भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४८ * १८९

संजयस्याभवत् पुत्रो वीरो नाम पुरंजयः।<br>जनमेजयो महाराजः पुरंजयसुतोऽभवत् ॥ १२<br>जनमेजयस्य राजर्षेर्महाशालोऽभवत् सुतः।<br>आसीदिन्द्रसमो राजा प्रतिष्ठितयशाभवत् ॥ १३<br>महामनाः सुतस्तस्य महाशालस्य धार्मिकः।<br>सप्तद्वीपेश्वरो जज्ञे चक्रवर्ती महामनाः ॥ १४<br>महामनास्तु द्वौ पुत्रौ जनयामास विश्रुतौ।<br>उशीनरं च धर्मज्ञं तितिक्षुं चैव तावुभौ ॥ १५<br>उशीनरस्य पत्न्यस्तु पञ्च राजर्षिसम्भवाः।<br>भृशा कृशा नवा दर्शा या च देवी दृषद्वती ॥ १६<br>उशीनरस्य पुत्रास्तु तासु जाताः कुलोद्वहाः।<br>तपसा ते तु महता जाता वृद्धस्य धार्मिकाः ॥ १७<br>भृशायास्तु नृगः पुत्रो नवाया नव एव च।<br>कृशायास्तु कृशो जज्ञे दर्शायाः सुव्रतोऽभवत्।<br>दृषद्वत्याः सुतश्चापि शिबिरौशीनरो नृपः ॥ १८<br>शिबेस्तु शिबयः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>पृथुदर्भः सुवीरश्च केकयो मद्रकस्तथा ॥ १९<br>तेषां जनपदाः स्फीताः कैकया मद्रकास्तथा।<br>सौवीराश्चैव पौराश्च नृगस्य केकयास्तथा ॥ २०<br>सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा कृशस्य वृषला पुरी।<br>नवस्य नवराष्ट्रं तु तितिक्षोस्तु प्रजां शृणु ॥ २१विख्यात था। संजयका पुरंजय नामक वीरवर पुत्र हुआ। महाराज जनमेजय (प्रथम) पुरंजयके पुत्र हुए। राजर्षि जनमेजयसे महाशाल नामक पुत्र पैदा हुआ जो इन्द्रतुल्य तेजस्वी एवं प्रतिष्ठित कीर्तिवाला राजा हुआ। उन महाशालके महामना नामक पुत्र पैदा हुआ जो परम धर्मात्मा, महान् मनस्वी तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। महामनाने दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों धर्मज्ञ उशीनर और तितिक्षु नामसे विख्यात हुए। उशीनरकी भृशा, कृशा, नवा, दर्शा और देवी दृषद्वती—ये पाँच पत्नियाँ थीं, जो सभी राजर्षियोंकी कन्याएँ थीं। उनके गर्भसे उशीनरके परम धर्मात्मा एवं कुलवर्धक पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी उशीनरकी वृद्धावस्थामें महान् तपके फलस्वरूप पैदा हुए थे। भृशाका पुत्र नृग और नवाका पुत्र नव हुआ। कृशाने कृशको जन्म दिया। दर्शाके सुव्रत नामक पुत्र हुआ। दृषद्वतीके पुत्र उशीनर-नन्दन राजा शिबि हुए। शिबिके पृथुदर्भ, सुवीर, केकय और मद्रक नामक चार विश्वविख्यात पुत्र हुए। ये सभी शिबिगण नामसे भी प्रसिद्ध थे। इनके समृद्धिशाली जनपद केकय (व्यास और शतलजके मध्य पंजाबका पश्चिमोत्तर भाग), मद्रक, सौवीर (सिंधका उत्तरी भाग) और पौर नामसे विख्यात थे। नृगका जनपद केकय और सुव्रतका अम्बष्ठ नामसे प्रसिद्ध था। कृशकी राजधानी वृषलापुरी थी। नव नवराष्ट्रके अधीश्वर थे। अब तितिक्षुकी संततिका वर्णन सुनिये॥ १०—२१॥
तितिक्षुरभवद् राजा पूर्वस्यां दिशि विश्रुतः।<br>वृषद्रथः सुतस्तस्य तस्य सेनोऽभवत् सुतः ॥ २२<br>सेनस्य सुतपा जज्ञे सुतपस्तनयो बलिः।<br>जातो मानुषयोन्या तु क्षीणे वंशे प्रजेच्छया ॥ २३<br>महायोगी तु स बलिर्बद्धो बन्धैर्महात्मना।<br>पुत्रानुत्पादयामास क्षेत्रजान् पञ्च पार्थिवान् ॥ २४<br>अङ्गं स जनयामास वङ्गं सुह्मं तथैव च।<br>पुण्ड्रं कलिङ्गं च तथा बालेयं क्षेत्रमुच्यते।<br>बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकराः प्रभोः ॥ २५<br>बलेश्च ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन धीमतः।<br>महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम् ॥ २६<br>संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैवोत्तमा मतिः।<br>त्रैकाल्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा ॥ २७तितिक्षु पूर्व दिशामें विख्यात राजा हुआ। उसका पुत्र वृषद्रथ और वृषद्रथका पुत्र सेन हुआ। सेनके सुतपा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुतपाका पुत्र बलि हुआ। महायोगी बलि अपने वंशके नष्ट हो जानेपर संतानकी कामनासे मानव-योनिमें उत्पन्न हुआ था। इसे महान् आत्मबलसे सम्पन्न भगवान् विष्णुने वामनरूपसे बन्धनोंद्वारा बाँध लिया था। राजा बलिने पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको जन्म दिया जो सभी आगे चलकर पृथिवीपति हुए। उसने अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामक पुत्रोंको पैदा किया जो बलिके क्षेत्रज पुत्र कहलाते हैं। ये बलिपुत्र ब्राह्मणसे उत्पन्न होनेके कारण ब्राह्मण थे और सामर्थ्यशाली बलिके वंशप्रवर्तक हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माने प्रसन्न होकर बुद्धिमान् बलिको ऐसा वरदान दिया था कि 'तुम महान् योगी होगे। कल्पपर्यन्त परिमाणवाली तुम्हारी आयु होगी। तुम संग्राममें किसीसे पराजित नहीं होगे। धर्मके विषयमें तुम्हारी बुद्धि उत्तम होगी। तुम त्रिकालदर्शी और असुरवंशमें प्रधान