भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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१८४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वय्यदृष्टे वयं तेन देवाचार्येण मोहिताः।<br>भक्तानर्हसि वै ज्ञातुं तपोदीर्घेण चक्षुषा॥ २११<br><br>यदि नस्त्वं न कुरुषे प्रसादं भृगुनन्दन।<br>अपध्यातास्त्वया ह्यद्य प्रविशामो रसातलम्॥ २१२सेवक और भक्त हैं, इसलिये आप हमें अपनाइये। आपके अदृष्ट हो जानेपर देवाचार्य बृहस्पतिने हमलोगोंको मोहमें डाल दिया था। आप अपनी दीर्घकालिक तपस्याद्वारा अर्जित दिव्यदृष्टिद्वारा स्वयं अपने भक्तोंको जान सकते हैं। भृगुनन्दन! यदि आप हमलोगोंपर कृपा नहीं करेंगे और हमलोगोंका अनिष्ट-चिन्तन ही करते रहेंगे तो हमलोग आज ही रसातलमें प्रवेश कर जायेंगे'॥ २०४—२१२॥
ज्ञात्वा काव्यो यथातत्त्वं कारुण्यादनुकम्पया।<br>एवं प्रत्यनुनीतो वै ततः कोपं नियम्य सः।<br>उवाचैतान् न भेतव्यं न गन्तव्यं रसातलम्॥ २१३<br><br>अवश्यं भाविनो ह्यर्थाः प्राप्तव्या मयि जाग्रति।<br>न शक्यमन्यथा कर्तुं दिष्टं हि बलवत्तरम्॥ २१४<br><br>संज्ञा प्रणष्टा या वोऽद्य कामं तां प्रतिपत्स्यथ।<br>देवाञ्जित्वा सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ २१५<br><br>प्राप्ते पर्यायकाले च हीति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>मत्प्रसादाच्च त्रैलोक्यं भुक्तं युष्माभिरूर्जितम्॥ २१६<br><br>युगाख्या दश सम्पूर्णा देवानाक्रम्य मूर्धनि।<br>एतावन्तं च कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत॥ २१७<br><br>राज्यं सावर्णिके तुभ्यं पुनः किल भविष्यति।<br>लोकानामीश्वरो भाव्यस्तव पौत्रः पुनर्बलिः॥ २१८<br><br>एवं किल मिथः प्रोक्तः पौत्रस्ते विष्णुना स्वयम्।<br>वाचा हृतेषु लोकेषु तास्तास्तस्याभवन् किल॥ २१९<br><br>यस्मात् प्रवृत्तयश्चास्य सकाशादभिसंधिताः।<br>तस्माद् वृत्तेन प्रीतेन तुभ्यं दत्तं स्वयम्भुवा॥ २२०<br><br>देवराज्ये बलिर्भाव्य इति मामीश्वरोऽब्रवीत्।<br>तस्माददृश्यो भूतानां कालापेक्षः स तिष्ठति॥ २२१<br><br>प्रीतेन चापरो दत्तो वरस्तुभ्यं स्वयम्भुवा।<br>तस्मान्निरुत्सुकस्त्वं वै पर्यायं सहितोऽसुरैः॥ २२२<br><br>न हि शक्यं मया तुभ्यं पुरस्ताद् विप्रभाषितुम्।इस प्रकार अनुनय-विनय किये जानेपर शुक्राचार्यने दिव्यदृष्टिद्वारा यथार्थ तत्त्वको समझ लिया, तब उनके हृदयमें करुणा एवं अनुकम्पा उमड़ आयी और वे उमड़े हुए क्रोधको रोककर उन असुरोंसे इस प्रकार बोले—'प्रह्लाद! न तो तुमलोग डरो और न रसातलको ही जाओ। यों तो जो अवश्यम्भावी इष्ट-अनिष्ट कार्य हैं, वे तो मेरे जागरूक रहनेपर भी तुमलोगोंको प्राप्त होंगे ही, उन्हें अन्यथा नहीं किया जा सकता; क्योंकि दैवका विधान सबसे बलवान् होता है। मेरे शापानुसार तुमलोगोंकी जो चेतना नष्ट हो गयी है, उसे तो तुमलोग आज ही प्राप्त कर लोगे। साथ ही विपरीत समय आनेपर तुमलोगोंको देवताओंपर विजय पा लेनेपर भी एक बार पातालमें जाना पड़ेगा; क्योंकि ब्रह्माने पहले ही ऐसा बतलाया है। मेरी ही कृपासे तुमलोगोंने देवताओंके मस्तकपर पैर रखकर समूचे दस युगपर्यन्त त्रिलोकीके ऊर्जस्वी राज्यका उपभोग किया है। इतने ही दिनोंतक ब्रह्माने तुमलोगोंका राज्यकाल बतलाया था। सावणि-मन्वन्तरमें पुनः तुमलोगोंका राज्य होगा। उस समय तुम्हारा पौत्र बलि त्रिलोकीका अधीश्वर होगा। ऐसा स्वयं भगवान् विष्णुने वाणीद्वारा त्रिलोकीके अपहरण कर लेनेपर तुम्हारे पौत्रसे परस्पर वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा था। वे सारी बातें अब उसके लिये घटित होंगी। चूँकि इसकी प्रवृत्तियाँ दस वर्षोंतक उत्तम बनी रहीं, इसलिये इसके व्यवहारसे प्रसन्न होकर स्वयम्भूने तुम्हें यह राज्य प्रदान किया है। देवराज्यपर बलि अधिष्ठित होगा—ऐसा मुझसे भगवान् शंकरने भी कहा था। इसी कारण वह कालकी प्रतीक्षा करता हुआ जीवोंके नेत्रोंके अगोचर होकर अवस्थित है। उस समय प्रसन्न हुए स्वयम्भूने तुम्हें एक दूसरा वरदान भी दिया था, इसलिये तुम असुरोंसहित निरुत्सुक रहकर कालकी प्रतीक्षा करो। विभो! यद्यपि मैं भविष्यकी सारी बातें जानता हूँ, तथापि मैं पहले ही तुमसे उन घटनाओंका वर्णन नहीं कर सकता;