मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ४७ * | १७१ |
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| रक्षोघ्नाय पशुघ्नायाविघ्नाय श्वसिताय च।<br>विभ्रान्ताय महान्ताय अत्यन्तं दुर्गमाय च॥ १५१<br><br>कृष्णाय च जयन्ताय लोकानामीश्वराय च।<br>अनाश्रिताय वेध्याय समत्वाधिष्ठिताय च॥ १५२<br><br>हिरण्यबाहवे चैव व्यासाय च महाय च।<br>सुकर्मणे प्रसह्याय चेशानाय सुचक्षुषे॥ १५३<br><br>क्षिप्रेषवे सदश्वाय शिवाय मोक्षदाय च।<br>कपिलाय पिशङ्गाय महादेवाय धीमते॥ १५४<br><br>महाकल्पाय दीप्ताय रोदनाय हसाय च।<br>दृढधन्विने कवचिने रथिने च वरूथिने॥ १५५<br><br>भृगुनाथाय शुक्राय गह्वरेष्ठाय वेधसे।<br>अमोघाय प्रशान्ताय सुमेधाय वृषाय च॥ १५६<br><br>नमोऽस्तु तुभ्यं भगवन् विश्वाय कृत्तिवाससे।<br>पशूनां पतये तुभ्यं भूतानां पतये नमः॥ १५७ | रक्षोघ्न—राक्षसोंके संहारकर्ता, पशुघ्न—जीवोंके संहारक, अविघ्न—विघ्नरहित, श्वसित—ताण्डवकालमें ऊँची श्वास लेनेवाले, विभ्रान्त—भ्रान्तिहीन, महान्त—विशाल मर्यादावाले, अत्यन्त दुर्गम—परम दुष्प्राप्य, कृष्ण—सच्चिदानन्दस्वरूप, जयन्त—बारंबार शत्रुओंपर विजय पानेवाले, लोकानामीश्वर—समस्त लोकोंके स्वामी, अनाश्रित—स्वतन्त्र, वेध्य—भक्तोंद्वारा प्राप्त करनेके लिये लक्ष्यस्वरूप, समत्वाधिष्ठित—समतासम्पन्न, हिरण्यबाहु—सुनहरी कान्तिवाली सुन्दर भुजाओंसे सुशोभित, व्यास—सर्वव्यापी, मह—दीप्तिशाली, सुकर्मा—उत्तम कर्मवाले, प्रसह्य—विशेषरूपसे सहन करनेयोग्य, ईशान—नियन्ता, सुचक्षुः—सुशोभन नेत्रोंसे युक्त, क्षिप्रेषु—शीघ्रतापूर्वक बाण चलानेवाले, सदश्व—उच्चैःश्रवा आदि उत्तम अश्वरूप, शिव—निरुपाधि, मोक्षद—मोक्षदाता, कपिल—कपिल वर्ण, पिशङ्ग—कनक-सदृश कान्तिमान्, महादेव—ब्रह्मादि देवताओंके तथा ब्रह्मवादी मुनियोंके देवता, धीमान्—उत्तम बुद्धिसम्पन्न, महाकल्प—महाप्रलयकालमें विशाल शरीर धारण करनेवाले, दीप्त—अत्यन्त तेजस्वी, रोदन—रुलानेवाले, हस—हसनशील, दृढधन्वा—सुदृढ़ धनुषवाले, कवची—कवचधारी, रथी—रथके स्वामी, वरूथी—भूतों एवं पिशाचोंकी सेनावाले, भृगुनाथ—महर्षि भृगुके रक्षक, शुक्र—अग्निस্বরূপ, गह्वरेष्ठ—निकुञ्जप्रिय, वेधा—ब्रह्मस्वरूप, अमोघ—निष्फलतारहित, प्रशान्त—शान्तचित्त, सुमेध—सुन्दर बुद्धिवाले और वृष—धर्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। भगवन्! आप विश्व—विश्वस्वरूप, कृत्तिवासा—गजासुरके चर्मको धारण करनेवाले, पशुपति—पशुओंके स्वामी और भूतपति—भूत-प्रेतोंके अधीश्वर हैं, आपको बारंबार प्रणाम है॥ १५१-१५७॥ |
| प्रणवे ऋग्यजुःसाम्ने स्वाहाय च स्वधाय च।<br>वषट्कारात्मने चैव तुभ्यं मन्त्रात्मने नमः॥ १५८ | आप प्रणव—ॐकारस्वरूप एवं ऋग्यजुःसाम—वेदत्रयीरूप हैं, स्वाहा, स्वधा, वषट्कार—ये तीनों आपके स्वरूप हैं तथा मन्त्रात्मा—मन्त्रोंके आत्मा आप ही हैं, आपको अभिवादन है। |
| त्वष्ट्रे धात्रे तथा कर्त्रे चक्षुःश्रोत्रमयाय च।<br>भूतभव्यभवैशाय तुभ्यं कर्मात्मने नमः॥ १५९ | आप त्वष्टा—प्रजापति विश्वकर्मा, धाता—सबको धारण करनेवाले, कर्ता—कर्मनिष्ठ, चक्षुःश्रोत्रमय—दिव्य नेत्र एवं दिव्य श्रोत्रसे युक्त, भूतभव्यभवैश—भूत, भविष्य और वर्तमानके ज्ञाता और कर्मात्मा—कर्मस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। |
| वसवे चैव साध्याय रुद्रादित्यसुराय च।<br>विश्वाय मारुतायैव तुभ्यं देवात्मने नमः॥ १६० | आप वसु—आठ वसुओंमें एक वसु, साध्य—गणदेवोंकी एक कोटि, रुद्र—दुःखोंके विनाशक, आदित्य—अदितिपुत्र, सुर—देवरूप, विश्व—विश्वेदेवतारूप, मारुत—वायुस्वरूप एवं देवात्मा—देवताओंके आत्मस्वरूप हैं, आपको प्रणाम है। |
| अग्नीषोमविधिज्ञाय पशुमन्त्रौषधाय च।<br>स्वयम्भुवे ह्यजायैव अपूर्वप्रथमाय च। | आप अग्नीषोमविधिज्ञ—अग्नीषोम नामक यज्ञकी विधिके ज्ञाता, पशुमन्त्रौषध—यज्ञमें प्रयुक्त होनेवाले पशु, |