं, आपको प्रणाम है। आप पृथिवी—मृत्युलोक, अन्तरिक्ष—अन्तरिक्षलोक, मह—महर्लोक, त्रिदिव्य—स्वर्गलोक, जन—जनलोक, तपः—तपोलोक, सत्य—सत्यलोक हैं, इस प्रकार लोकात्मा—सातों लोकस्वरूप आपको अभिवादन है। आप अव्यक्त—निराकाररूप, महान्—पूज्य, भूतादि—समस्त प्राणियोंके आदिभूत, इन्द्रिय—इन्द्रियस्वरूप, आत्मज्ञ—आत्मतत्त्वके ज्ञाता, विशेष—सर्वाधिक और सर्वात्मा—सम्पूर्ण जीवोंके आत्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप नित्य—सनातन, आत्मलिङ्ग—स्वप्रमाणस्वरूप, सूक्ष्म—अणुसे भी अणु, इतर—महान्‌से भी महान्, शुद्ध—शुद्धज्ञानसम्पन्न, विभु—सर्वव्यापक और मोक्षात्मा—मोक्षरूप हैं, आपको प्रणाम है। यहाँ तीनों लोकोंमें आपके लिये मेरा नमस्कार है तथा इनके अतिरिक्त (अन्य) तीन परलोकोंमें भी मैं आपको प्रणाम करता हूँ। इसी प्रकार महर्लोकसे लेकर सत्यलोकपर्यन्त चारों लोकोंमें मैं आपको अभिवादन करता हूँ। ब्राह्मणवत्सल विभो! इस स्तोत्रमें मेरे द्वारा जो कुछ उचित-अनुचित कहा गया, उसे 'यह मेरा भक्त है'—ऐसा जानकर आप क्षमा कर दें ॥ १६३—१६८ ॥ | | सूत उवाच<br>एवमाभाष्य देवेशमीश्वरं नीललोहितम्।<br>प्रह्वोऽभिप्रणतस्तस्मै प्राञ्जलिर्वाग्यतोऽभवत् ॥ १६९ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! तदनन्तर शुक्राचार्य देवाधिदेव नीललोहित भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना करके हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें लोट गये और पुनः विनम्र होकर उनके समक्ष चुपचाप खड़े हो गये। | | काव्यस्य गात्रं संस्पृश्य हस्तेन प्रीतिमान् भवः।<br>निकामं दर्शनं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ १७० | तब शिवजीने हर्षपूर्वक अपने हाथसे शुक्राचार्यके शरीरको सहलाते हुए उन्हें यथेष्ट दर्शन दिया और वे वहीं अन्तर्हित हो गये। | | ततः सोऽन्तर्हिते तस्मिन् देवेशेऽनुचरीं तदा।<br>तिष्ठन्तीं पार्श्वतो दृष्ट्वा जयन्तीमिदमब्रवीत् ॥ १७१ | उन देवेश्वरके अन्तर्हित हो जानेपर शुक्राचार्य अपने पार्श्व भागमें खड़ी हुई सेविका जयन्तीको देखकर उससे इस |

* अध्याय ४७ * १८१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कस्य त्वं सुभगे का वा दुःखिते मयि दुःखिता।<br>महता तपसा युक्ता किमर्थं मां निषेवसे॥ १७२<br><br>अनया संस्तुतो भक्त्या प्रश्रयेण दमेन च।<br>स्नेहेन चैव सुश्रोणि प्रीतोऽस्मि वरवर्णिनि॥ १७३<br><br>किमिच्छसि वरारोहे कस्ते कामः समृद्ध्यताम्।<br>तं ते सम्पादयाम्यद्य यद्यपि स्यात् सुदुष्करः॥ १७४प्रकार बोले—'सुभगे! तुम कौन हो अथवा किसकी पुत्री हो, जो मेरे तपस्यामें निरत होनेपर तुम भी कष्ट झेल रही हो? इस प्रकार यह घोर तप करती हुई तुम किसलिये मेरी सेवा कर रही हो? सुश्रोणि! मैं तुम्हारी इस उत्कृष्ट भक्ति, विनम्रता, इन्द्रियनिग्रह और प्रेमसे परम प्रसन्न हूँ। वरवर्णिनि! तुम मुझसे क्या प्राप्त करना चाहती हो? वरारोहे! तुम्हारी क्या अभिलाषा है? उसे तुम अवश्य बतलाओ। मैं आज उसे अवश्य पूर्ण करूँगा, चाहे वह कितना ही दुष्कर क्यों न हो'॥ १६९—१७४॥
एवमुक्ताब्रवीदेनं तपसा ज्ञातुमर्हसि।<br>चिकीर्षितं हि मे ब्रह्मंस्त्वं हि वेत्थ यथातथम्॥ १७५<br><br>एवमुक्तोऽब्रवीदेनां दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा।<br>मया सह त्वं सुश्रोणि दश वर्षाणि भामिनि॥ १७६<br><br>देवि चेन्दीवरश्यामे वराहें वामलोचने।<br>एवं वृणोषि कामं त्वं मत्तो वै वल्गुभाषिणि॥ १७७<br><br>एवं भवतु गच्छामो गृहान्नो मत्तकाशिनि।<br>ततः स्वगृहमागत्य जयन्त्याः पाणिमुद्वहन्॥ १७८<br><br>तया सहावसद् देव्या दश वर्षाणि भार्गवः।<br>अदृश्यः सर्वभूतानां मायया संवृतः प्रभुः॥ १७९<br><br>कृतार्थमागतं दृष्ट्वा काव्यं सर्वे दितेः सुताः।<br>अभिजग्मुर्गृहं तस्य मुदितास्ते दिदृक्षवः॥ १८०<br><br>यदा गता न पश्यन्ति मायया संवृतं गुरुम्।<br>लक्षणं तस्य तद् बुद्ध्वा प्रतिजग्मुर्यथागतम्॥ १८१शुक्राचार्यके यों कहनेपर जयन्तीने उनसे कहा—'ब्रह्मन्! आप अपने तपोबलसे मेरे मनोरथको भली-भाँति जान सकते हैं; क्योंकि आपको तो सबका यथार्थ ज्ञान है। ऐसा कहे जानेपर शुक्राचार्यने अपनी दिव्य दृष्टिद्वारा जयन्तीके मनोरथको जानकर उससे कहा—'सुन्दर भावोंवाली सुश्रोणि! इन्दीवर कमलके सदृश तुम्हारा वर्ण श्याम है, देवि! तुम्हारे नेत्र अत्यन्त रमणीय हैं तथा तुम्हारा भाषण अतिशय मधुर है। वराहें! तुम दस वर्षोंतक मेरे साथ रहनेका जो मुझसे वर चाह रही हो, वह वैसा ही हो। मत्तकाशिनि! आओ, अब हमलोग अपने घर चलें।' तब अपने घर आकर शुक्राचार्यने जयन्तीका पाणिग्रहण किया। फिर तपोबलसम्पन्न शुक्राचार्यने मायाका आवरण डाल दिया, जिससे सभी प्राणियोंसे अदृश्य होकर वे दस वर्षोंतक जयन्तीके साथ निवास करते रहे। इसी बीच जब दितिके पुत्रोंको यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्य सफलमनोरथ होकर घर लौट आये हैं, तब वे सभी हर्षपूर्वक उन्हें देखनेकी अभिलाषासे उनके घरकी ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचनेपर जब उन्हें मायासे छिपे हुए गुरुदेव शुक्राचार्य नहीं दीख पड़े, तब वे उनके उस लक्षणको समझकर जैसे आये थे, वैसे ही वापस चले गये॥ १७५—१८१॥
बृहस्पतिस्तु संरुद्धं काव्यं ज्ञात्वा वरेण तु।<br>तुष्ट्यर्थं दश वर्षाणि जयन्त्या हितकाम्यया॥ १८२<br><br>बुद्ध्वा तदन्तरं सोऽपि दैत्यानामिन्द्रनोदितः।<br>काव्यस्य रूपमास्थाय असुरान् समुपाव्हयत्॥ १८३<br><br>ततस्तानागतान् दृष्ट्वा बृहस्पतिरुवाच ह।<br>स्वागतं मम याज्यानां प्राप्तोऽहं वो हिताय च॥ १८४इधर बृहस्पतिको जब यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्य जयन्तीकी हित-कामनासे उसे संतुष्ट करनेके लिये दस वर्षोंतक वरदानके बन्धनसे बँध चुके हैं, तब इसे दैत्योंका महान् छिद्र जानकर इन्द्रकी प्रेरणासे उन्होंने शुक्राचार्यका रूप धारणकर असुरोंको बुलाया। उन्हें आया देखकर (शुक्ररूपधारी) बृहस्पतिने उनसे कहा—'मेरे यजमानो! तुम्हारा स्वागत है। मैं तुमलोगोंके कल्याणके लिये तपोवनसे लौट आया हूँ।

१८२ * मत्स्यपुराण *

अहं वोऽध्यापयिष्यामि विद्याः प्राप्तास्तु या मया।<br>ततस्ते हृष्टमनसो विद्यार्थमुपपेदिरे॥ १८५<br>पूर्णे काव्यस्तदा तस्मिन् समये दशवार्षिके।<br>समयान्ते देवयानी तदोत्पन्ना इति श्रुतिः।<br>बुद्धिं चक्रे ततः सोऽथ याज्यानां प्रत्यवेक्षणे॥ १८६<br>देवि गच्छाम्यहं द्रष्टुं तव याज्याञ् शुचिस्मिते।<br>विभ्रान्तवीक्षिते साध्वि विवर्णायतलोचने॥ १८७<br>एवमुक्ताब्रवीदेनं भज भक्तान् महाव्रत।<br>एष धर्मः सतां ब्रह्मन् न धर्मं लोपयामि ते॥ १८८'वहाँ मुझे जो विद्याएँ प्राप्त हुई हैं, उन्हें मैं तुमलोगोंको पढ़ाऊँगा।' यह सुनकर वे सभी प्रसन्नमनसे विद्या-प्राप्तिके लिये वहाँ एकत्र हो गये। उधर जब वह दस वर्षका निश्चित समय पूर्ण हो गया, तब शुक्राचार्यने अपने यजमानोंकी खोज-खबर लेनेका विचार किया। इसी समयकी समाप्तिपर (जयन्तीके गर्भसे) देवयानी उत्पन्न हुई थी—ऐसा सुना जाता है। (तब वे जयन्तीसे बोले—) 'पावन मुसकानवाली देवि! तुम्हारे नेत्र तो विभ्रान्त-से एवं बड़े हैं तथा तुम्हारी दृष्टि चञ्चल है, साध्वि! अब मैं तुम्हारे यजमानोंकी देखभाल करनेके लिये जा रहा हूँ।' यों कहे जानेपर जयन्तीने शुक्राचार्यसे कहा—'महाव्रत! आप अपने भक्तोंका अवश्य भला कीजिये; क्योंकि यही सत्पुरुषोंका धर्म है। ब्रह्मन्! मैं आपके धर्मका लोप नहीं करना चाहती'॥ १८२—१८८॥
ततो गत्वासुरान् दृष्ट्वा देवाचार्येण धीमता।<br>वञ्चितान् काव्यरूपेण ततः काव्योऽब्रवीत्तु तान्॥ १८९<br>काव्यं मां वो विजानीध्वं तोषितो गिरिशो विभुः।<br>वञ्चिता बत यूयं वै सर्वे शृणुत दानवाः॥ १९०<br>श्रुत्वा तथा ब्रुवाणं तं सम्भ्रान्तास्ते तदाभवन्।<br>प्रेक्षन्तस्तावभौ तत्र स्थितासीनौ सुविस्मिताः॥ १९१<br>सम्प्रमूढास्ततः सर्वे न प्राबुध्यन्त किंचन।<br>अब्रवीत् सम्प्रमूढेषु काव्यस्तानसुरांस्तदा॥ १९२<br>आचार्यों वो ह्यहं काव्यो देवाचार्योऽयमङ्गिराः।<br>अनुगच्छत मां दैत्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ १९३<br>इत्युक्ता ह्यसुरास्तेन तावुभौ समवेक्ष्य च।<br>यदासुरा विशेषं तु न जानन्त्युभयोस्तयोः॥ १९४<br>बृहस्पतिरुवाचैनानसम्भ्रान्तस्तपोधनः ।<br>काव्यो वोऽहं गुरुर्दैत्या मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ १९५<br>सम्मोहयति रूपेण मामकेनैष वोऽसुराः।<br>श्रुत्वा तस्य ततस्ते वै समेत्य तु ततोऽब्रुवन्॥ १९६तदनन्तर असुरोंके निकट पहुँचकर शुक्राचार्यने जब यह देखा कि बुद्धिमान् देवाचार्य बृहस्पतिने मेरा रूप धारणकर असुरोंको ठग लिया है, तब वे असुरोंसे बोले—'दानवो! तुमलोग ध्यानपूर्वक सुन लो। अपनी तपस्याद्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेवाला शुक्राचार्य मैं हूँ। मुझे ही तुमलोग अपना गुरुदेव शुक्राचार्य समझो। बृहस्पतिद्वारा तुम सब लोग ठग लिये गये हो।' शुक्राचार्यको वैसा कहते हुए सुनकर उस समय वे सभी अत्यन्त भ्रममें पड़ गये और आश्चर्यचकित हो वहाँ बैठे हुए उन दोनोंकी ओर निहारते ही रह गये। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे। उस समय उनकी समझमें कुछ भी नहीं आ रहा था। इस प्रकार उनके किंकर्तव्यविमूढ़ हो जानेपर शुक्राचार्यने उन असुरोंसे कहा—'असुरो! तुमलोगोंका आचार्य शुक्राचार्य मैं हूँ और ये देवताओंके आचार्य बृहस्पति हैं। इसलिये तुमलोग इन बृहस्पतिका त्याग कर दो और मेरा अनुगमन करो।' शुक्राचार्यके यों समझानेपर असुरगण उन दोनोंकी ओर ध्यानपूर्वक निहारने लगे, परंतु जब उन्हें उन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं प्रतीत हुई, तब तपस्वी बृहस्पति धैर्यपूर्वक उन असुरोंसे बोले—'दैत्यो! तुमलोगोंका गुरु शुक्राचार्य मैं हूँ और मेरा रूप धारण करनेवाले ये बृहस्पति हैं। असुरो! ये मेरा रूप धारणकर तुमलोगोंको मोहमें डाल रहे हैं'॥ १८९—१९५ ½॥
अयं नो दशवर्षाणि सततं शास्ति वै प्रभुः।<br>एष वै गुरुरस्माकमन्तरे स्फुरयन् द्विजः॥ १९७बृहस्पतिकी बात सुनकर वे सभी एकत्र हो इस प्रकार बोले—'ये सामर्थ्यशाली ब्राह्मणदेवता हमारे अन्तःकरणमें स्फुरित होते हुए दस वर्षोंसे लगातार हमलोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, अतः ये ही हमारे गुरु हैं।'
* अध्याय ४७ *१८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्ते दानवाः सर्वे प्रणिपत्याभिनन्द्य च।<br>वचनं जगृहुस्तस्य चिराभ्यासेन मोहिताः॥ १९८<br>ऊचुस्तमसुराः सर्वे क्रोधसंरक्तलोचनाः।<br>अयं गुरुर्हितोऽस्माकं गच्छ त्वं नासि नो गुरुः॥ १९९<br>भार्गवो वाङ्गिरा वापि भगवानेष नो गुरुः।<br>स्थिता वयं निदेशेऽस्य साधु त्वं गच्छ मा चिरम्॥ २००<br>एवमुक्त्वासुराः सर्वे प्रापद्यन्त बृहस्पतिम्।<br>यदा न प्रत्यपद्यन्त काव्येनोक्तं महद्धितम्॥ २०१<br>चुकोप भार्गवस्तेषामवलेपेन तेन तु।<br>बोधिता हि मया यस्मान्न मां भजथ दानवाः॥ २०२<br>तस्मात् प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ।<br>इति व्याहृत्य तान् काव्यो जगामाथ यथागतम्॥ २०३‘ऐसा कहकर चिरकालके अभ्याससे मोहित हुए उन सभी दानवोंने बृहस्पतिको प्रणाम करके उनका अभिनन्दन किया और उन्हींके वचनोंको अङ्गीकार किया। तत्पश्चात् क्रोधसे आँखें लाल करके उन सभी असुरोंने शुक्राचार्यसे कहा—‘ये ही हमलोगोंके हितैषी गुरुदेव हैं, आप हमारे गुरु नहीं हैं, अतः आप यहाँसे चले जाइये। ये चाहे शुक्राचार्य हों अथवा बृहस्पति ही क्यों न हों, ये ही हमारे ऐश्वर्यशाली गुरुदेव हैं। हमलोग इन्हींकी आज्ञामें स्थित हैं। अतः आपके लिये यही अच्छा होगा कि आप यहाँसे शीघ्र चले जाइये, विलम्ब मत कीजिये।’ ऐसा कहकर सभी असुर बृहस्पतिके निकट चले आये। इधर जब असुरोंने शुक्राचार्यद्वारा कहे गये महान् हितकारक वचनोंपर कुछ ध्यान नहीं दिया, तब उनके उस गर्वसे शुक्राचार्य कुपित हो उठे (और शाप देते हुए बोले—) ‘दानवो! चूँकि मेरे समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी है, इसलिये (भावी संग्राममें) तुम्हारी चेतना नष्ट हो जायगी और तुमलोग पराभवको प्राप्त करोगे।’ इस प्रकार असुरोंको शाप देकर शुक्राचार्य जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये॥ १९६—२०३॥
शमांस्तानसुराञ्ज्ञात्वा काव्येन स बृहस्पतिः।<br>कृतार्थः स तदा हृष्टः स्वरूपं प्रत्यपद्यत॥ २०४<br>बुद्ध्यासुरान् हताञ्ज्ञात्वा कृतार्थोऽन्तर्दधीयत।<br>ततः प्रनष्टे तस्मिंस्तु विभ्रान्ता दानवाभवन्॥ २०५<br>अहो विवञ्चिताः स्मेति परस्परमथाब्रुवन्।<br>पृष्ठतोऽभिमुखाश्चैव ताडिताङ्गिरसेन तु॥ २०६<br>वञ्चिताः सोपधानेन स्वे स्वे वस्तुनि मायया।<br>ततस्त्वपरितुष्टास्ते तमेव त्वरिता ययुः।<br>प्रह्लादमग्रतः कृत्वा काव्यस्यानुपदं पुनः॥ २०७<br>ततः काव्यं समासाद्य उपतस्थुरवाङ्मुखाः।<br>समागतान् पुनर्द्दष्ट्वा काव्यो याज्यानुवाच ह॥ २०८<br>मया सम्बोधिताः सर्वे यस्मान्मां नाभिनन्दथ।<br>ततस्तेनावमानेन गता यूयं पराभवम्॥ २०९<br>एवं ब्रुवाणं शुक्रं तु बाष्पसंदिग्धया गिरा।<br>प्रह्लादस्तं तदोवाच मा नस्त्वं त्यज भार्गव॥ २१०<br>स्वाश्रयान् भजमानांश्च भक्तांस्त्वं भज भार्गव।इधर जब बृहस्पतिको यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्यने असुरोंको शाप दे दिया, तब वे प्रसन्नतासे खिल उठे; क्योंकि उनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका था। तत्पश्चात् वे तुरंत अपने वास्तविक बृहस्पतिरूपमें प्रकट हो गये और अपने बुद्धिबलसे असुरोंको मरा हुआ जानकर सफलमनोरथ हो अन्तर्हित हो गये। बृहस्पतिके आँखोंसे ओझल हो जानेपर दानवगण विशेषरूपसे भ्रममें पड़ गये और परस्पर यों कहने लगे—‘अहो! हमलोग तो विशेषरूपसे ठग लिये गये। बृहस्पतिने हमलोगोंको आगे और पीछे अर्थात् प्रत्यक्ष और परोक्ष—दोनों ओरसे व्यथित कर दिया। उन्होंने अपनी मायाद्वारा सहायकसहित हमलोगोंको अपनी-अपनी वस्तुओंसे वञ्चित कर दिया।’ इस प्रकार असंतुष्ट हुए वे सभी दानव प्रह्लादको आगे कर पुनः उन्हीं शुक्राचार्यका अनुगमन करनेके लिये तुरंत प्रस्थित हुए और शुक्राचार्यके निकट पहुँचकर नीचे मुख किये हुए उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तब अपने यजमानोंको पुनः आया देखकर शुक्राचार्यने उनसे कहा—‘दानवो! चूँकि मेरे द्वारा भलीभाँति समझाये जानेपर भी तुम सब लोगोंने मेरा अभिनन्दन नहीं किया, इसलिये मेरे प्रति किये हुए उस अपमानके कारण तुमलोग पराभवको प्राप्त हुए हो।’ शुक्राचार्यके यों कहनेपर प्रह्लादकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। तब वे गद्गद वाणीद्वारा उनसे प्रार्थना करते हुए बोले—‘भृगुनन्दन! आप हमलोगोंका परित्याग न करें। भार्गव! हमलोग आपके आश्रित,

१८४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वय्यदृष्टे वयं तेन देवाचार्येण मोहिताः।<br>भक्तानर्हसि वै ज्ञातुं तपोदीर्घेण चक्षुषा॥ २११<br><br>यदि नस्त्वं न कुरुषे प्रसादं भृगुनन्दन।<br>अपध्यातास्त्वया ह्यद्य प्रविशामो रसातलम्॥ २१२सेवक और भक्त हैं, इसलिये आप हमें अपनाइये। आपके अदृष्ट हो जानेपर देवाचार्य बृहस्पतिने हमलोगोंको मोहमें डाल दिया था। आप अपनी दीर्घकालिक तपस्याद्वारा अर्जित दिव्यदृष्टिद्वारा स्वयं अपने भक्तोंको जान सकते हैं। भृगुनन्दन! यदि आप हमलोगोंपर कृपा नहीं करेंगे और हमलोगोंका अनिष्ट-चिन्तन ही करते रहेंगे तो हमलोग आज ही रसातलमें प्रवेश कर जायेंगे'॥ २०४—२१२॥
ज्ञात्वा काव्यो यथातत्त्वं कारुण्यादनुकम्पया।<br>एवं प्रत्यनुनीतो वै ततः कोपं नियम्य सः।<br>उवाचैतान् न भेतव्यं न गन्तव्यं रसातलम्॥ २१३<br><br>अवश्यं भाविनो ह्यर्थाः प्राप्तव्या मयि जाग्रति।<br>न शक्यमन्यथा कर्तुं दिष्टं हि बलवत्तरम्॥ २१४<br><br>संज्ञा प्रणष्टा या वोऽद्य कामं तां प्रतिपत्स्यथ।<br>देवाञ्जित्वा सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ २१५<br><br>प्राप्ते पर्यायकाले च हीति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>मत्प्रसादाच्च त्रैलोक्यं भुक्तं युष्माभिरूर्जितम्॥ २१६<br><br>युगाख्या दश सम्पूर्णा देवानाक्रम्य मूर्धनि।<br>एतावन्तं च कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत॥ २१७<br><br>राज्यं सावर्णिके तुभ्यं पुनः किल भविष्यति।<br>लोकानामीश्वरो भाव्यस्तव पौत्रः पुनर्बलिः॥ २१८<br><br>एवं किल मिथः प्रोक्तः पौत्रस्ते विष्णुना स्वयम्।<br>वाचा हृतेषु लोकेषु तास्तास्तस्याभवन् किल॥ २१९<br><br>यस्मात् प्रवृत्तयश्चास्य सकाशादभिसंधिताः।<br>तस्माद् वृत्तेन प्रीतेन तुभ्यं दत्तं स्वयम्भुवा॥ २२०<br><br>देवराज्ये बलिर्भाव्य इति मामीश्वरोऽब्रवीत्।<br>तस्माददृश्यो भूतानां कालापेक्षः स तिष्ठति॥ २२१<br><br>प्रीतेन चापरो दत्तो वरस्तुभ्यं स्वयम्भुवा।<br>तस्मान्निरुत्सुकस्त्वं वै पर्यायं सहितोऽसुरैः॥ २२२<br><br>न हि शक्यं मया तुभ्यं पुरस्ताद् विप्रभाषितुम्।इस प्रकार अनुनय-विनय किये जानेपर शुक्राचार्यने दिव्यदृष्टिद्वारा यथार्थ तत्त्वको समझ लिया, तब उनके हृदयमें करुणा एवं अनुकम्पा उमड़ आयी और वे उमड़े हुए क्रोधको रोककर उन असुरोंसे इस प्रकार बोले—'प्रह्लाद! न तो तुमलोग डरो और न रसातलको ही जाओ। यों तो जो अवश्यम्भावी इष्ट-अनिष्ट कार्य हैं, वे तो मेरे जागरूक रहनेपर भी तुमलोगोंको प्राप्त होंगे ही, उन्हें अन्यथा नहीं किया जा सकता; क्योंकि दैवका विधान सबसे बलवान् होता है। मेरे शापानुसार तुमलोगोंकी जो चेतना नष्ट हो गयी है, उसे तो तुमलोग आज ही प्राप्त कर लोगे। साथ ही विपरीत समय आनेपर तुमलोगोंको देवताओंपर विजय पा लेनेपर भी एक बार पातालमें जाना पड़ेगा; क्योंकि ब्रह्माने पहले ही ऐसा बतलाया है। मेरी ही कृपासे तुमलोगोंने देवताओंके मस्तकपर पैर रखकर समूचे दस युगपर्यन्त त्रिलोकीके ऊर्जस्वी राज्यका उपभोग किया है। इतने ही दिनोंतक ब्रह्माने तुमलोगोंका राज्यकाल बतलाया था। सावणि-मन्वन्तरमें पुनः तुमलोगोंका राज्य होगा। उस समय तुम्हारा पौत्र बलि त्रिलोकीका अधीश्वर होगा। ऐसा स्वयं भगवान् विष्णुने वाणीद्वारा त्रिलोकीके अपहरण कर लेनेपर तुम्हारे पौत्रसे परस्पर वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा था। वे सारी बातें अब उसके लिये घटित होंगी। चूँकि इसकी प्रवृत्तियाँ दस वर्षोंतक उत्तम बनी रहीं, इसलिये इसके व्यवहारसे प्रसन्न होकर स्वयम्भूने तुम्हें यह राज्य प्रदान किया है। देवराज्यपर बलि अधिष्ठित होगा—ऐसा मुझसे भगवान् शंकरने भी कहा था। इसी कारण वह कालकी प्रतीक्षा करता हुआ जीवोंके नेत्रोंके अगोचर होकर अवस्थित है। उस समय प्रसन्न हुए स्वयम्भूने तुम्हें एक दूसरा वरदान भी दिया था, इसलिये तुम असुरोंसहित निरुत्सुक रहकर कालकी प्रतीक्षा करो। विभो! यद्यपि मैं भविष्यकी सारी बातें जानता हूँ, तथापि मैं पहले ही तुमसे उन घटनाओंका वर्णन नहीं कर सकता;
* अध्याय ४७ *१८५
ब्रह्मणा प्रतिषिद्धोऽहं भविष्यं जानता विभो ॥ २२३<br>इमौ च शिष्यौ द्वौ मह्यं समावेतौ बृहस्पतेः ।<br>दैवतैः सह संसृष्टान् सर्वान् वो धारयिष्यतः ॥ २२४क्योंकि ब्रह्माजीने मुझे मना कर दिया है। मेरे ये दोनों शिष्य (षण्ड और अमर्क), जो बृहस्पतिके समान प्रभावशाली हैं, देवताओंके साथ ही उत्पन्न हुए तुम सब लोगोंकी रक्षा करेंगे' ॥ २१३—२२४ ॥
इत्युक्ता ह्यसुराः सर्वे काव्येनाक्लिष्टकर्मणा ।<br>हृष्टास्तेन ययुः सार्धं प्रह्लादेन महात्मना ॥ २२५सरलतापूर्वक कार्यको सम्पन्न करनेवाले शुक्राचार्यके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर असुरगण उन महात्मा प्रह्लादके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने वासस्थानको चले गये।
अवश्यं भाव्यमर्थं तु श्रुत्वा शुक्रेण भाषितम् ।<br>सकृदाशंसमानास्तु जयं शुक्रेण भाषितम् ।<br>दंशिताः सायुधाः सर्वे ततो देवान् समाह्वयन् ॥ २२६उस समय उनके मनमें शुक्राचार्यद्वारा कथित यह विचार कि 'अवश्यम्भावी कार्य तो होगा ही' गूँज रहा था। कुछ दिन व्यतीत होनेपर उन्होंने सोचा कि शुक्राचार्यके कथनानुसार एक बार विजय तो होगी ही, अतः सभी असुरोंने विजयकी आशासे अपना-अपना कवच धारण कर लिया और शस्त्रास्त्रसे लैस हो देवताओंके निकट जाकर उन्हें ललकारा।
देवास्तदासुरान् दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान् ।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान् समयोधयन् ॥ २२७<br>देवासुरे तदा तस्मिन् वर्तमाने शतं समाः ।<br>अजयन्नसुरा देवांस्ततो देवा ह्यामन्त्रयन् ॥ २२८देवताओंने जब यह देखा कि असुरगण सेनासहित रणभूमिमें आ डटे हैं, तब देवगण भी संगठित एवं युद्ध-सामग्रीसे सुसज्जित हो असुरोंके साथ युद्ध करने लगे। वह देवासुर-संग्राम सौ वर्षोंतक चलता रहा। उसमें असुरोंने देवताओंको पराजित किया। तब देवताओंने परस्पर मन्त्रणा करके यह निश्चय किया कि
यज्ञेनोपाह्वयामस्तौ ततो जेष्यामहेऽसुरान् ।<br>तदोपामन्त्रयन् देवाः षण्डामकौँ तु तावुभौ ॥ २२९<br>यज्ञे चाहूय तौ प्रोक्तौ त्यजेतामसुरान् द्विजौ ।<br>वयं युवां भजिष्यामः सह जित्वा तु दानवान् ॥ २३०जब हमलोग यज्ञके निमित्तसे उन दोनों (षण्ड और अमर्क)-को अपने यहाँ बुलायेंगे तभी असुरोंपर विजय पा सकेंगे। ऐसा परामर्श करके देवताओंने उन षण्ड और अमर्क—दोनोंको आमन्त्रित किया और अपने यज्ञमें बुलाकर उनसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग असुरोंका पक्ष छोड़ दें। हमलोग आप दोनोंके सहयोगसे दानवोंको पराजित कर आपकी सेवा करेंगे।'
एवं कृताभिसंधी तौ षण्डामकौँ सुरास्तथा ।<br>ततो देवा जयं प्रापुर्दानवाश्च पराजिताः ॥ २३१<br>षण्डामर्कपरित्यक्ता दानवा ह्यबलास्तथा ।<br>एवं दैत्याः पुरा काव्यशापेनाभिहतास्तदा ॥ २३२इस प्रकार जब देवताओंके तथा षण्ड-अमर्क—दोनों दैत्याचार्योंके बीच संधि हो गयी, तब रणभूमिमें देवताओंको विजय प्राप्त हुई और दानवगण पराजित हो गये; क्योंकि षण्ड-अमर्कद्वारा परित्याग कर दिये जानेपर दानववृन्द बलहीन हो गये थे। इस प्रकार पूर्वकालमें शुक्राचार्यद्वारा दिये गये शापके कारण उस समय दैत्यगण मारे गये।
काव्यशापाभिभूतास्ते निराधाराश्च सर्वशः ।<br>निरस्यमाना देवैश्च विविशुस्ते रसातलम् ॥ २३३अवशिष्ट दैत्यगण शुक्राचार्यके शापसे अभिभूत होनेके कारण जब सब ओरसे निराधार हो गये, साथ ही देवताओंने उन्हें खदेड़ना आरम्भ किया, तब वे विवश होकर रसातलमें प्रविष्ट हो गये।
एवं निरुद्यमा देवैः कृताः कृच्छ्रेण दानवाः ।<br>ततः प्रभृति शापेन भृगोर्नैमित्तिकेन तु ॥ २३४<br>जज्ञे पुनः पुनर्विष्णुर्धर्मे प्रशिथिले प्रभुः ।इस प्रकार देवगण दानवोंको बड़ी कठिनाईसे उद्यमहीन अर्थात् युद्धविमुख कर पाये। तभीसे शुक्राचार्यके नैमित्तिक शापके कारण धर्मका विशेषरूपसे ह्रास हो जानेपर धर्मकी पुनः स्थापना
१८६* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
कुर्वन् धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्॥ २३५और असुरोंका विनाश करनेके लिये भगवान् विष्णु बारंबार अवतीर्ण होते रहे॥ २२५-२३५॥
प्रह्लादस्य निदेशे तु न स्थास्यन्त्यसुराश्च ये।<br>मनुष्यवध्यास्ते सर्वे ब्रह्मेति व्याहरत् प्रभुः॥ २३६<br>धर्मन्नारायणस्यांशः सम्भूतश्चाक्षुषेऽन्तरे।<br>यज्ञं प्रवर्तयामासदेवो वैवस्वतेऽन्तरे॥ २३७<br>प्रादुर्भावे ततस्तस्य ब्रह्मा ह्वासीत् पुरोहितः।<br>युगाख्यायां चतुर्थ्यां तु आपन्नेषु सुरेषु वै॥ २३८<br>सम्भूतस्तु समुद्रान्ते हिरण्यकशिपोर्वधे।<br>द्वितीये नरसिंहाख्ये रुद्रो ह्वासीत् पुरोहितः॥ २३९<br>बलिसंस्थेषु लोकेषु त्रेतायां सप्तमं प्रति।<br>दैत्यैस्त्रैलोक्य आक्रान्ते तृतीयो वामनोऽभवत्॥ २४०<br>एतास्तिस्रः स्मृतास्तस्य दिव्याः सम्भूतयो द्विजाः।<br>मानुषाः सप्त यान्यास्तु शापतस्ता निबोधत॥ २४१<br>त्रेतायुगे तु प्रथमे दत्तात्रेयो बभूव ह।<br>नष्टे धर्मे चतुर्थांशे मार्कण्डेयपुरःसरः॥ २४२<br>पञ्चमः पञ्चदश्यां च त्रेतायां सम्बभूव ह।<br>मान्धाता चक्रवर्ती तु तस्थौतथ्यपुरःसरः॥ २४३<br>एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकृद् विभुः।<br>जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः॥ २४४<br>चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा।<br>सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः॥ २४५<br>अष्टमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पराशरात्।<br>वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः॥ २४६पूर्वकालमें सामर्थ्यशाली ब्रह्मा ने प्रसङ्गवश ऐसा कहा था कि जो असुर प्रह्लादकी आज्ञाके वशीभूत नहीं रहेंगे, वे सभी मनुष्योंके हाथों मारे जायँगे। चाक्षुष-मन्वन्तरमें धर्मके अंशसे साक्षात् भगवान् नारायणका अवतार हुआ था। अपने प्रादुर्भावके पश्चात् वैवस्वत-मन्वन्तरमें उन्होंने एक यज्ञानुष्ठान प्रवर्तित किया था; उस यज्ञके पुरोहित ब्रह्मा थे। चौथे तामस-मन्वन्तरमें देवताओंके विपत्तिग्रस्त हो जानेपर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये समुद्रतटपर नृसिंहका अवतार हुआ था। इस द्वितीय नृसिंहावतारमें रुद्र पुरोहित-पदपर आसीन थे। सातवें वैवस्वत-मन्वन्तरके त्रेतायुगमें, जब त्रिलोकीपर बलिक अधिकार था, उस समय तीसरा वामन-अवतार हुआ था। (उस कार्यकालमें धर्म पुरोहितका पद सँभाल रहे थे।) द्विजवरो! भगवान् विष्णुकी ये तीन दिव्य उत्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं। अब अन्य सात सम्भूतियाँ, जो भृगुके शापवश मानव-योनिमें हुई हैं, उन्हें सुनिये। प्रथम त्रेतायुगमें, जब धर्मका चतुर्थांश नष्ट हो गया था, भगवान् मार्कण्डेयको पुरोहित बनाकर दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। पंद्रहवें त्रेतायुगमें चक्रवर्ती मान्धाताके रूपमें पाँचवाँ अवतार हुआ था। उस समय पुरोहितका पद महर्षि तथ्य (उत्तथ्य)-को मिला था। उन्नीसवें त्रेतायुगमें छठा अवतार जमदग्निनन्दन महाबली परशुरामके रूपमें हुआ था, जो सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशके संहारक थे। उस समय महर्षि विश्वामित्र आदि सहायक बने थे। चौबीसवें त्रेतायुगमें सातवें अवतारके रूपमें रावणका वध करनेके लिये भगवान् श्रीराम महाराज दशरथके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उस समय महर्षि वसिष्ठ पुरोहित थे। अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें आठवें अवतारमें भगवान् विष्णु महर्षि पराशरसे वेदव्यासके रूपमें अवतीर्ण हुए। उस समय जातूकर्ण्यने पुरोहित-पदको सुशोभित किया॥ २३६-२४६॥
कर्तुं धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्।<br>बुद्धो नवमको जज्ञे तपसा पुष्करेक्षणः।<br>देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुरःसरः॥ २४७<br>तस्मिन्नेव युगे क्षीणे संध्याशिष्टे भविष्यति।<br>कल्की तु विष्णुयशसः पाराशर्यपुरःसरः।<br>दशमो भाव्यसम्भूतो याज्ञवल्क्यपुरःसरः॥ २४८<br>सर्वांश्च भूतान् स्तिमितान् पाषण्डांश्चैव सर्वशः।धर्मकी विशेषरूपसे स्थापना और असुरोंका विनाश करनेके निमित्त नवें अवतारमें बुद्ध अवतीर्ण हुए। सुन्दर (सौन्दरानन्दके नायक) उनके सहचर रूपवाले थे। उनके नेत्र कमल-सरीखे थे। उनके पुरोहित महर्षि द्वैपायन थे। इसी युगकी समाप्तिके समय, जब संध्यामात्र अवशिष्ट रह जायगी, विष्णुयशके पुत्ररूपमें कल्कि का अवतार होगा। इसी भावी दसवें अवतारमें पराशर-पुत्र व्यास और याज्ञवल्क्य पुरोहितका कार्यभार सँभालेंगे। उस समय भगवान् कल्कि आयुधधारी सैकड़ों एवं सहस्रों विप्रोंको साथ लेकर चारों

४९ पूरु-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास

* अध्याय ४७ * | १८७


| प्रगृहीतायुधैर्विप्रैर्वृतः शतसहस्रशः॥ २४९<br>निःशेषः क्षुद्रराज्ञांस्तु तदा स तु करिष्यति।<br>ब्रह्मद्विषः सपत्नांस्तु संहृत्यैव च तद्वपुः॥ २५०<br>अष्टाविंशे स्थितः कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>शूद्रान् संशोध्ययित्वा तु समुद्रान्तं च वै स्वयम्॥ २५१<br>प्रवृत्तचक्रो बलवान् संहारं तु करिष्यति।<br>उत्सादयित्वा वृषलान् प्रायशस्तानधार्मिकान्॥ २५२<br>ततस्तदा स वै कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>प्रजास्तं साधयित्वा तु समृद्धास्तेन वै स्वयम्॥ २५३<br>अकस्मात् कोपितान्योऽन्यं भविष्यन्तीह मोहिताः।<br>क्षपयित्वा तु तेऽन्योऽन्यं भाविनाऽर्थेन चोदिताः॥ २५४<br>ततः काले व्यतीते तु स देवोऽन्तरधीयत।<br>नृपेष्वथ प्रणष्टेषु प्रजानां संग्रहात् तदा॥ २५५<br>रक्षणे विनिवृत्ते तु हत्वा चान्योऽन्यमाहवे।<br>परस्परं निहत्वा तु निराक्रन्दाः सुदुःखिताः॥ २५६<br>पुराणि हित्वा ग्रामांश्च तुल्यत्वे निष्परिग्रहाः।<br>प्रणष्टाश्रमधर्मांश्च नष्टवर्णाश्रमास्तथा॥ २५७<br>अट्टशूला जानपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।<br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति युगक्षये॥ २५८<br>ह्रस्वदेहायुषश्चैव भविष्यन्ति वनौकसः।<br>सरित्पर्वतवासिन्यो मूलपत्रफलाशनाः॥ २५९<br>चीरचर्माजिनधराः संकरं घोरमाश्रिताः।<br>उत्पातदुःखाः स्वल्पार्था बहुबाधाश्च ताः प्रजाः॥ २६०<br>एवं कष्टमनुप्राप्ताः काले संध्यंशके तदा।<br>ततः क्षयं गमिष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु॥ २६१<br>क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतमवर्तत।<br>इत्येतत् कीर्तितं सम्यग् देवासुरविचेष्टितम्॥ २६२<br>यदुवंशप्रसङ्गेन समासाद् वैष्णवं यशः।<br>तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोर्द्रुह्योस्तथा ह्यनोः॥ २६३ | ओरसे धर्मविमुख जीवों, पाखण्डों और शूद्रवंशी राजाओंका सर्वथा विनाश कर डालेंगे; क्योंकि ब्रह्मद्वेषी शत्रुओंका संहार करनेके हेतु ही कल्कि-अवतार होता है। इस अट्ठाईसवें युगमें भगवान् कल्कि सेनासहित सफलमनोरथ हो विराजमान रहेंगे। उस समय वे बलशाली भगवान् उन धर्महीन शूद्रोंका समूल विनाश करके अपने राज्यचक्रका विस्तार करते हुए पापियोंका संहार कर डालेंगे। तदुपरान्त कल्कि अपना कार्य पूरा करके सेनासहित विश्राम-लाभ करेंगे। उस समय सारी प्रजाएँ उनके प्रभावसे समृद्धिशालिनी होकर उनकी सेवामें लग जायेंगी। तत्पश्चात् भावी कार्यसे प्रेरित हुई प्रजाएँ मोहित होकर अकस्मात् एक-दूसरेपर कुपित हो जायेंगी और परस्पर लड़कर एक-दूसरेको मार डालेंगी। उस समय कार्यकाल समाप्त हो जानेपर भगवान् कल्कि भी अन्तर्हित हो जायेंगे॥ २४७—२५४ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार प्रजाओंके संगठनसे राजाओंके नष्ट हो जानेपर जब कोई रक्षक नहीं रह जायगा, तब प्रजाएँ युद्धभूमिमें एक-दूसरेको मार डालेंगी। यों परस्पर मार-पीट कर वे आक्रन्दनरहित एवं अत्यन्त दुःखित हो जायेंगी। फिर तो वे परिवारहीन होकर समानरूपसे ग्रामों एवं नगरोंको छोड़कर वनकी राह लेंगी। उनके वर्ण-धर्म तथा आश्रम-धर्म नष्ट हो जायँगे। कलियुगकी समाप्तिके समय देशवासी अन्न बेचने लगेंगे, चौराहोंपर शिवकी मूर्तियाँ बिकने लगेंगी और स्त्रियाँ अपने शीलका विक्रय करेंगी अर्थात् वेश्या-कर्ममें प्रवृत्त हो जायेंगी। लोगोंके कद छोटे होंगे। उनकी आयु स्वल्प होगी। वे वनमें तथा नदीतट और पर्वतोंपर निवास करेंगे। कन्द-मूल, पत्तियाँ और फल ही उनके भोजन होंगे। वल्कल, पशुचर्म और मृगचर्म ही उनके वस्त्र होंगे। वे सभी भयंकर वर्णसंकरत्वके आश्रित हो जायँगे। तरह-तरहके उपद्रवोंसे दुःखी रहेंगे। उनकी धन-सम्पत्ति घट जायगी और वे अनेकों बाधाओंसे घिरे रहेंगे। इस प्रकार कष्टका अनुभव करती हुई वे सारी प्रजाएँ उस संध्यांशके समय कलियुगके साथ ही नष्ट हो जायेंगी। इस कलियुगके व्यतीत हो जानेपर कृतयुगका प्रारम्भ होगा। इस प्रकार मैंने पूर्णरूपसे देवताओं और असुरोंकी चेष्टाका तथा यदुवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें संक्षेपसे भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण)-के यशका वर्णन कर दिया। अब मैं तुर्वसु, पूरु, द्रुह्यु और अनुके वंशका क्रमशः वर्णन करूँगा॥ २५५—२६३ ॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽसुरशापो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें असुर-शाप-नामक सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४७ ॥

१८८ * मत्स्यपुराण *


अड़तालीसवाँ अध्याय

तुर्वसु और द्रुह्युके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग

सूत उवाच
तुर्वसोस्तु सुतो गर्भो गोभानुस्तस्य चात्मजः।<br>गोभानोस्तु सुतो वीरस्त्रिसारिरपराजितः॥ १<br>करंधमस्तु त्रैसारिर्मरुत्तस्तस्य चात्मजः।<br>दुष्यन्तं पौरवं चापि स वै पुत्रमकल्पयत्॥ २<br>एवं ययातिशापेन जरासंक्रमणे पुरा।<br>तुर्वसोः पौरवं वंशं प्रविवेश पुरा किल॥ ३<br>दुष्यन्तस्य तु दायादो वरूथो नाम पार्थिवः।<br>वरूथात् तु तथाण्डीरः संधानस्तस्य चात्मजः॥ ४<br>पाण्ड्यश्च केरलश्चैव चोलः कर्णस्तथैव च।<br>तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः॥ ५<br>द्रुह्योस्तु तनयौ शूरौ सेतुः केतुस्तथैव च।<br>सेतुपुत्रः शरद्व्वांस्तु गन्धारस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>ख्यायते यस्य नाम्नासौ गान्धारविषयो महान्।<br>आरट्टदेशजास्तस्य तुरगा वाजिनां वराः॥ ७<br>गन्धारपुत्रो धर्मस्तु धृतस्तस्यात्मजोऽभवत्।<br>धृताच्च विदुषो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मजः॥ ८<br>प्रचेतसः पुत्रशतं राजानः सर्व एव ते।<br>म्लेच्छराष्ट्राधिपाः सर्वे ह्युदीचीं दिशमाश्रिताः॥ ९**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (ययातिके पञ्चम पुत्र) तुर्वसुका पुत्र गर्भ$^१$ और उसका पुत्र गोभानु हुआ। गोभानुका पुत्र अजेय शूरवीर त्रिसारि हुआ। त्रिसारिका$^२$ पुत्र करंधम और उसका पुत्र मरुत्त हुआ। उसने (संतानरहित होनेके कारण) पूरुवंशी दुष्यन्तको अपना पुत्र बनाया। इस प्रकार पूर्वकालमें वृद्धावस्थाके परिवर्तनके समय ययातिद्वारा दिये गये शापके कारण तुर्वसुका वंश पूरुवंशमें प्रविष्ट हो गया था$^३$। दुष्यन्तका पुत्र राजा वरूथ$^४$ था। वरूथसे आण्डीर (भुवमन्यु)-की उत्पत्ति हुई। आण्डीरके संधान, पाण्ड्य, केरल, चोल और कर्ण नामक पाँच पुत्र हुए। उनके समृद्धिशाली देश उन्हींके नामपर पाण्ड्य, चोल और केरल नामसे प्रसिद्ध हुए। (ययातिके चतुर्थ पुत्र) द्रुह्युके सेतु और केतु (अन्यत्र सर्वत्र बभ्रु) नामक दो शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। सेतुका पुत्र शरद्वान् और उसका पुत्र गन्धार हुआ, जिसके नामसे यह विशाल गान्धार जनपद विख्यात है। उस जनपदके आरट्ट$^५$ (पंजाबका पश्चिम भाग) प्रदेशमें उत्पन्न हुए घोड़े अश्वजातिमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। गन्धारका पुत्र धर्म और उसका पुत्र धृत हुआ। धृतसे विदुषका जन्म हुआ और उसका पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेताके सौ पुत्र हुए जो सब-के-सब राजा हुए। वे सभी उत्तर दिशामें स्थित म्लेच्छ-राज्योंके अधीश्वर थे॥ १—९॥
अनोश्चैव सुता वीरास्त्रयः परमधार्मिकाः।<br>सभानरश्चाक्षुषश्च परमेषुस्तथैव च॥ १०<br>सभानरस्य पुत्रस्तु विद्वान् कोलाहलो नृपः।<br>कोलाहलस्य धर्मात्मा संजयो नाम विश्रुतः॥ ११(ययातिके तृतीय पुत्र) अनुके सभानर, चाक्षुष और परमेषु नामक तीन शूरवीर एवं परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए। सभानरका पुत्र विद्वान् राजा कोलाहल हुआ। कोलाहलका धर्मात्मा पुत्र संजय नामसे

१. ऋग्वेदमें यह तुर्वश है और ४।३०।१६ से १०।६२।१० तक निरन्तर अपने सभी उपर्युक्त भाइयोंके साथ वर्णित है। भागवत ९।२३।१६ तथा विष्णुपुराण ४।१६।३ आदिमें तुर्वसके पुत्रका नाम 'वह्नि' और उसके पुत्रका नाम 'गोभानु'की जगह 'भर्ग' बतलाया गया है।
२. अन्यत्र प्रायः सर्वत्र इसका 'त्रिसारि'की जगह 'त्रिभानु' नाम आया है।
३. तुर्वसुके वंशके पौरव वंशमें प्रविष्ट होनेकी कथा सभी पुराणोंमें (विशेषकर वायु० ९९।५, ब्रह्माण्ड० ३।७५।७ तथा विष्णुपुराण ४।१६।६ में बहुत) स्पष्ट रूपसे आयी है।
४. इनके दूसरे नाम वितथ एवं भरद्वाज भी हैं।
५. इस प्रदेशकी महाभारत, कर्णपर्व ४४।३७-३८ (श्लोक) से ४५ (श्लोक ३० तक) अध्यायोंतकमें चर्चा एवं आलोचना है।

* अध्याय ४८ * १८९

संजयस्याभवत् पुत्रो वीरो नाम पुरंजयः।<br>जनमेजयो महाराजः पुरंजयसुतोऽभवत् ॥ १२<br>जनमेजयस्य राजर्षेर्महाशालोऽभवत् सुतः।<br>आसीदिन्द्रसमो राजा प्रतिष्ठितयशाभवत् ॥ १३<br>महामनाः सुतस्तस्य महाशालस्य धार्मिकः।<br>सप्तद्वीपेश्वरो जज्ञे चक्रवर्ती महामनाः ॥ १४<br>महामनास्तु द्वौ पुत्रौ जनयामास विश्रुतौ।<br>उशीनरं च धर्मज्ञं तितिक्षुं चैव तावुभौ ॥ १५<br>उशीनरस्य पत्न्यस्तु पञ्च राजर्षिसम्भवाः।<br>भृशा कृशा नवा दर्शा या च देवी दृषद्वती ॥ १६<br>उशीनरस्य पुत्रास्तु तासु जाताः कुलोद्वहाः।<br>तपसा ते तु महता जाता वृद्धस्य धार्मिकाः ॥ १७<br>भृशायास्तु नृगः पुत्रो नवाया नव एव च।<br>कृशायास्तु कृशो जज्ञे दर्शायाः सुव्रतोऽभवत्।<br>दृषद्वत्याः सुतश्चापि शिबिरौशीनरो नृपः ॥ १८<br>शिबेस्तु शिबयः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>पृथुदर्भः सुवीरश्च केकयो मद्रकस्तथा ॥ १९<br>तेषां जनपदाः स्फीताः कैकया मद्रकास्तथा।<br>सौवीराश्चैव पौराश्च नृगस्य केकयास्तथा ॥ २०<br>सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा कृशस्य वृषला पुरी।<br>नवस्य नवराष्ट्रं तु तितिक्षोस्तु प्रजां शृणु ॥ २१विख्यात था। संजयका पुरंजय नामक वीरवर पुत्र हुआ। महाराज जनमेजय (प्रथम) पुरंजयके पुत्र हुए। राजर्षि जनमेजयसे महाशाल नामक पुत्र पैदा हुआ जो इन्द्रतुल्य तेजस्वी एवं प्रतिष्ठित कीर्तिवाला राजा हुआ। उन महाशालके महामना नामक पुत्र पैदा हुआ जो परम धर्मात्मा, महान् मनस्वी तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। महामनाने दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों धर्मज्ञ उशीनर और तितिक्षु नामसे विख्यात हुए। उशीनरकी भृशा, कृशा, नवा, दर्शा और देवी दृषद्वती—ये पाँच पत्नियाँ थीं, जो सभी राजर्षियोंकी कन्याएँ थीं। उनके गर्भसे उशीनरके परम धर्मात्मा एवं कुलवर्धक पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी उशीनरकी वृद्धावस्थामें महान् तपके फलस्वरूप पैदा हुए थे। भृशाका पुत्र नृग और नवाका पुत्र नव हुआ। कृशाने कृशको जन्म दिया। दर्शाके सुव्रत नामक पुत्र हुआ। दृषद्वतीके पुत्र उशीनर-नन्दन राजा शिबि हुए। शिबिके पृथुदर्भ, सुवीर, केकय और मद्रक नामक चार विश्वविख्यात पुत्र हुए। ये सभी शिबिगण नामसे भी प्रसिद्ध थे। इनके समृद्धिशाली जनपद केकय (व्यास और शतलजके मध्य पंजाबका पश्चिमोत्तर भाग), मद्रक, सौवीर (सिंधका उत्तरी भाग) और पौर नामसे विख्यात थे। नृगका जनपद केकय और सुव्रतका अम्बष्ठ नामसे प्रसिद्ध था। कृशकी राजधानी वृषलापुरी थी। नव नवराष्ट्रके अधीश्वर थे। अब तितिक्षुकी संततिका वर्णन सुनिये॥ १०—२१॥
तितिक्षुरभवद् राजा पूर्वस्यां दिशि विश्रुतः।<br>वृषद्रथः सुतस्तस्य तस्य सेनोऽभवत् सुतः ॥ २२<br>सेनस्य सुतपा जज्ञे सुतपस्तनयो बलिः।<br>जातो मानुषयोन्या तु क्षीणे वंशे प्रजेच्छया ॥ २३<br>महायोगी तु स बलिर्बद्धो बन्धैर्महात्मना।<br>पुत्रानुत्पादयामास क्षेत्रजान् पञ्च पार्थिवान् ॥ २४<br>अङ्गं स जनयामास वङ्गं सुह्मं तथैव च।<br>पुण्ड्रं कलिङ्गं च तथा बालेयं क्षेत्रमुच्यते।<br>बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकराः प्रभोः ॥ २५<br>बलेश्च ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन धीमतः।<br>महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम् ॥ २६<br>संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैवोत्तमा मतिः।<br>त्रैकाल्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा ॥ २७तितिक्षु पूर्व दिशामें विख्यात राजा हुआ। उसका पुत्र वृषद्रथ और वृषद्रथका पुत्र सेन हुआ। सेनके सुतपा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुतपाका पुत्र बलि हुआ। महायोगी बलि अपने वंशके नष्ट हो जानेपर संतानकी कामनासे मानव-योनिमें उत्पन्न हुआ था। इसे महान् आत्मबलसे सम्पन्न भगवान् विष्णुने वामनरूपसे बन्धनोंद्वारा बाँध लिया था। राजा बलिने पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको जन्म दिया जो सभी आगे चलकर पृथिवीपति हुए। उसने अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामक पुत्रोंको पैदा किया जो बलिके क्षेत्रज पुत्र कहलाते हैं। ये बलिपुत्र ब्राह्मणसे उत्पन्न होनेके कारण ब्राह्मण थे और सामर्थ्यशाली बलिके वंशप्रवर्तक हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माने प्रसन्न होकर बुद्धिमान् बलिको ऐसा वरदान दिया था कि 'तुम महान् योगी होगे। कल्पपर्यन्त परिमाणवाली तुम्हारी आयु होगी। तुम संग्राममें किसीसे पराजित नहीं होगे। धर्मके विषयमें तुम्हारी बुद्धि उत्तम होगी। तुम त्रिकालदर्शी और असुरवंशमें प्रधान
१९०* मत्स्यपुराण *

| जयं चाप्रतिमं युद्धे धर्मे तत्त्वार्थदर्शनम्।<br>चतुरो नियतान् वर्णान् स वै स्थापयिता प्रभुः॥ २८<br>तेषां च पञ्च दायादा वङ्गाङ्गाः सुह्मकास्तथा।<br>पुण्ड्राः कलिङ्गाश्च तथा अङ्गस्य तु निबोधत ॥ २९ | होगे। युद्धमें तुम्हें अनुपम विजय प्राप्त होगी। धर्मके विषयमें तुम तत्त्वार्थदर्शी होगे।' इसीके परिणामस्वरूप | | ऋषय ऊचुः<br>कथं बलेः सुता जाताः पञ्च तस्य महात्मनः।<br>किं नाम्नी महिषी तस्य जनिता कतमो ऋषिः॥ ३०<br>कथं चोत्पादितास्तेन तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्।<br>माहात्म्यं च प्रभावं च निखिलेन वदस्व तत्॥ ३१ | सामर्थ्यशाली बलि चारों नियत (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, | | सूत उवाच<br>अथौशिज इति ख्यात आसीद् विद्वान् ऋषिः पुरा।<br>पत्नी वै ममता नाम बभूवास्य महात्मनः ॥ ३२<br>उशिजस्य यवीयान् वै भ्रातृपत्नीमकामयत्।<br>बृहस्पतिर्महातेजा ममतामेत्य कामतः ॥ ३३ | शूद्र) वर्णोंकी स्थापना करनेवाला हुआ। बलिके पाँचों | | उवाच ममता तं तु देवरं वरवर्णिनी।<br>अन्तर्वत्न्यस्मि ते भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तु विरम्यताम् ॥ ३४<br>अयं तु मे महाभाग गर्भः कुप्येद् बृहस्पते।<br>औशिजो भ्रातृजन्यस्ते सोपाङ्गं वेदमूद्गिरन् ॥ ३५<br>अमोघरेतास्त्वं चापि न मां भजितुमर्हसि।<br>अस्मिन्नेवं गते काले यथा वा मन्यसे प्रभो॥ ३६ | क्षेत्रज पुत्रोंके वंश भी उन्हींके नामपर अङ्ग, वङ्ग, सुह्मक, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामसे विख्यात हुए*। | | एवमुक्तस्तथा सम्यग् बृहत्तेजा बृहस्पतिः।<br>कामात्मा स महात्मापि न मनः सोऽभ्यवारयत् ॥ ३७<br>सम्बभूवैव धर्मात्मा तया सार्धमकामया।<br>उत्सृजन्तं तु तद्रेतो वाचं गर्भोऽभ्यभाषत ॥ ३८<br>भो तात वाचामधिप द्वयोर्नास्तीह संस्थितिः।<br>अमोघरेतास्त्वं चापि पूर्वं चाहमिहागतः॥ ३९ | उनमें अङ्गके वंशका वर्णन सुनिये ॥२२—५०॥ | | सोऽशपत् तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो बृहस्पतिः।<br>पुत्रं ज्येष्ठस्य वै भ्रातुर्गर्भस्थं भगवानृषिः॥ ४०<br>यस्मात् त्वमीदृशे काले गर्भस्थोऽपि निषेधसि।<br>मामेवमुक्तवांस्तस्मात् तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि ॥ ४१ | ऋषियो! दीर्घतमाके प्रभावसे सुदेष्णाका जो ज्येष्ठ | | ततो दीर्घतमा नाम शापादृषिरजायत।<br>अथौशिजो बृहत्कीर्तिर्बृहस्पतिरिवौजसा॥ ४२<br>ऊर्ध्वरेतास्ततोऽसौ वै वसते भ्रातुराश्रमे।<br>स धर्मान् सौरभेयांस्तु वृषभाच्छ्रुतवांस्ततः॥ ४३<br>तस्य भ्राता पितृव्यो यश्चकार भरणं तदा। | पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम अङ्ग था। तत्पश्चात् कलिङ्ग, पुण्ड्र, सुह्म और वङ्गराजका जन्म हुआ। ये पाँचों दैत्यराज |


* इनके वंशजातिवालोंके कारण ये जनपद भी इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हुए। इनमें अङ्ग—भागलपुर, वङ्ग—पश्चिम बंगाल, सुह्म—आसाम, पुण्ड्र—आजका बंगला देश तथा कलिङ्ग—उड़ीसा है।

* अध्याय ४८ * १९१

तस्मिन् निवसतस्तस्य यदृच्छैवागतो वृषः॥ ४४
यज्ञार्थमाहतान् दर्भांश्चचार सुरभीसुतः।
जग्राह तं दीर्घतमाः शृङ्गयोस्तु चतुष्पदम्॥ ४५
तेनासौ निगृहीतश्च न चचाल पदात् पदम्।
ततोऽब्रवीद् वृषस्तं वै मुञ्च मां बलिनां वर॥ ४६
न मयाऽऽसादितस्तात बलवांस्त्वत्समः क्वचित्।
मम चान्यः समो वापि न हि मे बलसंख्यया।
मुञ्च तातेति च पुनः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु॥ ४७
एवमुक्तोऽब्रवीदेनं जीवन्मे क्व यास्यसि।
एष त्वां न विमोक्ष्यामि परस्वादं चतुष्पदम्॥ ४८

वृषभ उवाच
नास्माकं विद्यते तात पातकं स्तेयमेव च।
भक्ष्याभक्ष्यं तथा चैव पेयापेयं तथैव च॥ ४९
द्विपदां बहवो ह्येते धर्म एष गवां स्मृतः।
कार्याकार्ये न वागम्यागमनं च तथैव च॥ ५०

सूत उवाच
गवां धर्मं तु वै श्रुत्वा सम्भ्रान्तस्तु विसृज्य तम्।
शक्त्यान्नपानदानात् तु गोपतिं सम्प्रसादयत्॥ ५१
प्रसादिते गते तस्मिन् गोधर्मं भक्तितस्तु सः।
मनसैव समादध्यौ तन्निष्ठस्तत्परो हि सः॥ ५२
ततो यवीयसः पत्नीं गौतमस्याभ्यपद्यत।
कृतावलेपां तां मत्वा सोऽनड्वानिव न क्षमे॥ ५३
गोधर्मं तु परं मत्वा स्नुषां तामभ्यपद्यत।
निर्भर्त्स्य चैनं रुद्ध्वा च बाहुभ्यां सम्प्रगृह्य च॥ ५४
भाव्यर्थं तु तं ज्ञात्वा माहात्म्यात् तमुवाच सा।
विपर्ययं तु त्वं लब्ध्वा अनड्वानिव वर्तसे॥ ५५
गम्यागम्यं न जानीषे गोधर्मात् प्रार्थयन् सुताम्।
दुर्वृत्तं त्वां त्यजाम्यद्य गच्छ त्वं स्वेन कर्मणा॥ ५६
काष्ठे समुद्रे प्रक्षिप्य गङ्गाम्भसि समुत्सृजत्।
तस्मात् त्वमन्धो वृद्धश्च भर्त्तव्यो दुरधिष्ठितः॥ ५७
तमुह्यमानं वेगेन स्रोतसोऽभ्याशमागतः।
जग्राह तं स धर्मात्मा बलिवैरोचनिस्तदा॥ ५८
अन्तःपुरे जुगोपैनं भक्ष्यभोज्यैश्च तर्पयन्।
प्रीतश्चैवं वरेणैवच्छन्दयामास वै बलिम्॥ ५९
तस्माच्च स वरं वव्रे पुत्रार्थे दानवर्षभः।
संतानार्थं महाभाग भार्यायां मम मानद।
पुत्रान् धर्मार्थतत्त्वज्ञानुत्पादयितुमर्हसि॥ ६०


बलिके क्षेत्रज पुत्र थे। ये सभी पुत्र महर्षि दीर्घतमाद्वारा बलिको प्रदान किये गये थे। तदनन्तर उन्होंने मानव-योनिमें कई संतानें उत्पन्न कीं। एक बार सुरभि (गौ) दीर्घतमाके पास आकर उनसे बोली—'विभो! आपने हम लोगोंके प्रति अनन्यभक्ति होनेके कारण भलीभाँति विचारकर पशु-धर्मको प्रमाणित कर दिया है, इसलिये मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ। अनघ! आपके शरीरमें बृहस्पतिका अंशभूत जो यह पाप स्थित है, उस घोर अन्धकारको सूँघकर मैं आपसे दूर किये देती हूँ। साथ ही आपके शरीरसे बुढ़ापा, मृत्यु और अंधकारको भी सूँघकर हटा दे रही हूँ।' (ऐसा कहकर सुरभिने उनके शरीरको सूँघा।) सुरभिके सूँघते ही वे मुनिश्रेष्ठ दीर्घतमा तुरन्त दीर्घ आयु, सौन्दर्यशाली शरीर और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त हो गये॥ ५१–८३॥

इस प्रकार गौद्वारा अन्धकारके नष्ट कर दिये जानेपर वे गौतम नामसे प्रसिद्ध हुए। तदनन्तर कक्षीवान् अपने पिता गौतमके साथ गिरिव्रजको जाकर उन्हींके साथ निवास करता हुआ चिरकालिक तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह नित्य