मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१८८ * मत्स्यपुराण *
अड़तालीसवाँ अध्याय
तुर्वसु और द्रुह्युके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग
| सूत उवाच | |
|---|---|
| तुर्वसोस्तु सुतो गर्भो गोभानुस्तस्य चात्मजः।<br>गोभानोस्तु सुतो वीरस्त्रिसारिरपराजितः॥ १<br>करंधमस्तु त्रैसारिर्मरुत्तस्तस्य चात्मजः।<br>दुष्यन्तं पौरवं चापि स वै पुत्रमकल्पयत्॥ २<br>एवं ययातिशापेन जरासंक्रमणे पुरा।<br>तुर्वसोः पौरवं वंशं प्रविवेश पुरा किल॥ ३<br>दुष्यन्तस्य तु दायादो वरूथो नाम पार्थिवः।<br>वरूथात् तु तथाण्डीरः संधानस्तस्य चात्मजः॥ ४<br>पाण्ड्यश्च केरलश्चैव चोलः कर्णस्तथैव च।<br>तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः॥ ५<br>द्रुह्योस्तु तनयौ शूरौ सेतुः केतुस्तथैव च।<br>सेतुपुत्रः शरद्व्वांस्तु गन्धारस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>ख्यायते यस्य नाम्नासौ गान्धारविषयो महान्।<br>आरट्टदेशजास्तस्य तुरगा वाजिनां वराः॥ ७<br>गन्धारपुत्रो धर्मस्तु धृतस्तस्यात्मजोऽभवत्।<br>धृताच्च विदुषो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मजः॥ ८<br>प्रचेतसः पुत्रशतं राजानः सर्व एव ते।<br>म्लेच्छराष्ट्राधिपाः सर्वे ह्युदीचीं दिशमाश्रिताः॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (ययातिके पञ्चम पुत्र) तुर्वसुका पुत्र गर्भ$^१$ और उसका पुत्र गोभानु हुआ। गोभानुका पुत्र अजेय शूरवीर त्रिसारि हुआ। त्रिसारिका$^२$ पुत्र करंधम और उसका पुत्र मरुत्त हुआ। उसने (संतानरहित होनेके कारण) पूरुवंशी दुष्यन्तको अपना पुत्र बनाया। इस प्रकार पूर्वकालमें वृद्धावस्थाके परिवर्तनके समय ययातिद्वारा दिये गये शापके कारण तुर्वसुका वंश पूरुवंशमें प्रविष्ट हो गया था$^३$। दुष्यन्तका पुत्र राजा वरूथ$^४$ था। वरूथसे आण्डीर (भुवमन्यु)-की उत्पत्ति हुई। आण्डीरके संधान, पाण्ड्य, केरल, चोल और कर्ण नामक पाँच पुत्र हुए। उनके समृद्धिशाली देश उन्हींके नामपर पाण्ड्य, चोल और केरल नामसे प्रसिद्ध हुए। (ययातिके चतुर्थ पुत्र) द्रुह्युके सेतु और केतु (अन्यत्र सर्वत्र बभ्रु) नामक दो शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। सेतुका पुत्र शरद्वान् और उसका पुत्र गन्धार हुआ, जिसके नामसे यह विशाल गान्धार जनपद विख्यात है। उस जनपदके आरट्ट$^५$ (पंजाबका पश्चिम भाग) प्रदेशमें उत्पन्न हुए घोड़े अश्वजातिमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। गन्धारका पुत्र धर्म और उसका पुत्र धृत हुआ। धृतसे विदुषका जन्म हुआ और उसका पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेताके सौ पुत्र हुए जो सब-के-सब राजा हुए। वे सभी उत्तर दिशामें स्थित म्लेच्छ-राज्योंके अधीश्वर थे॥ १—९॥ |
| अनोश्चैव सुता वीरास्त्रयः परमधार्मिकाः।<br>सभानरश्चाक्षुषश्च परमेषुस्तथैव च॥ १०<br>सभानरस्य पुत्रस्तु विद्वान् कोलाहलो नृपः।<br>कोलाहलस्य धर्मात्मा संजयो नाम विश्रुतः॥ ११ | (ययातिके तृतीय पुत्र) अनुके सभानर, चाक्षुष और परमेषु नामक तीन शूरवीर एवं परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए। सभानरका पुत्र विद्वान् राजा कोलाहल हुआ। कोलाहलका धर्मात्मा पुत्र संजय नामसे |
१. ऋग्वेदमें यह तुर्वश है और ४।३०।१६ से १०।६२।१० तक निरन्तर अपने सभी उपर्युक्त भाइयोंके साथ वर्णित है। भागवत ९।२३।१६ तथा विष्णुपुराण ४।१६।३ आदिमें तुर्वसके पुत्रका नाम 'वह्नि' और उसके पुत्रका नाम 'गोभानु'की जगह 'भर्ग' बतलाया गया है।
२. अन्यत्र प्रायः सर्वत्र इसका 'त्रिसारि'की जगह 'त्रिभानु' नाम आया है।
३. तुर्वसुके वंशके पौरव वंशमें प्रविष्ट होनेकी कथा सभी पुराणोंमें (विशेषकर वायु० ९९।५, ब्रह्माण्ड० ३।७५।७ तथा विष्णुपुराण ४।१६।६ में बहुत) स्पष्ट रूपसे आयी है।
४. इनके दूसरे नाम वितथ एवं भरद्वाज भी हैं।
५. इस प्रदेशकी महाभारत, कर्णपर्व ४४।३७-३८ (श्लोक) से ४५ (श्लोक ३० तक) अध्यायोंतकमें चर्चा एवं आलोचना है।