भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ४७ *१८५
ब्रह्मणा प्रतिषिद्धोऽहं भविष्यं जानता विभो ॥ २२३<br>इमौ च शिष्यौ द्वौ मह्यं समावेतौ बृहस्पतेः ।<br>दैवतैः सह संसृष्टान् सर्वान् वो धारयिष्यतः ॥ २२४क्योंकि ब्रह्माजीने मुझे मना कर दिया है। मेरे ये दोनों शिष्य (षण्ड और अमर्क), जो बृहस्पतिके समान प्रभावशाली हैं, देवताओंके साथ ही उत्पन्न हुए तुम सब लोगोंकी रक्षा करेंगे' ॥ २१३—२२४ ॥
इत्युक्ता ह्यसुराः सर्वे काव्येनाक्लिष्टकर्मणा ।<br>हृष्टास्तेन ययुः सार्धं प्रह्लादेन महात्मना ॥ २२५सरलतापूर्वक कार्यको सम्पन्न करनेवाले शुक्राचार्यके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर असुरगण उन महात्मा प्रह्लादके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने वासस्थानको चले गये।
अवश्यं भाव्यमर्थं तु श्रुत्वा शुक्रेण भाषितम् ।<br>सकृदाशंसमानास्तु जयं शुक्रेण भाषितम् ।<br>दंशिताः सायुधाः सर्वे ततो देवान् समाह्वयन् ॥ २२६उस समय उनके मनमें शुक्राचार्यद्वारा कथित यह विचार कि 'अवश्यम्भावी कार्य तो होगा ही' गूँज रहा था। कुछ दिन व्यतीत होनेपर उन्होंने सोचा कि शुक्राचार्यके कथनानुसार एक बार विजय तो होगी ही, अतः सभी असुरोंने विजयकी आशासे अपना-अपना कवच धारण कर लिया और शस्त्रास्त्रसे लैस हो देवताओंके निकट जाकर उन्हें ललकारा।
देवास्तदासुरान् दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान् ।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान् समयोधयन् ॥ २२७<br>देवासुरे तदा तस्मिन् वर्तमाने शतं समाः ।<br>अजयन्नसुरा देवांस्ततो देवा ह्यामन्त्रयन् ॥ २२८देवताओंने जब यह देखा कि असुरगण सेनासहित रणभूमिमें आ डटे हैं, तब देवगण भी संगठित एवं युद्ध-सामग्रीसे सुसज्जित हो असुरोंके साथ युद्ध करने लगे। वह देवासुर-संग्राम सौ वर्षोंतक चलता रहा। उसमें असुरोंने देवताओंको पराजित किया। तब देवताओंने परस्पर मन्त्रणा करके यह निश्चय किया कि
यज्ञेनोपाह्वयामस्तौ ततो जेष्यामहेऽसुरान् ।<br>तदोपामन्त्रयन् देवाः षण्डामकौँ तु तावुभौ ॥ २२९<br>यज्ञे चाहूय तौ प्रोक्तौ त्यजेतामसुरान् द्विजौ ।<br>वयं युवां भजिष्यामः सह जित्वा तु दानवान् ॥ २३०जब हमलोग यज्ञके निमित्तसे उन दोनों (षण्ड और अमर्क)-को अपने यहाँ बुलायेंगे तभी असुरोंपर विजय पा सकेंगे। ऐसा परामर्श करके देवताओंने उन षण्ड और अमर्क—दोनोंको आमन्त्रित किया और अपने यज्ञमें बुलाकर उनसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग असुरोंका पक्ष छोड़ दें। हमलोग आप दोनोंके सहयोगसे दानवोंको पराजित कर आपकी सेवा करेंगे।'
एवं कृताभिसंधी तौ षण्डामकौँ सुरास्तथा ।<br>ततो देवा जयं प्रापुर्दानवाश्च पराजिताः ॥ २३१<br>षण्डामर्कपरित्यक्ता दानवा ह्यबलास्तथा ।<br>एवं दैत्याः पुरा काव्यशापेनाभिहतास्तदा ॥ २३२इस प्रकार जब देवताओंके तथा षण्ड-अमर्क—दोनों दैत्याचार्योंके बीच संधि हो गयी, तब रणभूमिमें देवताओंको विजय प्राप्त हुई और दानवगण पराजित हो गये; क्योंकि षण्ड-अमर्कद्वारा परित्याग कर दिये जानेपर दानववृन्द बलहीन हो गये थे। इस प्रकार पूर्वकालमें शुक्राचार्यद्वारा दिये गये शापके कारण उस समय दैत्यगण मारे गये।
काव्यशापाभिभूतास्ते निराधाराश्च सर्वशः ।<br>निरस्यमाना देवैश्च विविशुस्ते रसातलम् ॥ २३३अवशिष्ट दैत्यगण शुक्राचार्यके शापसे अभिभूत होनेके कारण जब सब ओरसे निराधार हो गये, साथ ही देवताओंने उन्हें खदेड़ना आरम्भ किया, तब वे विवश होकर रसातलमें प्रविष्ट हो गये।
एवं निरुद्यमा देवैः कृताः कृच्छ्रेण दानवाः ।<br>ततः प्रभृति शापेन भृगोर्नैमित्तिकेन तु ॥ २३४<br>जज्ञे पुनः पुनर्विष्णुर्धर्मे प्रशिथिले प्रभुः ।इस प्रकार देवगण दानवोंको बड़ी कठिनाईसे उद्यमहीन अर्थात् युद्धविमुख कर पाये। तभीसे शुक्राचार्यके नैमित्तिक शापके कारण धर्मका विशेषरूपसे ह्रास हो जानेपर धर्मकी पुनः स्थापना