भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 197

* अध्याय ४७ * | १८७


| प्रगृहीतायुधैर्विप्रैर्वृतः शतसहस्रशः॥ २४९<br>निःशेषः क्षुद्रराज्ञांस्तु तदा स तु करिष्यति।<br>ब्रह्मद्विषः सपत्नांस्तु संहृत्यैव च तद्वपुः॥ २५०<br>अष्टाविंशे स्थितः कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>शूद्रान् संशोध्ययित्वा तु समुद्रान्तं च वै स्वयम्॥ २५१<br>प्रवृत्तचक्रो बलवान् संहारं तु करिष्यति।<br>उत्सादयित्वा वृषलान् प्रायशस्तानधार्मिकान्॥ २५२<br>ततस्तदा स वै कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>प्रजास्तं साधयित्वा तु समृद्धास्तेन वै स्वयम्॥ २५३<br>अकस्मात् कोपितान्योऽन्यं भविष्यन्तीह मोहिताः।<br>क्षपयित्वा तु तेऽन्योऽन्यं भाविनाऽर्थेन चोदिताः॥ २५४<br>ततः काले व्यतीते तु स देवोऽन्तरधीयत।<br>नृपेष्वथ प्रणष्टेषु प्रजानां संग्रहात् तदा॥ २५५<br>रक्षणे विनिवृत्ते तु हत्वा चान्योऽन्यमाहवे।<br>परस्परं निहत्वा तु निराक्रन्दाः सुदुःखिताः॥ २५६<br>पुराणि हित्वा ग्रामांश्च तुल्यत्वे निष्परिग्रहाः।<br>प्रणष्टाश्रमधर्मांश्च नष्टवर्णाश्रमास्तथा॥ २५७<br>अट्टशूला जानपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।<br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति युगक्षये॥ २५८<br>ह्रस्वदेहायुषश्चैव भविष्यन्ति वनौकसः।<br>सरित्पर्वतवासिन्यो मूलपत्रफलाशनाः॥ २५९<br>चीरचर्माजिनधराः संकरं घोरमाश्रिताः।<br>उत्पातदुःखाः स्वल्पार्था बहुबाधाश्च ताः प्रजाः॥ २६०<br>एवं कष्टमनुप्राप्ताः काले संध्यंशके तदा।<br>ततः क्षयं गमिष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु॥ २६१<br>क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतमवर्तत।<br>इत्येतत् कीर्तितं सम्यग् देवासुरविचेष्टितम्॥ २६२<br>यदुवंशप्रसङ्गेन समासाद् वैष्णवं यशः।<br>तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोर्द्रुह्योस्तथा ह्यनोः॥ २६३ | ओरसे धर्मविमुख जीवों, पाखण्डों और शूद्रवंशी राजाओंका सर्वथा विनाश कर डालेंगे; क्योंकि ब्रह्मद्वेषी शत्रुओंका संहार करनेके हेतु ही कल्कि-अवतार होता है। इस अट्ठाईसवें युगमें भगवान् कल्कि सेनासहित सफलमनोरथ हो विराजमान रहेंगे। उस समय वे बलशाली भगवान् उन धर्महीन शूद्रोंका समूल विनाश करके अपने राज्यचक्रका विस्तार करते हुए पापियोंका संहार कर डालेंगे। तदुपरान्त कल्कि अपना कार्य पूरा करके सेनासहित विश्राम-लाभ करेंगे। उस समय सारी प्रजाएँ उनके प्रभावसे समृद्धिशालिनी होकर उनकी सेवामें लग जायेंगी। तत्पश्चात् भावी कार्यसे प्रेरित हुई प्रजाएँ मोहित होकर अकस्मात् एक-दूसरेपर कुपित हो जायेंगी और परस्पर लड़कर एक-दूसरेको मार डालेंगी। उस समय कार्यकाल समाप्त हो जानेपर भगवान् कल्कि भी अन्तर्हित हो जायेंगे॥ २४७—२५४ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार प्रजाओंके संगठनसे राजाओंके नष्ट हो जानेपर जब कोई रक्षक नहीं रह जायगा, तब प्रजाएँ युद्धभूमिमें एक-दूसरेको मार डालेंगी। यों परस्पर मार-पीट कर वे आक्रन्दनरहित एवं अत्यन्त दुःखित हो जायेंगी। फिर तो वे परिवारहीन होकर समानरूपसे ग्रामों एवं नगरोंको छोड़कर वनकी राह लेंगी। उनके वर्ण-धर्म तथा आश्रम-धर्म नष्ट हो जायँगे। कलियुगकी समाप्तिके समय देशवासी अन्न बेचने लगेंगे, चौराहोंपर शिवकी मूर्तियाँ बिकने लगेंगी और स्त्रियाँ अपने शीलका विक्रय करेंगी अर्थात् वेश्या-कर्ममें प्रवृत्त हो जायेंगी। लोगोंके कद छोटे होंगे। उनकी आयु स्वल्प होगी। वे वनमें तथा नदीतट और पर्वतोंपर निवास करेंगे। कन्द-मूल, पत्तियाँ और फल ही उनके भोजन होंगे। वल्कल, पशुचर्म और मृगचर्म ही उनके वस्त्र होंगे। वे सभी भयंकर वर्णसंकरत्वके आश्रित हो जायँगे। तरह-तरहके उपद्रवोंसे दुःखी रहेंगे। उनकी धन-सम्पत्ति घट जायगी और वे अनेकों बाधाओंसे घिरे रहेंगे। इस प्रकार कष्टका अनुभव करती हुई वे सारी प्रजाएँ उस संध्यांशके समय कलियुगके साथ ही नष्ट हो जायेंगी। इस कलियुगके व्यतीत हो जानेपर कृतयुगका प्रारम्भ होगा। इस प्रकार मैंने पूर्णरूपसे देवताओं और असुरोंकी चेष्टाका तथा यदुवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें संक्षेपसे भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण)-के यशका वर्णन कर दिया। अब मैं तुर्वसु, पूरु, द्रुह्यु और अनुके वंशका क्रमशः वर्णन करूँगा॥ २५५—२६३ ॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽसुरशापो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें असुर-शाप-नामक सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४७ ॥