भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४७ *१७७
श्लोकहिन्दी व्याख्या
गिरिशाय नमोऽर्काय बलिने आज्यपाय च।<br>सुतृप्ताय सुवस्त्राय धन्विने भार्गवाय च॥ १३३<br><br>निषङ्गिणे च ताराय स्वक्षाय क्षपणाय च।<br>ताम्राय चैव भीमाय उग्राय च शिवाय च॥ १३४पुरुष—आत्मनिष्ठ, गिरिश—कैलासपर्वतपर शयनकर्ता, अर्क—सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत सूर्य, बली—बलसम्पन्न, आज्यप—घृतपायी, सुतृप्त—परम संतुष्ट, सुवस्त्र—सुन्दर वस्त्र पहननेवाले, धन्वी—धनुर्धर, भार्गव—परशुरामस्वरूप, निषङ्गी—तूणीरधारी, तार—विश्वके रक्षक, स्वक्ष—सुशोभन नेत्रोंसे युक्त, क्षपण—भिक्षुकस्वरूप, ताम्र—अरुण अधरोंवाले, भीम—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, संहारक होनेके कारण भयंकर, उग्र—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, निष्ठुर तथा शिव—कल्याणस्वरूपको नमस्कार है ॥ १२८–१३४ ॥
महादेवाय शर्वाय विश्वरूपशिवाय च।<br>हिरण्याय वरिष्ठाय ज्येष्ठाय मध्यमाय च॥ १३५महादेव—देवताओंके भी पूज्य, शर्व—प्रलयकालमें सबके संहारक, विश्वरूप शिव—विश्वरूप धारण करके जीवोंके कल्याणकर्ता, हिरण्य—सुवर्णकी उत्पत्तिके मूल कारण, वरिष्ठ—सर्वश्रेष्ठ, ज्येष्ठ—आदिदेव, मध्यम—मध्यस्थ,
वास्तोष्पते पिनाकाय मुक्तये केवलाय च।<br>मृगव्याधाय दक्षाय स्थाणवे भीषणाय च॥ १३६वास्तोष्पति—गृहक्षेत्रके पालक, पिनाक—पिनाक नामक धनुषके स्वामी, मुक्ति—मुक्तिदाता, केवल—असाधारण पुरुष, मृगव्याध—मृगरूपधारी यज्ञके लिये व्याधस्वरूप, दक्ष—उत्साही, स्थाणु—गृहके आधारभूत स्तम्भके समान जगत्‌के आधारस्तम्भ, भीषण—अमङ्गल वेषधारी,
बहुनेत्राय धुर्याय त्रिनेत्रायेश्वराय च।<br>कपालिने च वीराय मृत्यवे त्र्यम्बकाय च॥ १३७बहुनेत्र—सर्वद्रष्टा, धुर्य—अग्रगण्य, त्रिनेत्र—सोम-सूर्य-अग्निरूप त्रिनेत्रधारी, ईश्वर—सबके शासक, कपाली—चौथे हाथमें कपालधारी, वीर—शूरवीर, मृत्यु—संहारकर्ता, त्र्यम्बक—त्रिनेत्रधारी, एकादश रुद्रोंमें अन्यतम,
बभ्रुवे च पिशङ्गाय पिङ्गलायारुणाय च।<br>पिनाकिने चेषुमते चित्राय रोहिताय च॥ १३८बभ्रु—विष्णुस्वरूप, पिशङ्ग—भूरे रंगवाले, पिङ्गल—नील-पीतमिश्रित वर्णवाले, अरुण—आदित्यरूप, पिनाकी—पिनाक नामक धनुष या त्रिशूल धारण करनेवाले, इषुमान्—बाणधारी, चित्र—अद्भुत रूपधारी, रोहित—लाल रंगका मृगविशेष,
दुन्दुभ्यायैकपादाय अजाय बुद्धिदाय च।<br>आरण्याय गृहस्थाय यतये ब्रह्मचारिणे॥ १३९दुन्दुभ्य—दुन्दुभिके शब्दोंको सुनकर प्रसन्न होनेवाले, एकपाद—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, एकमात्र शरण लेने योग्य, अज—एकादश रुद्रोंमें एक रुद्र, अजन्मा, बुद्धिद—बुद्धिदाता, आरण्य—अरण्यनिवासी, गृहस्थ—गृहमें निवास करनेवाले, यति—संन्यासी, ब्रह्मचारी—ब्रह्मनिष्ठ,
सांख्याय चैव योगाय व्यापिने दीक्षिताय च।<br>अनाहताय शर्वाय भव्येशाय यमाय च॥ १४०सांख्य—आत्मानात्मविवेकशील, योग—चित्तवृत्तियोंके निरोधस्वरूप अथवा निर्बीज समाधिस्वरूप, व्यापी—सर्वव्यापक, दीक्षित—अष्ट मूर्तियोंमें एक मूर्ति, सोमयागके विशिष्ट यागकर्ता, अनाहत—हृदयस्थित द्वादशदल कमलरूप चक्रके निवासी, शर्व—दारुकावनमें स्थित मुनियोंको मोहित करनेवाले, भव्येश—पार्वतीके प्राणपति, यम—संहारकालमें यमस्वरूप,
रोधसे चेकितानाय ब्रह्मिष्ठाय महर्षये।<br>चतुष्पदाय मेध्याय रक्षिणे शीघ्रगाय च॥ १४१रोधा—समुद्र-तटकी भाँति धर्म-ह्रासके निरोधक, चेकितान—