मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १८६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुर्वन् धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्॥ २३५ | और असुरोंका विनाश करनेके लिये भगवान् विष्णु बारंबार अवतीर्ण होते रहे॥ २२५-२३५॥ |
| प्रह्लादस्य निदेशे तु न स्थास्यन्त्यसुराश्च ये।<br>मनुष्यवध्यास्ते सर्वे ब्रह्मेति व्याहरत् प्रभुः॥ २३६<br>धर्मन्नारायणस्यांशः सम्भूतश्चाक्षुषेऽन्तरे।<br>यज्ञं प्रवर्तयामासदेवो वैवस्वतेऽन्तरे॥ २३७<br>प्रादुर्भावे ततस्तस्य ब्रह्मा ह्वासीत् पुरोहितः।<br>युगाख्यायां चतुर्थ्यां तु आपन्नेषु सुरेषु वै॥ २३८<br>सम्भूतस्तु समुद्रान्ते हिरण्यकशिपोर्वधे।<br>द्वितीये नरसिंहाख्ये रुद्रो ह्वासीत् पुरोहितः॥ २३९<br>बलिसंस्थेषु लोकेषु त्रेतायां सप्तमं प्रति।<br>दैत्यैस्त्रैलोक्य आक्रान्ते तृतीयो वामनोऽभवत्॥ २४०<br>एतास्तिस्रः स्मृतास्तस्य दिव्याः सम्भूतयो द्विजाः।<br>मानुषाः सप्त यान्यास्तु शापतस्ता निबोधत॥ २४१<br>त्रेतायुगे तु प्रथमे दत्तात्रेयो बभूव ह।<br>नष्टे धर्मे चतुर्थांशे मार्कण्डेयपुरःसरः॥ २४२<br>पञ्चमः पञ्चदश्यां च त्रेतायां सम्बभूव ह।<br>मान्धाता चक्रवर्ती तु तस्थौतथ्यपुरःसरः॥ २४३<br>एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकृद् विभुः।<br>जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः॥ २४४<br>चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा।<br>सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः॥ २४५<br>अष्टमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पराशरात्।<br>वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः॥ २४६ | पूर्वकालमें सामर्थ्यशाली ब्रह्मा ने प्रसङ्गवश ऐसा कहा था कि जो असुर प्रह्लादकी आज्ञाके वशीभूत नहीं रहेंगे, वे सभी मनुष्योंके हाथों मारे जायँगे। चाक्षुष-मन्वन्तरमें धर्मके अंशसे साक्षात् भगवान् नारायणका अवतार हुआ था। अपने प्रादुर्भावके पश्चात् वैवस्वत-मन्वन्तरमें उन्होंने एक यज्ञानुष्ठान प्रवर्तित किया था; उस यज्ञके पुरोहित ब्रह्मा थे। चौथे तामस-मन्वन्तरमें देवताओंके विपत्तिग्रस्त हो जानेपर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये समुद्रतटपर नृसिंहका अवतार हुआ था। इस द्वितीय नृसिंहावतारमें रुद्र पुरोहित-पदपर आसीन थे। सातवें वैवस्वत-मन्वन्तरके त्रेतायुगमें, जब त्रिलोकीपर बलिक अधिकार था, उस समय तीसरा वामन-अवतार हुआ था। (उस कार्यकालमें धर्म पुरोहितका पद सँभाल रहे थे।) द्विजवरो! भगवान् विष्णुकी ये तीन दिव्य उत्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं। अब अन्य सात सम्भूतियाँ, जो भृगुके शापवश मानव-योनिमें हुई हैं, उन्हें सुनिये। प्रथम त्रेतायुगमें, जब धर्मका चतुर्थांश नष्ट हो गया था, भगवान् मार्कण्डेयको पुरोहित बनाकर दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। पंद्रहवें त्रेतायुगमें चक्रवर्ती मान्धाताके रूपमें पाँचवाँ अवतार हुआ था। उस समय पुरोहितका पद महर्षि तथ्य (उत्तथ्य)-को मिला था। उन्नीसवें त्रेतायुगमें छठा अवतार जमदग्निनन्दन महाबली परशुरामके रूपमें हुआ था, जो सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशके संहारक थे। उस समय महर्षि विश्वामित्र आदि सहायक बने थे। चौबीसवें त्रेतायुगमें सातवें अवतारके रूपमें रावणका वध करनेके लिये भगवान् श्रीराम महाराज दशरथके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उस समय महर्षि वसिष्ठ पुरोहित थे। अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें आठवें अवतारमें भगवान् विष्णु महर्षि पराशरसे वेदव्यासके रूपमें अवतीर्ण हुए। उस समय जातूकर्ण्यने पुरोहित-पदको सुशोभित किया॥ २३६-२४६॥ |
| कर्तुं धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्।<br>बुद्धो नवमको जज्ञे तपसा पुष्करेक्षणः।<br>देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुरःसरः॥ २४७<br>तस्मिन्नेव युगे क्षीणे संध्याशिष्टे भविष्यति।<br>कल्की तु विष्णुयशसः पाराशर्यपुरःसरः।<br>दशमो भाव्यसम्भूतो याज्ञवल्क्यपुरःसरः॥ २४८<br>सर्वांश्च भूतान् स्तिमितान् पाषण्डांश्चैव सर्वशः। | धर्मकी विशेषरूपसे स्थापना और असुरोंका विनाश करनेके निमित्त नवें अवतारमें बुद्ध अवतीर्ण हुए। सुन्दर (सौन्दरानन्दके नायक) उनके सहचर रूपवाले थे। उनके नेत्र कमल-सरीखे थे। उनके पुरोहित महर्षि द्वैपायन थे। इसी युगकी समाप्तिके समय, जब संध्यामात्र अवशिष्ट रह जायगी, विष्णुयशके पुत्ररूपमें कल्कि का अवतार होगा। इसी भावी दसवें अवतारमें पराशर-पुत्र व्यास और याज्ञवल्क्य पुरोहितका कार्यभार सँभालेंगे। उस समय भगवान् कल्कि आयुधधारी सैकड़ों एवं सहस्रों विप्रोंको साथ लेकर चारों |