मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१७८ * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शिखण्डिने करालाय दंष्ट्रिणे विश्ववेधसे।<br>भास्वराय प्रतीताय सुदीप्ताय सुमेधसे॥ १४२ | अतिशय ज्ञानसम्पन्न, ब्रह्मिष्ठ—वेदोंके पारंगत विद्वान्, महर्षि—वसिष्ठ आदि, चतुष्पाद—विश्व, तैजस, प्राज्ञ और शिव-ध्यानरूप चार पादोंवाले, मेध्य—पवित्रस्वरूप, रक्षी—रक्षक, शीघ्रग—शीघ्रगामी, शिखण्डी—जटाके ऊपर जटाग्र-गुच्छको धारण करनेवाले, कराल—भयानक, दंष्ट्री—दाढ़वाले, विश्ववेधा—विश्वके सृष्टिकर्ता, भास्वर—दीप्तिमान् स्वरूपवाले, प्रतीत—विख्यात, सुदीप्त—परम प्रकाशमान तथा सुमेधा—उत्कृष्ट बुद्धिसम्पन्नको नमस्कार है॥ १३५—१४२॥ |
| कूरायाविकृतायैव भीषणाय शिवाय च।<br>सौम्याय चैव मुख्याय धार्मिकाय शुभाय च॥ १४३<br><br>अवध्यायामृतायैव नित्याय शाश्वताय च।<br>व्यापृताय विशिष्टाय भरताय च साक्षिणे॥ १४४<br><br>क्षेमाय सहमानाय सत्याय चामृताय च।<br>कर्त्रे परशवे चैव शूलिने दिव्यचक्षुषे॥ १४५<br><br>सोमपायाज्यपायैव धूमपायोष्मपाय च।<br>शुचये परिधानाय सद्योजाताय मृत्यवे॥ १४६<br><br>पिशिताशाय शर्वाय मेघाय वैद्युताय च।<br>व्यावृत्ताय वरिष्ठाय भरिताय तरक्षवे॥ १४७<br><br>त्रिपुरघ्नाय तीर्थायावक्राय रोमशाय च।<br>तिग्मायुधाय व्याख्याय सुसिद्धाय पुलस्तये॥ १४८<br><br>रोचमानाय चण्डाय स्फीताय ऋषभाय च।<br>व्रतिने युञ्जमानाय शुचये चोर्ध्वरेतसे॥ १४९<br><br>असुरघ्नाय स्वाघ्नाय मृत्युघ्ने यज्ञियाय च।<br>कृशानवे प्रचेताय वह्नये निर्मलाय च॥ १५० | क्रूर—निर्दयी, अविकृत—सम्पूर्ण विपरीत क्रियाओंसे रहित, भीषण—भयंकर, शिव—धर्मचिन्तारहित, सौम्य—शान्तस्वरूप, मुख्य—सर्वश्रेष्ठ, धार्मिक—धर्मका आचरण करनेवाले, शुभ—मङ्गलस्वरूप, अवध्य—वधके अयोग्य, अमृत—मृत्युरहित, नित्य—अविनाशी, शाश्वत—सनातन स्थायी, व्यापृत—कर्मसचिव, विशिष्ट—सर्वश्रेष्ठ, भरत—लोकोंका भरण-पोषण करनेवाले, साक्षी—जीवोंके शुभाशुभ कर्मोंके साक्षीरूप, क्षेम—मोक्षस्वरूप, सहमान—सहनशील, सत्य—सत्यस्वरूप, अमृत—धन्वन्तरिस्वरूप, कर्ता—सबके उत्पादक, परशु—परशुधारी, शूली—त्रिशूलधारी, दिव्यचक्षु—दिव्य नेत्रोंवाले, सोमप—सोमरसका पान करनेवाले, आज्यप—घृतपायी अथवा एक विशिष्ट पितरस्वरूप, धूमप—धूमपान करनेवाले, ऊष्मप—एक विशिष्ट पितरस्वरूप, ऊष्माको पी जानेवाले, शुचि—सर्वथा शुद्ध, परिधान—ताण्डवके समय साज-सज्जासे विभूषित, सद्योजात—पञ्च मूर्तियोंमेंसे एक मूर्ति, तत्काल प्रकट होनेवाले, मृत्यु—कालस्वरूप, पिशिताश—फलका गूदा खानेवाले, सर्व—विश्वात्मा होनेके कारण सर्वस्वरूप, मेघ—बादलकी भाँति दाता, विद्युत्—बिजलीकी तरह दीप्तिमान्, व्यावृत्त—गजचर्म या व्याघ्रचर्मसे आवृत्त, सबसे अलग मुक्तस्वरूप, वरिष्ठ—सर्वश्रेष्ठ, भरित—परिपूर्ण, तरक्षु—व्याघ्रविशेष, त्रिपुरघ्न—त्रिपुरासुरके वधकर्ता, तीर्थ—महान् गुरुस्वरूप, अवक्र—सौम्य स्वभाववाले, रोमश—लम्बी जटाओंवाले, तिग्मायुध—तीखे हथियारोंवाले, व्याख्या—विशेषरूपसे व्याख्येय या प्रशंसित, सुसिद्ध—परम सिद्धिसम्पन्न, पुलस्ति—पुलस्त्य ऋषिरूप, रोचमान—आनन्दप्रद, चण्ड—अत्यन्त क्रोधी, स्फीत—वृद्धिंगत, ऋषभ—सर्वोत्कृष्ट, व्रती—व्रतपरायण, युञ्मान—सर्वदा कार्यरत, शुचि—निर्मलचित्त, ऊर्ध्वरेता—अखण्डित ब्रह्मचर्यवाले, असुरघ्न—राक्षसोंके विनाशक, स्वाघ्न—निजजनोंके रक्षक, मृत्युघ्न—मृत्यु-संकटको टालनेवाले, यज्ञिय—यज्ञके लिये हितकारी, कृशानु—अपने तेजसे तृण-काष्ठादि वस्तुओंको सूक्ष्म कर देनेवाले, प्रचेता—उत्कृष्ट चेतनावाले, वह्नि—अग्निरूप और निर्मल—जागतिक मलोंसे रहितको नमस्कार है॥ १४३—१५०॥ |