मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८४ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्वय्यदृष्टे वयं तेन देवाचार्येण मोहिताः।<br>भक्तानर्हसि वै ज्ञातुं तपोदीर्घेण चक्षुषा॥ २११<br><br>यदि नस्त्वं न कुरुषे प्रसादं भृगुनन्दन।<br>अपध्यातास्त्वया ह्यद्य प्रविशामो रसातलम्॥ २१२ | सेवक और भक्त हैं, इसलिये आप हमें अपनाइये। आपके अदृष्ट हो जानेपर देवाचार्य बृहस्पतिने हमलोगोंको मोहमें डाल दिया था। आप अपनी दीर्घकालिक तपस्याद्वारा अर्जित दिव्यदृष्टिद्वारा स्वयं अपने भक्तोंको जान सकते हैं। भृगुनन्दन! यदि आप हमलोगोंपर कृपा नहीं करेंगे और हमलोगोंका अनिष्ट-चिन्तन ही करते रहेंगे तो हमलोग आज ही रसातलमें प्रवेश कर जायेंगे'॥ २०४—२१२॥ |
| ज्ञात्वा काव्यो यथातत्त्वं कारुण्यादनुकम्पया।<br>एवं प्रत्यनुनीतो वै ततः कोपं नियम्य सः।<br>उवाचैतान् न भेतव्यं न गन्तव्यं रसातलम्॥ २१३<br><br>अवश्यं भाविनो ह्यर्थाः प्राप्तव्या मयि जाग्रति।<br>न शक्यमन्यथा कर्तुं दिष्टं हि बलवत्तरम्॥ २१४<br><br>संज्ञा प्रणष्टा या वोऽद्य कामं तां प्रतिपत्स्यथ।<br>देवाञ्जित्वा सकृच्चापि पातालं प्रतिपत्स्यथ॥ २१५<br><br>प्राप्ते पर्यायकाले च हीति ब्रह्माभ्यभाषत।<br>मत्प्रसादाच्च त्रैलोक्यं भुक्तं युष्माभिरूर्जितम्॥ २१६<br><br>युगाख्या दश सम्पूर्णा देवानाक्रम्य मूर्धनि।<br>एतावन्तं च कालं वै ब्रह्मा राज्यमभाषत॥ २१७<br><br>राज्यं सावर्णिके तुभ्यं पुनः किल भविष्यति।<br>लोकानामीश्वरो भाव्यस्तव पौत्रः पुनर्बलिः॥ २१८<br><br>एवं किल मिथः प्रोक्तः पौत्रस्ते विष्णुना स्वयम्।<br>वाचा हृतेषु लोकेषु तास्तास्तस्याभवन् किल॥ २१९<br><br>यस्मात् प्रवृत्तयश्चास्य सकाशादभिसंधिताः।<br>तस्माद् वृत्तेन प्रीतेन तुभ्यं दत्तं स्वयम्भुवा॥ २२०<br><br>देवराज्ये बलिर्भाव्य इति मामीश्वरोऽब्रवीत्।<br>तस्माददृश्यो भूतानां कालापेक्षः स तिष्ठति॥ २२१<br><br>प्रीतेन चापरो दत्तो वरस्तुभ्यं स्वयम्भुवा।<br>तस्मान्निरुत्सुकस्त्वं वै पर्यायं सहितोऽसुरैः॥ २२२<br><br>न हि शक्यं मया तुभ्यं पुरस्ताद् विप्रभाषितुम्। | इस प्रकार अनुनय-विनय किये जानेपर शुक्राचार्यने दिव्यदृष्टिद्वारा यथार्थ तत्त्वको समझ लिया, तब उनके हृदयमें करुणा एवं अनुकम्पा उमड़ आयी और वे उमड़े हुए क्रोधको रोककर उन असुरोंसे इस प्रकार बोले—'प्रह्लाद! न तो तुमलोग डरो और न रसातलको ही जाओ। यों तो जो अवश्यम्भावी इष्ट-अनिष्ट कार्य हैं, वे तो मेरे जागरूक रहनेपर भी तुमलोगोंको प्राप्त होंगे ही, उन्हें अन्यथा नहीं किया जा सकता; क्योंकि दैवका विधान सबसे बलवान् होता है। मेरे शापानुसार तुमलोगोंकी जो चेतना नष्ट हो गयी है, उसे तो तुमलोग आज ही प्राप्त कर लोगे। साथ ही विपरीत समय आनेपर तुमलोगोंको देवताओंपर विजय पा लेनेपर भी एक बार पातालमें जाना पड़ेगा; क्योंकि ब्रह्माने पहले ही ऐसा बतलाया है। मेरी ही कृपासे तुमलोगोंने देवताओंके मस्तकपर पैर रखकर समूचे दस युगपर्यन्त त्रिलोकीके ऊर्जस्वी राज्यका उपभोग किया है। इतने ही दिनोंतक ब्रह्माने तुमलोगोंका राज्यकाल बतलाया था। सावणि-मन्वन्तरमें पुनः तुमलोगोंका राज्य होगा। उस समय तुम्हारा पौत्र बलि त्रिलोकीका अधीश्वर होगा। ऐसा स्वयं भगवान् विष्णुने वाणीद्वारा त्रिलोकीके अपहरण कर लेनेपर तुम्हारे पौत्रसे परस्पर वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा था। वे सारी बातें अब उसके लिये घटित होंगी। चूँकि इसकी प्रवृत्तियाँ दस वर्षोंतक उत्तम बनी रहीं, इसलिये इसके व्यवहारसे प्रसन्न होकर स्वयम्भूने तुम्हें यह राज्य प्रदान किया है। देवराज्यपर बलि अधिष्ठित होगा—ऐसा मुझसे भगवान् शंकरने भी कहा था। इसी कारण वह कालकी प्रतीक्षा करता हुआ जीवोंके नेत्रोंके अगोचर होकर अवस्थित है। उस समय प्रसन्न हुए स्वयम्भूने तुम्हें एक दूसरा वरदान भी दिया था, इसलिये तुम असुरोंसहित निरुत्सुक रहकर कालकी प्रतीक्षा करो। विभो! यद्यपि मैं भविष्यकी सारी बातें जानता हूँ, तथापि मैं पहले ही तुमसे उन घटनाओंका वर्णन नहीं कर सकता; |
| * अध्याय ४७ * | १८५ |
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| ब्रह्मणा प्रतिषिद्धोऽहं भविष्यं जानता विभो ॥ २२३<br>इमौ च शिष्यौ द्वौ मह्यं समावेतौ बृहस्पतेः ।<br>दैवतैः सह संसृष्टान् सर्वान् वो धारयिष्यतः ॥ २२४ | क्योंकि ब्रह्माजीने मुझे मना कर दिया है। मेरे ये दोनों शिष्य (षण्ड और अमर्क), जो बृहस्पतिके समान प्रभावशाली हैं, देवताओंके साथ ही उत्पन्न हुए तुम सब लोगोंकी रक्षा करेंगे' ॥ २१३—२२४ ॥ |
| इत्युक्ता ह्यसुराः सर्वे काव्येनाक्लिष्टकर्मणा ।<br>हृष्टास्तेन ययुः सार्धं प्रह्लादेन महात्मना ॥ २२५ | सरलतापूर्वक कार्यको सम्पन्न करनेवाले शुक्राचार्यके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर असुरगण उन महात्मा प्रह्लादके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने वासस्थानको चले गये। |
| अवश्यं भाव्यमर्थं तु श्रुत्वा शुक्रेण भाषितम् ।<br>सकृदाशंसमानास्तु जयं शुक्रेण भाषितम् ।<br>दंशिताः सायुधाः सर्वे ततो देवान् समाह्वयन् ॥ २२६ | उस समय उनके मनमें शुक्राचार्यद्वारा कथित यह विचार कि 'अवश्यम्भावी कार्य तो होगा ही' गूँज रहा था। कुछ दिन व्यतीत होनेपर उन्होंने सोचा कि शुक्राचार्यके कथनानुसार एक बार विजय तो होगी ही, अतः सभी असुरोंने विजयकी आशासे अपना-अपना कवच धारण कर लिया और शस्त्रास्त्रसे लैस हो देवताओंके निकट जाकर उन्हें ललकारा। |
| देवास्तदासुरान् दृष्ट्वा संग्रामे समुपस्थितान् ।<br>सर्वे सम्भृतसम्भारा देवास्तान् समयोधयन् ॥ २२७<br>देवासुरे तदा तस्मिन् वर्तमाने शतं समाः ।<br>अजयन्नसुरा देवांस्ततो देवा ह्यामन्त्रयन् ॥ २२८ | देवताओंने जब यह देखा कि असुरगण सेनासहित रणभूमिमें आ डटे हैं, तब देवगण भी संगठित एवं युद्ध-सामग्रीसे सुसज्जित हो असुरोंके साथ युद्ध करने लगे। वह देवासुर-संग्राम सौ वर्षोंतक चलता रहा। उसमें असुरोंने देवताओंको पराजित किया। तब देवताओंने परस्पर मन्त्रणा करके यह निश्चय किया कि |
| यज्ञेनोपाह्वयामस्तौ ततो जेष्यामहेऽसुरान् ।<br>तदोपामन्त्रयन् देवाः षण्डामकौँ तु तावुभौ ॥ २२९<br>यज्ञे चाहूय तौ प्रोक्तौ त्यजेतामसुरान् द्विजौ ।<br>वयं युवां भजिष्यामः सह जित्वा तु दानवान् ॥ २३० | जब हमलोग यज्ञके निमित्तसे उन दोनों (षण्ड और अमर्क)-को अपने यहाँ बुलायेंगे तभी असुरोंपर विजय पा सकेंगे। ऐसा परामर्श करके देवताओंने उन षण्ड और अमर्क—दोनोंको आमन्त्रित किया और अपने यज्ञमें बुलाकर उनसे कहा—'द्विजवरो! आपलोग असुरोंका पक्ष छोड़ दें। हमलोग आप दोनोंके सहयोगसे दानवोंको पराजित कर आपकी सेवा करेंगे।' |
| एवं कृताभिसंधी तौ षण्डामकौँ सुरास्तथा ।<br>ततो देवा जयं प्रापुर्दानवाश्च पराजिताः ॥ २३१<br>षण्डामर्कपरित्यक्ता दानवा ह्यबलास्तथा ।<br>एवं दैत्याः पुरा काव्यशापेनाभिहतास्तदा ॥ २३२ | इस प्रकार जब देवताओंके तथा षण्ड-अमर्क—दोनों दैत्याचार्योंके बीच संधि हो गयी, तब रणभूमिमें देवताओंको विजय प्राप्त हुई और दानवगण पराजित हो गये; क्योंकि षण्ड-अमर्कद्वारा परित्याग कर दिये जानेपर दानववृन्द बलहीन हो गये थे। इस प्रकार पूर्वकालमें शुक्राचार्यद्वारा दिये गये शापके कारण उस समय दैत्यगण मारे गये। |
| काव्यशापाभिभूतास्ते निराधाराश्च सर्वशः ।<br>निरस्यमाना देवैश्च विविशुस्ते रसातलम् ॥ २३३ | अवशिष्ट दैत्यगण शुक्राचार्यके शापसे अभिभूत होनेके कारण जब सब ओरसे निराधार हो गये, साथ ही देवताओंने उन्हें खदेड़ना आरम्भ किया, तब वे विवश होकर रसातलमें प्रविष्ट हो गये। |
| एवं निरुद्यमा देवैः कृताः कृच्छ्रेण दानवाः ।<br>ततः प्रभृति शापेन भृगोर्नैमित्तिकेन तु ॥ २३४<br>जज्ञे पुनः पुनर्विष्णुर्धर्मे प्रशिथिले प्रभुः । | इस प्रकार देवगण दानवोंको बड़ी कठिनाईसे उद्यमहीन अर्थात् युद्धविमुख कर पाये। तभीसे शुक्राचार्यके नैमित्तिक शापके कारण धर्मका विशेषरूपसे ह्रास हो जानेपर धर्मकी पुनः स्थापना |
| १८६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| कुर्वन् धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्॥ २३५ | और असुरोंका विनाश करनेके लिये भगवान् विष्णु बारंबार अवतीर्ण होते रहे॥ २२५-२३५॥ |
| प्रह्लादस्य निदेशे तु न स्थास्यन्त्यसुराश्च ये।<br>मनुष्यवध्यास्ते सर्वे ब्रह्मेति व्याहरत् प्रभुः॥ २३६<br>धर्मन्नारायणस्यांशः सम्भूतश्चाक्षुषेऽन्तरे।<br>यज्ञं प्रवर्तयामासदेवो वैवस्वतेऽन्तरे॥ २३७<br>प्रादुर्भावे ततस्तस्य ब्रह्मा ह्वासीत् पुरोहितः।<br>युगाख्यायां चतुर्थ्यां तु आपन्नेषु सुरेषु वै॥ २३८<br>सम्भूतस्तु समुद्रान्ते हिरण्यकशिपोर्वधे।<br>द्वितीये नरसिंहाख्ये रुद्रो ह्वासीत् पुरोहितः॥ २३९<br>बलिसंस्थेषु लोकेषु त्रेतायां सप्तमं प्रति।<br>दैत्यैस्त्रैलोक्य आक्रान्ते तृतीयो वामनोऽभवत्॥ २४०<br>एतास्तिस्रः स्मृतास्तस्य दिव्याः सम्भूतयो द्विजाः।<br>मानुषाः सप्त यान्यास्तु शापतस्ता निबोधत॥ २४१<br>त्रेतायुगे तु प्रथमे दत्तात्रेयो बभूव ह।<br>नष्टे धर्मे चतुर्थांशे मार्कण्डेयपुरःसरः॥ २४२<br>पञ्चमः पञ्चदश्यां च त्रेतायां सम्बभूव ह।<br>मान्धाता चक्रवर्ती तु तस्थौतथ्यपुरःसरः॥ २४३<br>एकोनविंश्यां त्रेतायां सर्वक्षत्रान्तकृद् विभुः।<br>जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः॥ २४४<br>चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा।<br>सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः॥ २४५<br>अष्टमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पराशरात्।<br>वेदव्यासस्तथा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः॥ २४६ | पूर्वकालमें सामर्थ्यशाली ब्रह्मा ने प्रसङ्गवश ऐसा कहा था कि जो असुर प्रह्लादकी आज्ञाके वशीभूत नहीं रहेंगे, वे सभी मनुष्योंके हाथों मारे जायँगे। चाक्षुष-मन्वन्तरमें धर्मके अंशसे साक्षात् भगवान् नारायणका अवतार हुआ था। अपने प्रादुर्भावके पश्चात् वैवस्वत-मन्वन्तरमें उन्होंने एक यज्ञानुष्ठान प्रवर्तित किया था; उस यज्ञके पुरोहित ब्रह्मा थे। चौथे तामस-मन्वन्तरमें देवताओंके विपत्तिग्रस्त हो जानेपर हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये समुद्रतटपर नृसिंहका अवतार हुआ था। इस द्वितीय नृसिंहावतारमें रुद्र पुरोहित-पदपर आसीन थे। सातवें वैवस्वत-मन्वन्तरके त्रेतायुगमें, जब त्रिलोकीपर बलिक अधिकार था, उस समय तीसरा वामन-अवतार हुआ था। (उस कार्यकालमें धर्म पुरोहितका पद सँभाल रहे थे।) द्विजवरो! भगवान् विष्णुकी ये तीन दिव्य उत्पत्तियाँ बतलायी गयी हैं। अब अन्य सात सम्भूतियाँ, जो भृगुके शापवश मानव-योनिमें हुई हैं, उन्हें सुनिये। प्रथम त्रेतायुगमें, जब धर्मका चतुर्थांश नष्ट हो गया था, भगवान् मार्कण्डेयको पुरोहित बनाकर दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। पंद्रहवें त्रेतायुगमें चक्रवर्ती मान्धाताके रूपमें पाँचवाँ अवतार हुआ था। उस समय पुरोहितका पद महर्षि तथ्य (उत्तथ्य)-को मिला था। उन्नीसवें त्रेतायुगमें छठा अवतार जमदग्निनन्दन महाबली परशुरामके रूपमें हुआ था, जो सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशके संहारक थे। उस समय महर्षि विश्वामित्र आदि सहायक बने थे। चौबीसवें त्रेतायुगमें सातवें अवतारके रूपमें रावणका वध करनेके लिये भगवान् श्रीराम महाराज दशरथके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे। उस समय महर्षि वसिष्ठ पुरोहित थे। अट्ठाईसवें द्वापरयुगमें आठवें अवतारमें भगवान् विष्णु महर्षि पराशरसे वेदव्यासके रूपमें अवतीर्ण हुए। उस समय जातूकर्ण्यने पुरोहित-पदको सुशोभित किया॥ २३६-२४६॥ |
| कर्तुं धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनम्।<br>बुद्धो नवमको जज्ञे तपसा पुष्करेक्षणः।<br>देवसुन्दररूपेण द्वैपायनपुरःसरः॥ २४७<br>तस्मिन्नेव युगे क्षीणे संध्याशिष्टे भविष्यति।<br>कल्की तु विष्णुयशसः पाराशर्यपुरःसरः।<br>दशमो भाव्यसम्भूतो याज्ञवल्क्यपुरःसरः॥ २४८<br>सर्वांश्च भूतान् स्तिमितान् पाषण्डांश्चैव सर्वशः। | धर्मकी विशेषरूपसे स्थापना और असुरोंका विनाश करनेके निमित्त नवें अवतारमें बुद्ध अवतीर्ण हुए। सुन्दर (सौन्दरानन्दके नायक) उनके सहचर रूपवाले थे। उनके नेत्र कमल-सरीखे थे। उनके पुरोहित महर्षि द्वैपायन थे। इसी युगकी समाप्तिके समय, जब संध्यामात्र अवशिष्ट रह जायगी, विष्णुयशके पुत्ररूपमें कल्कि का अवतार होगा। इसी भावी दसवें अवतारमें पराशर-पुत्र व्यास और याज्ञवल्क्य पुरोहितका कार्यभार सँभालेंगे। उस समय भगवान् कल्कि आयुधधारी सैकड़ों एवं सहस्रों विप्रोंको साथ लेकर चारों |
४९ पूरु-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास
* अध्याय ४७ * | १८७
| प्रगृहीतायुधैर्विप्रैर्वृतः शतसहस्रशः॥ २४९<br>निःशेषः क्षुद्रराज्ञांस्तु तदा स तु करिष्यति।<br>ब्रह्मद्विषः सपत्नांस्तु संहृत्यैव च तद्वपुः॥ २५०<br>अष्टाविंशे स्थितः कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>शूद्रान् संशोध्ययित्वा तु समुद्रान्तं च वै स्वयम्॥ २५१<br>प्रवृत्तचक्रो बलवान् संहारं तु करिष्यति।<br>उत्सादयित्वा वृषलान् प्रायशस्तानधार्मिकान्॥ २५२<br>ततस्तदा स वै कल्किश्चरितार्थः ससैनिकः।<br>प्रजास्तं साधयित्वा तु समृद्धास्तेन वै स्वयम्॥ २५३<br>अकस्मात् कोपितान्योऽन्यं भविष्यन्तीह मोहिताः।<br>क्षपयित्वा तु तेऽन्योऽन्यं भाविनाऽर्थेन चोदिताः॥ २५४<br>ततः काले व्यतीते तु स देवोऽन्तरधीयत।<br>नृपेष्वथ प्रणष्टेषु प्रजानां संग्रहात् तदा॥ २५५<br>रक्षणे विनिवृत्ते तु हत्वा चान्योऽन्यमाहवे।<br>परस्परं निहत्वा तु निराक्रन्दाः सुदुःखिताः॥ २५६<br>पुराणि हित्वा ग्रामांश्च तुल्यत्वे निष्परिग्रहाः।<br>प्रणष्टाश्रमधर्मांश्च नष्टवर्णाश्रमास्तथा॥ २५७<br>अट्टशूला जानपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः।<br>प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति युगक्षये॥ २५८<br>ह्रस्वदेहायुषश्चैव भविष्यन्ति वनौकसः।<br>सरित्पर्वतवासिन्यो मूलपत्रफलाशनाः॥ २५९<br>चीरचर्माजिनधराः संकरं घोरमाश्रिताः।<br>उत्पातदुःखाः स्वल्पार्था बहुबाधाश्च ताः प्रजाः॥ २६०<br>एवं कष्टमनुप्राप्ताः काले संध्यंशके तदा।<br>ततः क्षयं गमिष्यन्ति सार्धं कलियुगेन तु॥ २६१<br>क्षीणे कलियुगे तस्मिंस्ततः कृतमवर्तत।<br>इत्येतत् कीर्तितं सम्यग् देवासुरविचेष्टितम्॥ २६२<br>यदुवंशप्रसङ्गेन समासाद् वैष्णवं यशः।<br>तुर्वसोस्तु प्रवक्ष्यामि पूरोर्द्रुह्योस्तथा ह्यनोः॥ २६३ | ओरसे धर्मविमुख जीवों, पाखण्डों और शूद्रवंशी राजाओंका सर्वथा विनाश कर डालेंगे; क्योंकि ब्रह्मद्वेषी शत्रुओंका संहार करनेके हेतु ही कल्कि-अवतार होता है। इस अट्ठाईसवें युगमें भगवान् कल्कि सेनासहित सफलमनोरथ हो विराजमान रहेंगे। उस समय वे बलशाली भगवान् उन धर्महीन शूद्रोंका समूल विनाश करके अपने राज्यचक्रका विस्तार करते हुए पापियोंका संहार कर डालेंगे। तदुपरान्त कल्कि अपना कार्य पूरा करके सेनासहित विश्राम-लाभ करेंगे। उस समय सारी प्रजाएँ उनके प्रभावसे समृद्धिशालिनी होकर उनकी सेवामें लग जायेंगी। तत्पश्चात् भावी कार्यसे प्रेरित हुई प्रजाएँ मोहित होकर अकस्मात् एक-दूसरेपर कुपित हो जायेंगी और परस्पर लड़कर एक-दूसरेको मार डालेंगी। उस समय कार्यकाल समाप्त हो जानेपर भगवान् कल्कि भी अन्तर्हित हो जायेंगे॥ २४७—२५४ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार प्रजाओंके संगठनसे राजाओंके नष्ट हो जानेपर जब कोई रक्षक नहीं रह जायगा, तब प्रजाएँ युद्धभूमिमें एक-दूसरेको मार डालेंगी। यों परस्पर मार-पीट कर वे आक्रन्दनरहित एवं अत्यन्त दुःखित हो जायेंगी। फिर तो वे परिवारहीन होकर समानरूपसे ग्रामों एवं नगरोंको छोड़कर वनकी राह लेंगी। उनके वर्ण-धर्म तथा आश्रम-धर्म नष्ट हो जायँगे। कलियुगकी समाप्तिके समय देशवासी अन्न बेचने लगेंगे, चौराहोंपर शिवकी मूर्तियाँ बिकने लगेंगी और स्त्रियाँ अपने शीलका विक्रय करेंगी अर्थात् वेश्या-कर्ममें प्रवृत्त हो जायेंगी। लोगोंके कद छोटे होंगे। उनकी आयु स्वल्प होगी। वे वनमें तथा नदीतट और पर्वतोंपर निवास करेंगे। कन्द-मूल, पत्तियाँ और फल ही उनके भोजन होंगे। वल्कल, पशुचर्म और मृगचर्म ही उनके वस्त्र होंगे। वे सभी भयंकर वर्णसंकरत्वके आश्रित हो जायँगे। तरह-तरहके उपद्रवोंसे दुःखी रहेंगे। उनकी धन-सम्पत्ति घट जायगी और वे अनेकों बाधाओंसे घिरे रहेंगे। इस प्रकार कष्टका अनुभव करती हुई वे सारी प्रजाएँ उस संध्यांशके समय कलियुगके साथ ही नष्ट हो जायेंगी। इस कलियुगके व्यतीत हो जानेपर कृतयुगका प्रारम्भ होगा। इस प्रकार मैंने पूर्णरूपसे देवताओं और असुरोंकी चेष्टाका तथा यदुवंशके वर्णन-प्रसङ्गमें संक्षेपसे भगवान् विष्णु (श्रीकृष्ण)-के यशका वर्णन कर दिया। अब मैं तुर्वसु, पूरु, द्रुह्यु और अनुके वंशका क्रमशः वर्णन करूँगा॥ २५५—२६३ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽसुरशापो नाम सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें असुर-शाप-नामक सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४७ ॥
१८८ * मत्स्यपुराण *
अड़तालीसवाँ अध्याय
तुर्वसु और द्रुह्युके वंशका वर्णन, अनुके वंश-वर्णनमें बलिकी कथा और कर्णकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग
| सूत उवाच | |
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| तुर्वसोस्तु सुतो गर्भो गोभानुस्तस्य चात्मजः।<br>गोभानोस्तु सुतो वीरस्त्रिसारिरपराजितः॥ १<br>करंधमस्तु त्रैसारिर्मरुत्तस्तस्य चात्मजः।<br>दुष्यन्तं पौरवं चापि स वै पुत्रमकल्पयत्॥ २<br>एवं ययातिशापेन जरासंक्रमणे पुरा।<br>तुर्वसोः पौरवं वंशं प्रविवेश पुरा किल॥ ३<br>दुष्यन्तस्य तु दायादो वरूथो नाम पार्थिवः।<br>वरूथात् तु तथाण्डीरः संधानस्तस्य चात्मजः॥ ४<br>पाण्ड्यश्च केरलश्चैव चोलः कर्णस्तथैव च।<br>तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः॥ ५<br>द्रुह्योस्तु तनयौ शूरौ सेतुः केतुस्तथैव च।<br>सेतुपुत्रः शरद्व्वांस्तु गन्धारस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>ख्यायते यस्य नाम्नासौ गान्धारविषयो महान्।<br>आरट्टदेशजास्तस्य तुरगा वाजिनां वराः॥ ७<br>गन्धारपुत्रो धर्मस्तु धृतस्तस्यात्मजोऽभवत्।<br>धृताच्च विदुषो जज्ञे प्रचेतास्तस्य चात्मजः॥ ८<br>प्रचेतसः पुत्रशतं राजानः सर्व एव ते।<br>म्लेच्छराष्ट्राधिपाः सर्वे ह्युदीचीं दिशमाश्रिताः॥ ९ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! (ययातिके पञ्चम पुत्र) तुर्वसुका पुत्र गर्भ$^१$ और उसका पुत्र गोभानु हुआ। गोभानुका पुत्र अजेय शूरवीर त्रिसारि हुआ। त्रिसारिका$^२$ पुत्र करंधम और उसका पुत्र मरुत्त हुआ। उसने (संतानरहित होनेके कारण) पूरुवंशी दुष्यन्तको अपना पुत्र बनाया। इस प्रकार पूर्वकालमें वृद्धावस्थाके परिवर्तनके समय ययातिद्वारा दिये गये शापके कारण तुर्वसुका वंश पूरुवंशमें प्रविष्ट हो गया था$^३$। दुष्यन्तका पुत्र राजा वरूथ$^४$ था। वरूथसे आण्डीर (भुवमन्यु)-की उत्पत्ति हुई। आण्डीरके संधान, पाण्ड्य, केरल, चोल और कर्ण नामक पाँच पुत्र हुए। उनके समृद्धिशाली देश उन्हींके नामपर पाण्ड्य, चोल और केरल नामसे प्रसिद्ध हुए। (ययातिके चतुर्थ पुत्र) द्रुह्युके सेतु और केतु (अन्यत्र सर्वत्र बभ्रु) नामक दो शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए। सेतुका पुत्र शरद्वान् और उसका पुत्र गन्धार हुआ, जिसके नामसे यह विशाल गान्धार जनपद विख्यात है। उस जनपदके आरट्ट$^५$ (पंजाबका पश्चिम भाग) प्रदेशमें उत्पन्न हुए घोड़े अश्वजातिमें सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। गन्धारका पुत्र धर्म और उसका पुत्र धृत हुआ। धृतसे विदुषका जन्म हुआ और उसका पुत्र प्रचेता हुआ। प्रचेताके सौ पुत्र हुए जो सब-के-सब राजा हुए। वे सभी उत्तर दिशामें स्थित म्लेच्छ-राज्योंके अधीश्वर थे॥ १—९॥ |
| अनोश्चैव सुता वीरास्त्रयः परमधार्मिकाः।<br>सभानरश्चाक्षुषश्च परमेषुस्तथैव च॥ १०<br>सभानरस्य पुत्रस्तु विद्वान् कोलाहलो नृपः।<br>कोलाहलस्य धर्मात्मा संजयो नाम विश्रुतः॥ ११ | (ययातिके तृतीय पुत्र) अनुके सभानर, चाक्षुष और परमेषु नामक तीन शूरवीर एवं परम धार्मिक पुत्र उत्पन्न हुए। सभानरका पुत्र विद्वान् राजा कोलाहल हुआ। कोलाहलका धर्मात्मा पुत्र संजय नामसे |
१. ऋग्वेदमें यह तुर्वश है और ४।३०।१६ से १०।६२।१० तक निरन्तर अपने सभी उपर्युक्त भाइयोंके साथ वर्णित है। भागवत ९।२३।१६ तथा विष्णुपुराण ४।१६।३ आदिमें तुर्वसके पुत्रका नाम 'वह्नि' और उसके पुत्रका नाम 'गोभानु'की जगह 'भर्ग' बतलाया गया है।
२. अन्यत्र प्रायः सर्वत्र इसका 'त्रिसारि'की जगह 'त्रिभानु' नाम आया है।
३. तुर्वसुके वंशके पौरव वंशमें प्रविष्ट होनेकी कथा सभी पुराणोंमें (विशेषकर वायु० ९९।५, ब्रह्माण्ड० ३।७५।७ तथा विष्णुपुराण ४।१६।६ में बहुत) स्पष्ट रूपसे आयी है।
४. इनके दूसरे नाम वितथ एवं भरद्वाज भी हैं।
५. इस प्रदेशकी महाभारत, कर्णपर्व ४४।३७-३८ (श्लोक) से ४५ (श्लोक ३० तक) अध्यायोंतकमें चर्चा एवं आलोचना है।
* अध्याय ४८ * १८९
| संजयस्याभवत् पुत्रो वीरो नाम पुरंजयः।<br>जनमेजयो महाराजः पुरंजयसुतोऽभवत् ॥ १२<br>जनमेजयस्य राजर्षेर्महाशालोऽभवत् सुतः।<br>आसीदिन्द्रसमो राजा प्रतिष्ठितयशाभवत् ॥ १३<br>महामनाः सुतस्तस्य महाशालस्य धार्मिकः।<br>सप्तद्वीपेश्वरो जज्ञे चक्रवर्ती महामनाः ॥ १४<br>महामनास्तु द्वौ पुत्रौ जनयामास विश्रुतौ।<br>उशीनरं च धर्मज्ञं तितिक्षुं चैव तावुभौ ॥ १५<br>उशीनरस्य पत्न्यस्तु पञ्च राजर्षिसम्भवाः।<br>भृशा कृशा नवा दर्शा या च देवी दृषद्वती ॥ १६<br>उशीनरस्य पुत्रास्तु तासु जाताः कुलोद्वहाः।<br>तपसा ते तु महता जाता वृद्धस्य धार्मिकाः ॥ १७<br>भृशायास्तु नृगः पुत्रो नवाया नव एव च।<br>कृशायास्तु कृशो जज्ञे दर्शायाः सुव्रतोऽभवत्।<br>दृषद्वत्याः सुतश्चापि शिबिरौशीनरो नृपः ॥ १८<br>शिबेस्तु शिबयः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>पृथुदर्भः सुवीरश्च केकयो मद्रकस्तथा ॥ १९<br>तेषां जनपदाः स्फीताः कैकया मद्रकास्तथा।<br>सौवीराश्चैव पौराश्च नृगस्य केकयास्तथा ॥ २०<br>सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा कृशस्य वृषला पुरी।<br>नवस्य नवराष्ट्रं तु तितिक्षोस्तु प्रजां शृणु ॥ २१ | विख्यात था। संजयका पुरंजय नामक वीरवर पुत्र हुआ। महाराज जनमेजय (प्रथम) पुरंजयके पुत्र हुए। राजर्षि जनमेजयसे महाशाल नामक पुत्र पैदा हुआ जो इन्द्रतुल्य तेजस्वी एवं प्रतिष्ठित कीर्तिवाला राजा हुआ। उन महाशालके महामना नामक पुत्र पैदा हुआ जो परम धर्मात्मा, महान् मनस्वी तथा सातों द्वीपोंका अधीश्वर चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। महामनाने दो पुत्रोंको जन्म दिया। वे दोनों धर्मज्ञ उशीनर और तितिक्षु नामसे विख्यात हुए। उशीनरकी भृशा, कृशा, नवा, दर्शा और देवी दृषद्वती—ये पाँच पत्नियाँ थीं, जो सभी राजर्षियोंकी कन्याएँ थीं। उनके गर्भसे उशीनरके परम धर्मात्मा एवं कुलवर्धक पुत्र उत्पन्न हुए थे। वे सभी उशीनरकी वृद्धावस्थामें महान् तपके फलस्वरूप पैदा हुए थे। भृशाका पुत्र नृग और नवाका पुत्र नव हुआ। कृशाने कृशको जन्म दिया। दर्शाके सुव्रत नामक पुत्र हुआ। दृषद्वतीके पुत्र उशीनर-नन्दन राजा शिबि हुए। शिबिके पृथुदर्भ, सुवीर, केकय और मद्रक नामक चार विश्वविख्यात पुत्र हुए। ये सभी शिबिगण नामसे भी प्रसिद्ध थे। इनके समृद्धिशाली जनपद केकय (व्यास और शतलजके मध्य पंजाबका पश्चिमोत्तर भाग), मद्रक, सौवीर (सिंधका उत्तरी भाग) और पौर नामसे विख्यात थे। नृगका जनपद केकय और सुव्रतका अम्बष्ठ नामसे प्रसिद्ध था। कृशकी राजधानी वृषलापुरी थी। नव नवराष्ट्रके अधीश्वर थे। अब तितिक्षुकी संततिका वर्णन सुनिये॥ १०—२१॥ |
| तितिक्षुरभवद् राजा पूर्वस्यां दिशि विश्रुतः।<br>वृषद्रथः सुतस्तस्य तस्य सेनोऽभवत् सुतः ॥ २२<br>सेनस्य सुतपा जज्ञे सुतपस्तनयो बलिः।<br>जातो मानुषयोन्या तु क्षीणे वंशे प्रजेच्छया ॥ २३<br>महायोगी तु स बलिर्बद्धो बन्धैर्महात्मना।<br>पुत्रानुत्पादयामास क्षेत्रजान् पञ्च पार्थिवान् ॥ २४<br>अङ्गं स जनयामास वङ्गं सुह्मं तथैव च।<br>पुण्ड्रं कलिङ्गं च तथा बालेयं क्षेत्रमुच्यते।<br>बालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वंशकराः प्रभोः ॥ २५<br>बलेश्च ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन धीमतः।<br>महायोगित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम् ॥ २६<br>संग्रामे चाप्यजेयत्वं धर्मे चैवोत्तमा मतिः।<br>त्रैकाल्यदर्शनं चैव प्राधान्यं प्रसवे तथा ॥ २७ | तितिक्षु पूर्व दिशामें विख्यात राजा हुआ। उसका पुत्र वृषद्रथ और वृषद्रथका पुत्र सेन हुआ। सेनके सुतपा नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुतपाका पुत्र बलि हुआ। महायोगी बलि अपने वंशके नष्ट हो जानेपर संतानकी कामनासे मानव-योनिमें उत्पन्न हुआ था। इसे महान् आत्मबलसे सम्पन्न भगवान् विष्णुने वामनरूपसे बन्धनोंद्वारा बाँध लिया था। राजा बलिने पाँच क्षेत्रज पुत्रोंको जन्म दिया जो सभी आगे चलकर पृथिवीपति हुए। उसने अङ्ग, वङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामक पुत्रोंको पैदा किया जो बलिके क्षेत्रज पुत्र कहलाते हैं। ये बलिपुत्र ब्राह्मणसे उत्पन्न होनेके कारण ब्राह्मण थे और सामर्थ्यशाली बलिके वंशप्रवर्तक हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माने प्रसन्न होकर बुद्धिमान् बलिको ऐसा वरदान दिया था कि 'तुम महान् योगी होगे। कल्पपर्यन्त परिमाणवाली तुम्हारी आयु होगी। तुम संग्राममें किसीसे पराजित नहीं होगे। धर्मके विषयमें तुम्हारी बुद्धि उत्तम होगी। तुम त्रिकालदर्शी और असुरवंशमें प्रधान |
| १९० | * मत्स्यपुराण * |
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| जयं चाप्रतिमं युद्धे धर्मे तत्त्वार्थदर्शनम्।<br>चतुरो नियतान् वर्णान् स वै स्थापयिता प्रभुः॥ २८<br>तेषां च पञ्च दायादा वङ्गाङ्गाः सुह्मकास्तथा।<br>पुण्ड्राः कलिङ्गाश्च तथा अङ्गस्य तु निबोधत ॥ २९ | होगे। युद्धमें तुम्हें अनुपम विजय प्राप्त होगी। धर्मके विषयमें तुम तत्त्वार्थदर्शी होगे।' इसीके परिणामस्वरूप | | ऋषय ऊचुः<br>कथं बलेः सुता जाताः पञ्च तस्य महात्मनः।<br>किं नाम्नी महिषी तस्य जनिता कतमो ऋषिः॥ ३०<br>कथं चोत्पादितास्तेन तन्नः प्रब्रूहि पृच्छताम्।<br>माहात्म्यं च प्रभावं च निखिलेन वदस्व तत्॥ ३१ | सामर्थ्यशाली बलि चारों नियत (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, | | सूत उवाच<br>अथौशिज इति ख्यात आसीद् विद्वान् ऋषिः पुरा।<br>पत्नी वै ममता नाम बभूवास्य महात्मनः ॥ ३२<br>उशिजस्य यवीयान् वै भ्रातृपत्नीमकामयत्।<br>बृहस्पतिर्महातेजा ममतामेत्य कामतः ॥ ३३ | शूद्र) वर्णोंकी स्थापना करनेवाला हुआ। बलिके पाँचों | | उवाच ममता तं तु देवरं वरवर्णिनी।<br>अन्तर्वत्न्यस्मि ते भ्रातुर्ज्येष्ठस्य तु विरम्यताम् ॥ ३४<br>अयं तु मे महाभाग गर्भः कुप्येद् बृहस्पते।<br>औशिजो भ्रातृजन्यस्ते सोपाङ्गं वेदमूद्गिरन् ॥ ३५<br>अमोघरेतास्त्वं चापि न मां भजितुमर्हसि।<br>अस्मिन्नेवं गते काले यथा वा मन्यसे प्रभो॥ ३६ | क्षेत्रज पुत्रोंके वंश भी उन्हींके नामपर अङ्ग, वङ्ग, सुह्मक, पुण्ड्र और कलिङ्ग नामसे विख्यात हुए*। | | एवमुक्तस्तथा सम्यग् बृहत्तेजा बृहस्पतिः।<br>कामात्मा स महात्मापि न मनः सोऽभ्यवारयत् ॥ ३७<br>सम्बभूवैव धर्मात्मा तया सार्धमकामया।<br>उत्सृजन्तं तु तद्रेतो वाचं गर्भोऽभ्यभाषत ॥ ३८<br>भो तात वाचामधिप द्वयोर्नास्तीह संस्थितिः।<br>अमोघरेतास्त्वं चापि पूर्वं चाहमिहागतः॥ ३९ | उनमें अङ्गके वंशका वर्णन सुनिये ॥२२—५०॥ | | सोऽशपत् तं ततः क्रुद्ध एवमुक्तो बृहस्पतिः।<br>पुत्रं ज्येष्ठस्य वै भ्रातुर्गर्भस्थं भगवानृषिः॥ ४०<br>यस्मात् त्वमीदृशे काले गर्भस्थोऽपि निषेधसि।<br>मामेवमुक्तवांस्तस्मात् तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि ॥ ४१ | ऋषियो! दीर्घतमाके प्रभावसे सुदेष्णाका जो ज्येष्ठ | | ततो दीर्घतमा नाम शापादृषिरजायत।<br>अथौशिजो बृहत्कीर्तिर्बृहस्पतिरिवौजसा॥ ४२<br>ऊर्ध्वरेतास्ततोऽसौ वै वसते भ्रातुराश्रमे।<br>स धर्मान् सौरभेयांस्तु वृषभाच्छ्रुतवांस्ततः॥ ४३<br>तस्य भ्राता पितृव्यो यश्चकार भरणं तदा। | पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम अङ्ग था। तत्पश्चात् कलिङ्ग, पुण्ड्र, सुह्म और वङ्गराजका जन्म हुआ। ये पाँचों दैत्यराज |
* इनके वंशजातिवालोंके कारण ये जनपद भी इन्हीं नामोंसे प्रसिद्ध हुए। इनमें अङ्ग—भागलपुर, वङ्ग—पश्चिम बंगाल, सुह्म—आसाम, पुण्ड्र—आजका बंगला देश तथा कलिङ्ग—उड़ीसा है।
* अध्याय ४८ * १९१
तस्मिन् निवसतस्तस्य यदृच्छैवागतो वृषः॥ ४४
यज्ञार्थमाहतान् दर्भांश्चचार सुरभीसुतः।
जग्राह तं दीर्घतमाः शृङ्गयोस्तु चतुष्पदम्॥ ४५
तेनासौ निगृहीतश्च न चचाल पदात् पदम्।
ततोऽब्रवीद् वृषस्तं वै मुञ्च मां बलिनां वर॥ ४६
न मयाऽऽसादितस्तात बलवांस्त्वत्समः क्वचित्।
मम चान्यः समो वापि न हि मे बलसंख्यया।
मुञ्च तातेति च पुनः प्रीतस्तेऽहं वरं वृणु॥ ४७
एवमुक्तोऽब्रवीदेनं जीवन्मे क्व यास्यसि।
एष त्वां न विमोक्ष्यामि परस्वादं चतुष्पदम्॥ ४८
वृषभ उवाच
नास्माकं विद्यते तात पातकं स्तेयमेव च।
भक्ष्याभक्ष्यं तथा चैव पेयापेयं तथैव च॥ ४९
द्विपदां बहवो ह्येते धर्म एष गवां स्मृतः।
कार्याकार्ये न वागम्यागमनं च तथैव च॥ ५०
सूत उवाच
गवां धर्मं तु वै श्रुत्वा सम्भ्रान्तस्तु विसृज्य तम्।
शक्त्यान्नपानदानात् तु गोपतिं सम्प्रसादयत्॥ ५१
प्रसादिते गते तस्मिन् गोधर्मं भक्तितस्तु सः।
मनसैव समादध्यौ तन्निष्ठस्तत्परो हि सः॥ ५२
ततो यवीयसः पत्नीं गौतमस्याभ्यपद्यत।
कृतावलेपां तां मत्वा सोऽनड्वानिव न क्षमे॥ ५३
गोधर्मं तु परं मत्वा स्नुषां तामभ्यपद्यत।
निर्भर्त्स्य चैनं रुद्ध्वा च बाहुभ्यां सम्प्रगृह्य च॥ ५४
भाव्यर्थं तु तं ज्ञात्वा माहात्म्यात् तमुवाच सा।
विपर्ययं तु त्वं लब्ध्वा अनड्वानिव वर्तसे॥ ५५
गम्यागम्यं न जानीषे गोधर्मात् प्रार्थयन् सुताम्।
दुर्वृत्तं त्वां त्यजाम्यद्य गच्छ त्वं स्वेन कर्मणा॥ ५६
काष्ठे समुद्रे प्रक्षिप्य गङ्गाम्भसि समुत्सृजत्।
तस्मात् त्वमन्धो वृद्धश्च भर्त्तव्यो दुरधिष्ठितः॥ ५७
तमुह्यमानं वेगेन स्रोतसोऽभ्याशमागतः।
जग्राह तं स धर्मात्मा बलिवैरोचनिस्तदा॥ ५८
अन्तःपुरे जुगोपैनं भक्ष्यभोज्यैश्च तर्पयन्।
प्रीतश्चैवं वरेणैवच्छन्दयामास वै बलिम्॥ ५९
तस्माच्च स वरं वव्रे पुत्रार्थे दानवर्षभः।
संतानार्थं महाभाग भार्यायां मम मानद।
पुत्रान् धर्मार्थतत्त्वज्ञानुत्पादयितुमर्हसि॥ ६०
बलिके क्षेत्रज पुत्र थे। ये सभी पुत्र महर्षि दीर्घतमाद्वारा बलिको प्रदान किये गये थे। तदनन्तर उन्होंने मानव-योनिमें कई संतानें उत्पन्न कीं। एक बार सुरभि (गौ) दीर्घतमाके पास आकर उनसे बोली—'विभो! आपने हम लोगोंके प्रति अनन्यभक्ति होनेके कारण भलीभाँति विचारकर पशु-धर्मको प्रमाणित कर दिया है, इसलिये मैं आपपर परम प्रसन्न हूँ। अनघ! आपके शरीरमें बृहस्पतिका अंशभूत जो यह पाप स्थित है, उस घोर अन्धकारको सूँघकर मैं आपसे दूर किये देती हूँ। साथ ही आपके शरीरसे बुढ़ापा, मृत्यु और अंधकारको भी सूँघकर हटा दे रही हूँ।' (ऐसा कहकर सुरभिने उनके शरीरको सूँघा।) सुरभिके सूँघते ही वे मुनिश्रेष्ठ दीर्घतमा तुरन्त दीर्घ आयु, सौन्दर्यशाली शरीर और सुन्दर नेत्रोंसे युक्त हो गये॥ ५१–८३॥
इस प्रकार गौद्वारा अन्धकारके नष्ट कर दिये जानेपर वे गौतम नामसे प्रसिद्ध हुए। तदनन्तर कक्षीवान् अपने पिता गौतमके साथ गिरिव्रजको जाकर उन्हींके साथ निवास करता हुआ चिरकालिक तपस्यामें संलग्न हो गया। वहाँ वह नित्य
१९२ * मत्स्यपुराण *
एवमुक्तोऽथ देवर्षिस्तथास्त्वित्युक्तवान् प्रभुः। स तस्य राजा स्वां भार्यां सुदेष्णां नाम प्राहिणोत्। अन्धं वृद्धं च तं ज्ञात्वा न सा देवी जगाम ह॥ ६१ शूद्रां धात्रेयिकां तस्मादन्धाय प्राहिणोत् तदा। तस्यां काक्षीवदादींश्च शूद्रयोनावृषिर्वशी॥ ६२ जनयामास धर्मात्मा शूद्रान्नित्येवमादिकम्। उवाच तं बली राजा दृष्ट्वा काक्षीवदादिकान्॥ ६३
राजोवाच प्रवीणानृषिधर्मस्य चेश्वरान् ब्रह्मवादिनः। विद्वान् प्रत्यक्षधर्माणं बुद्धिमान् वृत्तिमाञ्छुचीन्॥ ६४ ममैव चेति होवाच तं दीर्घतमसं बलिः। नेत्युवाच मुनिस्तं वै ममैवमिति चाब्रवीत्॥ ६५ उत्पन्नाः शूद्रयोनौ तु भवच्छन्देऽसुरोत्तम। अन्धं वृद्धं च मां ज्ञात्वा सुदेष्णा महिषी तव। प्राहिणोदवमानान्मे शूद्रां धात्रेयिकां नृप॥ ६६ ततः प्रसादयामास बलिस्तमृषिसत्तमम्। बलिः सुदेष्णां तां भार्यां भर्त्सयामास दानवः॥ ६७ पुनश्चैनामलङ्कृत्य ऋषये प्रत्यपादयत्। तां स दीर्घतमा देवीं तथा कृतवतीं तदा॥ ६८ दध्ना लवणमिश्रेण त्वभ्यक्तं मधुकेन तु। लिह मामजुगुप्सन्ती आपादतलमस्तकम्। ततस्त्वं प्राप्स्यसे देवि पुत्रान् वै मनसेप्सितान्॥ ६९ तस्य सा तद्वचो देवी सर्वं कृतवती तदा। तस्य सापानमासाद्य देवी पर्यहरत् तदा॥ ७० तामुवाच ततः सोऽथ यत् ते परिहृतं शुभे। विनापानं कुमारं तु जनयिष्यसि पूर्वजम्॥ ७१
सुदेष्णोवाच नार्हसि त्वं महाभाग पुत्रं मे दातुमीदृशम्। तोषितश्च यथाशक्ति प्रसादं कुरु मे प्रभो॥ ७२
दीर्घतमा उवाच तवापचाराद् देव्येष नान्यथा भविता शुभे। नैव दास्यति पुत्रस्ते पौत्रो वै दास्यते फलम्॥ ७३ तस्यापानं विना चैव योग्यभावो भविष्यति। तस्माद् दीर्घतमाङ्गेषु कुक्षौ स्पृष्ट्वेदमब्रवीत्॥ ७४ प्राशितं यद्यदङ्गेषु न सोपस्थं शुचिस्मिते। तेन तिष्ठन्ति ते गर्भे पौर्णमास्यामिवोडुराट्॥ ७५
पिताका दर्शन और स्पर्श करता था। दीर्घकालके पश्चात् महान् तपस्यासे शुद्ध हुए कक्षीवान्ने शूद्रा माताके गर्भसे उत्पन्न हुए शरीरको तपाकर ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कर ली। तब पिता गौतमने उससे कहा—'बेटा! तुम्हारे-जैसे यशस्वी सत्पुत्रसे मैं पुत्रवान् हो गया हूँ। धर्मज्ञ! अब मैं कृतार्थ हो गया।' ऐसा कहकर गौतम अपने शरीरका त्याग कर ब्रह्मलोकको चले गये। ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करके कक्षीवान्ने हजारों पुत्रोंको उत्पन्न किया। कक्षीवान्के वे पुत्र कौष्माण्ड और गौतम नामसे विख्यात हुए॥ ८४-८९॥
इधर बलिने अपने पाँचों निष्पाप पुत्रोंका अभिनन्दन करके उनसे कहा—'पुत्रो! मैं कृतार्थ हो गया।' स्वयं धर्मात्मा एवं सामर्थ्यशाली बलि योगमायासे समावृत था। वह सम्पूर्ण प्राणियोंसे अदृश्य रहकर कालकी प्रतीक्षा कर रहा था। उन पुत्रोंमें अङ्गका पुत्र राजा दधिवाहन हुआ। राजा दिविरथ दधिवाहनके पुत्र कहे जाते हैं। दिविरथका पुत्र विद्वान् राजा धर्मरथ था। ये धर्मरथ बड़े सम्पत्तिशाली नरेश थे। इन्होंने विष्णुपद पर्वतपर महात्मा शुक्राचार्यके साथ सोमरसका पान किया था। धर्मरथका पुत्र चित्ररथ हुआ। उसका पुत्र सत्यरथ हुआ और उससे दशरथका जन्म हुआ जो लोमपाद नामसे विख्यात था। उसके शान्ता नामकी एक (दत्रिमा) कन्या हुई थी।
५० पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास
* अध्याय ४८ * । १९३
| भविष्यन्ति कुमारास्तु पञ्च देवसुतोपमाः।<br>तेजस्विनः सुवृत्ताश्च यज्वानो धार्मिकाश्च ते॥ ७६<br><br>सूत उवाच<br>तदंशस्तु सुदेष्णाया ज्येष्ठः पुत्रो व्यजायत।<br>अङ्गस्तथा कलिङ्गश्च पुण्ड्रः सुहास्तथैव च॥ ७७<br>वङ्गराजस्तु पञ्चैते बलेः पुत्राश्च क्षेत्रजाः।<br>यस्यैते दीर्घतमसा बलेर्दत्ताः सुतास्तथा॥ ७८<br>प्रतिष्ठामागतानां हि ब्राह्मण्यं कार्यंस्ततः।<br>ततो मानुषयोन्यां स जनयामास वै प्रजाः॥ ७९<br>ततस्तं दीर्घतमसं सुरभिर्वाक्यमब्रवीत्।<br>विचार्य यस्माद् गोधर्मं प्रमाणं ते कृतं विभो॥ ८०<br>भक्त्या चानन्ययास्मासु तेन प्रीतास्मि तेऽनघ।<br>तस्मात् तुभ्यं तमो दीर्घमाघ्रायापनुदामि वै॥ ८१<br>बार्हस्पत्यस्तथैवैष पाप्मा वै तिष्ठति त्वयि।<br>जरां मृत्युं तमश्चैव आघ्रायापनुदामि ते॥ ८२<br>सद्यः स घ्रातमात्रस्तु अभितो मुनिसत्तमः।<br>आयुष्मांश्च वपुष्मांश्च चक्षुष्मांश्च ततोऽभवत्॥ ८३<br>गोऽभ्याहते तमसि वै गौतमस्तु ततोऽभवत्।<br>कक्षीवांस्तु ततो गत्वा सह पित्रा गिरिव्रजम्॥ ८४<br>दृष्ट्वा स्पृष्ट्वा पितुर्वै स ह्युपविष्टश्चिरं तपः।<br>ततः कालेन महता तपसा भावितस्तु सः॥ ८५<br>विधूय मातृजं कायं ब्राह्मणं प्राप्तवान् प्रभुः।<br>ततोऽब्रवीत् पिता तं वै पुत्रवानस्म्यहं त्वया॥ ८६<br>सत्पुत्रेण तु धर्मज्ञ कृतार्थोऽहं यशस्विना।<br>मुक्त्वाऽऽत्मानं ततोऽसौ वै प्राप्तवान् ब्रह्मणः क्षयम्॥ ८७<br>ब्राह्मण्यं प्राप्य काक्षीवान् सहस्रमसृजत् सुतान्।<br>कौष्माण्डा गौतमाश्चैव स्मृताः काक्षीवतः सुताः॥ ८८<br>इत्येष दीर्घतमसो बलेर्वैरोचनस्य च।<br>समागमो वः कथितः सन्ततिश्चोभयोस्तथा॥ ८९<br>बलिस्तानभिनन्द्याह पञ्च पुत्रानकल्मषान्।<br>कृतार्थः सोऽपि धर्मात्मा योगमायावृतः स्वयम्॥ ९०<br>अदृश्यः सर्वभूतानां कालापेक्षः स वै प्रभुः।<br>तत्राङ्गस्य तु दायादो राजासीद् दधिवाहनः॥ ९१<br>दधिवाहनपुत्रस्तु राजा दिविरथः स्मृतः।<br>आसीद् दिविरथापत्यं विद्वान् धर्मरथो नृपः॥ ९२ | दशरथका पुत्र महायशस्वी शूरवीर चतुरङ्ग हुआ।<br><br>चतुरङ्गका पुत्र पृथुलाक्ष नामसे प्रसिद्ध हुआ। अपने कुलकी वृद्धि करनेवाला यह पृथुलाक्ष महर्षि ऋष्यशृङ्गकी कृपासे पैदा हुआ था। पृथुलाक्षके चम्प नामक पुत्र हुआ। चम्पकी राजधानीका नाम चम्पा (भागलपुर) था, जो पहले मालिनी नामसे प्रसिद्ध थी। पूर्णभद्रकी कृपासे चम्पका पुत्र हर्यङ्ग हुआ। इस राजाके यज्ञमें महर्षि विभाण्डकने मन्त्रोंद्वारा एक ऐसे हस्तीको भूतलपर अवतीर्ण किया था जो शत्रुओंको विमुख कर देनेवाला एवं उत्तम वाहन था। हर्यङ्गका पुत्र भद्ररथ पैदा हुआ। भद्ररथका पुत्र राजा बृहत्कर्मा हुआ। उसका पुत्र बृहद्भानु हुआ। उससे महात्मवान्का जन्म हुआ। राजेन्द्र बृहद्भानुने एक अन्य पुत्रको भी उत्पन्न किया था जिसका नाम जयद्रथ था। उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बृहद्रथसे विश्वविजयी जनमेजय पैदा हुआ था। उसका पुत्र अङ्ग था और उससे राजा कर्णकी उत्पत्ति हुई थी। कर्णका वृषसेन और उसका पुत्र पृथुसेन हुआ। द्विजवरो! ये सभी राजा अङ्गके वंशमें उत्पन्न हुए थे, मैंने इनका आनुपूर्वी विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। अब आप लोग पूरुके वंशका वर्णन सुनिये॥ ९०—१०३॥ |
| १९४ | * मत्स्यपुराण * |
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| स हि धर्मरथः श्रीमांस्तेन विष्णुपदे गिरौ।<br>सोमः शुक्रेण वै राज्ञा सह पीतो महात्मना॥ ९३<br>अथ धर्मरथस्याभूत् पुत्रश्चित्ररथः किल।<br>तस्य सत्यरथः पुत्रस्तस्माद् दशरथः किल॥ ९४<br>लोमपाद इति ख्यातस्तस्य शान्ता सुताभवत्।<br>अथ दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गो महायशाः॥ ९५<br>ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जज्ञे स्वकुलवर्धनः।<br>चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः॥ ९६<br>पृथुलाक्षसुतश्चापि चम्पनामा बभूव ह।<br>चम्पस्य तु पुरी चम्पा पूर्वं या मालिनी भवत्॥ ९७<br>पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोऽभवत्।<br>यज्ञे विभाण्डकाच्चास्य वारणः शत्रुवारणः॥ ९८<br>अवतारयामास महीं मन्त्रैर्वाहनमुत्तमम्।<br>हर्यङ्गस्य तु दायादो जातो भद्ररथः किल॥ ९९<br>अथ भद्ररथस्यासीद् बृहत्कर्मा जनेश्वरः।<br>बृहद्भानुः सुतस्तस्य तस्माज्जज्ञे महात्मवान्॥ १००<br>बृहन्मनास्तु राजेन्द्रो जनयामास वै सुतम्।<br>नाम्ना जयद्रथं नाम तस्माद् बृहद्रथो नृपः॥ १०१<br>आसीद् बृहद्रथाच्चैव विश्वजिज्जनमेजयः।<br>दायादस्तस्य चाङ्गो वै तस्मात् कर्णोऽभवन्नृपः॥ १०२<br>कर्णस्य वृषसेनस्तु पृथुसेनस्तथात्मजः।<br>एतेऽङ्गस्यात्मजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया।<br>विस्तरेणानुपूर्व्याच्च पुरोस्तु शृणुत द्विजाः॥ १०३ | | | ऋषय ऊचुः<br>कथं सूतात्मजः कर्णः कथमङ्गस्य चात्मजः।<br>एतदिच्छामहे श्रोतुमत्यन्तकुशलो ह्यसि॥ १०४ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! कर्ण कैसे अधिरथ सूतके पुत्र थे, पुनः किस प्रकार अङ्गके पुत्र कहलाये? इस रहस्यको सुननेकी हम लोगोंकी उत्कट इच्छा है, इसका वर्णन कीजिये; क्योंकि आप कथा कहनेमें परम प्रवीण हैं॥ १०४॥ | | सूत उवाच<br>बृहद्भानुसुतो जज्ञे राजा नाम्ना बृहन्मनाः।<br>तस्य पत्नीद्वयं ह्यासीच्छैब्यस्य तनये ह्युभे।<br>यशोदेवी च सत्या च तयोर्वंशं च मे शृणु॥ १०५<br>जयद्रथं तु राजानं यशोदेवी व्यजीजनत्।<br>सा बृहन्मनसः सत्या विजयं नाम विश्रुतम्॥ १०६<br>विजयस्य बृहत्पुत्रस्तस्य पुत्रो बृहद्रथः।<br>बृहद्रथस्य पुत्रस्तु सत्यकर्मा महामनाः॥ १०७<br>सत्यकर्मणोऽधिरथः सूतश्चाधिरथः स्मृतः।<br>यः कर्णं प्रतिजग्राह तेन कर्णस्तु सूतजः।<br>तच्चेदं सर्वमाख्यातं कर्णं प्रति यथोदितम्॥ १०८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! बृहद्भानुका पुत्र बृहन्मना नामका राजा हुआ। उसके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों शैब्यकी कन्याएँ थीं। उनका नाम यशोदेवी और सत्या था। अब मुझसे उन दोनोंका वंश-वर्णन सुनिये। बृहन्मनाके संयोगसे यशोदेवीने राजा जयद्रथको और सत्याने विश्वविख्यात विजयको जन्म दिया था। विजयका पुत्र बृहत्पुत्र और उसका पुत्र बृहद्रथ हुआ। बृहद्रथका पुत्र महामना सत्यकर्मा हुआ। सत्यकर्माका पुत्र अधिरथ हुआ। यही अधिरथ सूत नामसे भी विख्यात था, जिसने (गङ्गामें बहते हुए) कर्णको पकड़ा था। इसी कारण कर्ण सूत-पुत्र कहे जाते हैं। इस प्रकार कर्णके प्रति जो किंवदन्ती फैली है, उसे पूर्णतया मैंने आप लोगोंसे कह दिया॥ १०५—१०८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशेऽष्टचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४८॥
* अध्याय ४९ * । १९५
उनचासवाँ अध्याय
पूरू-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास
| सूत उवाच<br><br>पूरोः पुत्रो महातेजा राजा स जनमेजयः ।<br>प्राचीत्वतः सुतस्तस्य यः प्राचीमकरोद् दिशम् ॥ १<br><br>प्राचीत्वतस्य तनयो मनस्युश्च तथाभवत् ।<br>राजा वी ( पी ) तायुधो नाम मनस्योरभवत् सुतः ॥ २<br><br>दायादस्तस्य चाप्यासीद् धुन्धुर्नाम महीपतिः ।<br>धुन्धोर्बहुविधः पुत्रः संयातिस्तस्य चात्मजः ॥ ३<br><br>संयातेस्तु रहंवर्चा भद्राश्वस्तस्य चात्मजः ।<br>भद्राश्वस्य घृतायां तु दशाप्सरसि सूनवः ॥ ४<br><br>औचेयुश्च हृषेयुश्च कक्षेयुश्च सुनेयुकः ।<br>धृतेयुश्च विनेयुश्च स्थलेयुश्चैव सत्तमः ॥ ५<br><br>धर्मेयुः संनतेयुश्च पुण्येयुश्चेति ते दश ।<br>औचेयोर्ज्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा ॥ ६<br><br>तस्यां स जनयामास रन्तिनारं महीपतिम् ।<br>रन्तिनारो मनस्विन्यां पुत्राञ्जज्ञे पराञ्शुभान् ॥ ७<br><br>अमूर्तरयसं वीरं त्रिवनं चैव धार्मिकम् ।<br>गौरी कन्या तृतीया च मान्धातर्जननी शुभा ॥ ८<br><br>इलिना तु यमस्यासीत् कन्या साजनयत् सुतम् ।<br>त्रिवनाद् दयितं पुत्रमैलिनं ब्रह्मवादिनम् ॥ ९<br><br>उपदानवी सुताँल्लेभे चतुरस्त्विलिनात्मजात् ।<br>ऋष्यन्तमथ दुष्यन्तं प्रवीरमनघं तथा ॥ १०<br><br>चक्रवर्ती ततो जज्ञे दुष्यन्तात् समितिक्षयः ।<br>शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना च भारताः ॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! (ययातिके सबसे छोटे पुत्र) पूरुका पुत्र महातेजस्वी राजा जनमेजय (प्रथम) था। उसका पुत्र प्राचीत्वत (प्राचीनवंत) हुआ, जिसने प्राची (पूर्व) दिशा बसायी। प्राचीत्वतका पुत्र मनस्यु* हुआ। मनस्युका पुत्र राजा वीतायुध (अभय) हुआ। उसका पुत्र धुन्धु नामका राजा हुआ। धुन्धुका पुत्र बहुविध (बहुविद्य, अन्यत्र बहुगव) और उसका पुत्र संयाति हुआ। संयातिका पुत्र रहंवर्चा और उसका पुत्र भद्राश्व (रौद्राश्व) हुआ। भद्राश्वके घृता (घृताची, अन्यत्र मिश्रकेशी) नामकी अप्सराके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न हुए। उन दसोंके नाम हैं—औचेयु (अधिकांश पुराणोंमें ऋचेयु), हृषेयु, कक्षेयु, सुनेयु, धृतेयु, विनेयु, श्रेष्ठ स्थलेयु, धर्मेयु, संनतेयु और पुण्येयु। औचेयु (ऋचेयु)-की पत्नीका नाम ज्वलना था। वह नागराज तक्षककी कन्या थी। उसके गर्भसे उन्होंने भूपाल रन्तिनार (यह प्रायः सर्वत्र मतिनार, पर भागवतमें रन्तिभार है)-को जन्म दिया। रन्तिनारने अपनी पत्नी मनस्विनीके गर्भसे कई सुन्दर पुत्रोंको उत्पन्न किया, जिनमें वीरवर अमूर्तरय और धर्मात्मा त्रिवन प्रधान थे। उसकी तीसरी संतति गौरी नामकी सुन्दरी कन्या थी, जो मान्धाताकी जननी हुई। इलिना यमराजकी कन्या थी। उसने त्रिवनसे ब्रह्मवादमें श्रेष्ठ पराक्रमी ऐलिन (ऐलिक, त्रंसु या जंसु) नामक प्रिय पुत्र उत्पन्न किया। इलिना-नन्दन ऐलिन (जंसु)-के संयोगसे उपदानवीने ऋष्यन्त, दुष्यन्त, प्रवीर तथा अनघ नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। इनमें द्वितीय पुत्र राजा दुष्यन्तके संयोगसे शकुन्तलाके गर्भसे भरतका जन्म हुआ, जो आगे चलकर संग्राम-विजयी चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। उसीके नामपर उसके वंशधर 'भारत' नामसे कहे जाने लगे॥ १-११॥ |
* महाभारत १।९४।१ तथा अन्य वायु, विष्णु, ब्रह्माण्डादि पुराणोंमें प्राचीनवंत या प्राचीनवंशका पुत्र प्रवीर और उसका पुत्र मनस्यु कहा गया है। इसमें आगे भी जहाँ-तहाँ कुछ पुरुष छोड़ दिये गये हैं जो पढ़ते समय स्पष्ट ज्ञात हो जाता है।
| १९६ | * मत्स्यपुराण * |
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| दौष्यन्तिं प्रति राजानं वागूचे चाशरीरिणी।<br>माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ॥ १२<br>भरस्व पुत्रं दुष्मन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम्।<br>रेतोधां नयते पुत्रः परेतं यमसादनात्।<br>त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥ १३<br>भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु पुरा किल।<br>पुत्राणां मातृकात् कोपात् सुमहान् संक्षयः कृतः ॥ १४<br>ततो मरुद्भिरानीय पुत्रः स तु बृहस्पतेः।<br>संक्रामितो भरद्वाजो मरुद्भिर्भरतस्य तु ॥ १५<br><br>ऋषय ऊचुः<br>भरतस्य भरद्वाजः पुत्रार्थं मारुतैः कथम्।<br>संक्रामितो महातेजास्तन्नो ब्रूहि यथातथम् ॥ १६<br><br>सूत उवाच<br>पत्न्यामापन्नसत्त्वायामुशिजः स स्थितो भुवि।<br>भ्रातृभार्यां स दृष्ट्वा तु बृहस्पतिरुवाच ह ॥ १७<br>उपतिष्ठ स्वलंकृत्य मैथुनाय च मां शुभे।<br>एवमुक्ताब्रवीदेनं स्वयमेव बृहस्पतिम् ॥ १८<br>गर्भः परिणतश्चायं ब्रह्म व्याहरते गिरा।<br>अमोघरेतास्त्वं चापि धर्मं चैवं विगर्हितम् ॥ १९<br>एवमुक्तोऽब्रवीदेनां स्वयमेव बृहस्पतिः।<br>नोपदेष्टव्यो विनयस्त्वया मे वरवर्णिनि ॥ २०<br>धर्षमाणः प्रसह्यैनां मैथुनायोपचक्रमे।<br>ततो बृहस्पतिं गर्भो धर्षमाणमुवाच ह ॥ २१<br>संनिविष्टो ह्यहं पूर्वमिह नाम बृहस्पते।<br>अमोघरेताश्च भवान् नावकाश इह द्वयोः ॥ २२<br>एवमुक्तः स गर्भेण कुपितः प्रत्युवाच ह।<br>यस्मात् त्वमीदृशे काले सर्वभूतेप्सिते सति।<br>अभिषेधसि तस्मात् त्वं तमो दीर्घं प्रवेक्ष्यसि ॥ २३<br>ततः कामं संनिवर्त्य तस्यानन्दाद् बृहस्पतेः।<br>तद्रेतस्त्वपतद् भूमौ निवृत्तं शिशुकोऽभवत् ॥ २४<br>सद्योजांत कुमारं तु दृष्ट्वा तं ममताब्रवीत्।<br>गमिष्यामि गृहं स्वं वै भरस्वैनं बृहस्पते ॥ २५<br>एवमुक्त्वा गता सा तु गतायां सोऽपि तं त्यजत्। | इसी दुष्मन्त-पुत्र भरतके विषयमें आकाशवाणीने राजा दुष्मन्तसे कहा था—‘दुष्मन्त! माताका गर्भाशय तो एक चमड़ेके थैलेके समान है, उसमें गर्भाधान करनेके कारण पुत्र पिताका ही होता है; अतः जो जिससे पैदा होता है, वह उसका आत्मस्वरूप ही होता है। इसलिये तुम अपने पुत्रका भरण-पोषण करो और शकुन्तलाका अपमान मत करो। पुत्र अपने मरे हुए पिताको यमपुरीके कष्टोंसे छुटकारा दिलाता है। इस गर्भका आधान करनेवाले तुम्हीं हो, शकुन्तलाने यह बिलकुल सच बात कही है।' पूर्वकालमें भरतके सभी पुत्रोंका विनाश हो गया था। माताके कोपके कारण उनके पुत्रोंका यह महान् संहार हुआ था। यह देखकर मरुद्गणोंने बृहस्पतिके पुत्र भरद्वाजको लाकर भरतके हाथोंमें समर्पित किया था। बृहस्पति अपने इस पुत्रको वनमें छोड़कर चले गये थे॥ १२-२५ १/२ ॥ |
| * अध्याय ४९ * | १९७ |
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| मातापितृभ्यां त्यक्तं तु दृष्ट्वा तं मरुतः शिशुम्।<br>जगृहुस्तं भरद्वाजं मरुतः कृपया स्थिताः॥ २६<br>तस्मिन् काले तु भरतो बहुभिर्ऋतुभिर्विभुः।<br>पुत्रनैमित्तिकैर्यज्ञैरयजत् पुत्रलिप्सया॥ २७<br>यदा स यजमानस्तु पुत्रं नासादयत् प्रभुः।<br>ततः क्रतुं मरुत्सोमं पुत्रार्थे समुपाहरत्॥ २८<br>तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तुष्टुवुः।<br>उपनिन्युर्भरद्वाजं पुत्रार्थं भरताय वै॥ २९<br>दायादोऽङ्गिरसः सूनौरौरसस्तु बृहस्पतेः।<br>संक्रामितो भरद्वाजा मरुद्भिर्भरतं प्रति॥ ३०<br>भरतस्तु भरद्वाजं पुत्रं प्राप्य विभुर्ब्रवीत्।<br>आदावात्महिताय त्वं कृतार्थोऽहं त्वया विभो॥ ३१<br>पूर्वं तु वितथे तस्मिन् कृते वै पुत्रजन्मनि।<br>ततस्तु वितथो नाम भरद्वाजो नृपोऽभवत्॥ ३२<br>तस्मादपि भरद्वाजाद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया भुवि।<br>द्व्यामुष्यायणकौलीनाः स्मृतास्ते द्विविधेन च॥ ३३ | इस प्रकार माता-पिताद्वारा त्यागे गये उस शिशुको देखकर मरुद्गणोंका हृदय दयार्द्र हो गया, तब उन्होंने उस भरद्वाज नामक शिशुको उठा लिया। उसी समय राजा भरत पुत्र-प्राप्तिकी अभिलाषासे अनेकों ऋतुकालके अवसरोंपर पुत्रनिमित्तक यज्ञोंका अनुष्ठान करते आ रहे थे, परंतु जब उन सामर्थ्यशाली नरेशको उन यज्ञोंके करनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने पुत्र-प्राप्तिके निमित्त 'मरुत्स्तोम' नामक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। राजा भरतके उस मरुत्स्तोम यज्ञसे सभी मरुद्गण प्रसन्न हो गये। तब वे उस भरद्वाज नामक शिशुको साथ लेकर भरतको पुत्ररूपमें प्रदान करनेके लिये उस यज्ञमें उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने अङ्गिरा-पुत्र बृहस्पतिके औरस पुत्र भरद्वाजको भरतके हाथोंमें समर्पित कर दिया। तब राजा भरत भरद्वाजको पुत्ररूपमें पाकर इस प्रकार बोले—'विभो! पहले तो आप (इस शिशुको लेकर) आत्महितकी ही बात सोच रहे थे, परंतु अब इसे पाकर मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ।' पुत्र-जन्मके हेतु किये गये पहलेके सभी यज्ञ वितथ (निष्फल) हो गये थे, इसलिये वह भरद्वाज राजा वितथके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस भरद्वाजसे भी भूतलपर ब्राह्मण और क्षत्रिय—दोनों प्रकारके पुत्र उत्पन्न हुए, जो द्व्यामुष्यायण और कौलीन नामसे विख्यात हुए॥ २६—३३॥ | | ततो जाते हि वितथे भरतश्च दिवं ययौ।<br>भरद्वाजो दिवं यातो ह्यभिषिच्य सुतं ऋषिः॥ ३४ | तदनन्तर वितथके पुत्ररूपमें प्राप्त हो जानेपर राजा भरत (उसे राज्याभिषिक्त करके) स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि भरद्वाज भी यथासमय अपने पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोक सिधारे। | | दायादो वितथस्यासीद् भुमन्युर्महायशाः।<br>महाभूतोपमाः पुत्राश्चत्वारो भुवमन्यवः॥ ३५ | महायशस्वी भुवमन्यु वितथका पुत्र था। भुवमन्युके बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और वीर्यशाली गर्ग नामक चार पुत्र थे, जो वायु आदि चार महातत्त्वोंके समान थे। | | बृहत्क्षत्रो महावीर्यो नरो गर्गश्च वीर्यवान्।<br>नरस्य संकृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो महायशाः॥ ३६ | नरका पुत्र संकृति हुआ। संकृतिके दो पुत्र महायशस्वी गुरुधी और रन्तिदेव हुए। वे दोनों सत्कृतिके गर्भसे उत्पन्न हुए बतलाये जाते हैं। | | गुरुधी रन्तिदेवश्च सत्कृत्यां तावुभौ स्मृतौ।<br>गर्गस्य चैव दायादः शिबिर्विद्वानजायत॥ ३७ | गर्गके पुत्ररूपमें विद्वान् शिवि उत्पन्न हुआ। उसके वंशधर जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विज थे, शैव्य और गर्गके नामसे विख्यात हुए। | | स्मृताः शैव्यास्ततो गर्गाः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>आहार्यतनयश्चैव धीमानासीदुरुक्षवः॥ ३८ | शिविके आहार्यतनय और बुद्धिमान् उरुक्षव नामक दो पुत्र थे। | | तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे पुत्रकत्रयम्।<br>त्र्यरुणं पुष्करिं चैव कविं चैव महायशाः॥ ३९ | उरुक्षवकी पत्नी विशालाने त्र्यरुण, पुष्करि और महायशस्वी कवि—इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया। |
| १९८ | * मत्स्यपुराण * |
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| उरुक्षवाः स्मृता ह्येते सर्वे ब्राह्मणतां गताः।<br>काव्यानां तु वरा ह्येते त्रयः प्रोक्ता महर्षयः॥ ४०<br>गर्गाः संकृतयः काव्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>सम्भूताङ्गिरसो दक्षा बृहत्क्षत्रस्य च क्षितिः॥ ४१<br>बृहत्क्षत्रस्य दायादो हस्तिनामा बभूव ह।<br>तेनेदं निर्मितं पूर्वं पुरं तु गजसाह्वयम्॥ ४२<br>हस्तिनश्चैव दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढस्तथैव च॥ ४३<br>अजमीढस्य पत्न्यस्तु तिस्रः कुरुकुलोद्भवाः।<br>नीलिनी धूमिनी चैव केशिनी चैव विश्रुताः॥ ४४<br>स तासु जनयामास पुत्रान् वै देववर्चसः।<br>तपसोऽन्ते महातेजा जाता वृद्धस्य धार्मिकाः॥ ४५<br>भारद्वाजप्रसादेन विस्तरं तेषु मे शृणु।<br>अजमीढस्य केशिन्यां कण्वः समभवत् किल॥ ४६<br>मेधातिथिः सुतस्तस्य तस्मात् काण्वायना द्विजाः।<br>अजमीढस्य भूमिन्यां जज्ञे बृहदनुर्नृपः॥ ४७<br>बृहदनोर्बृहन्तोऽथ बृहन्तस्य बृहन्मनाः।<br>बृहन्मनःसुतश्चापि बृहद्धनुरिति श्रुतः॥ ४८<br>बृहद्धनोर्बृहदिषुः पुत्रस्तस्य जयद्रथः।<br>अश्वजित् तनयस्तस्य सेनजित् तस्य चात्मजः॥ ४९<br>अथ सेनजितः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>रुचिराश्वश्च काव्यश्च राजा दृढरथस्तथा॥ ५०<br>वत्सश्चावर्तको राजा यस्यैते परिवत्सकाः।<br>रुचिराश्वस्य दायादः पृथुसेनो महायशाः॥ ५१<br>पृथुसेनस्य पौरस्तु पौरात्रीपोऽथ जज्ञिवान्।<br>नीपस्यैकशतं त्वासीत् पुत्राणाममितौजसाम्॥ ५२<br>नीपा इति समाख्याता राजानः सर्व एव ते।<br>तेषां वंशकरः श्रीमान्नीपानां कीर्तिवर्धनः॥ ५३<br>काव्याच्च समरो नाम सदेष्टसमरोऽभवत्।<br>समरस्य पारसम्पारौ सदश्व इति ते त्रयः॥ ५४<br>पुत्राः सर्वगुणोपेता जाता वै विश्रुता भुवि।<br>पारपुत्रः पृथुर्जातः पृथोस्तु सुकृतोऽभवत्॥ ५५ | ये सभी उरुक्षव कहलाते हैं और अन्तमें ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये थे। काव्यके वंशधरों ( भार्गव गोत्र-प्रवरों)-में ये तीनों महर्षि कहे गये हैं। इस प्रकार गर्ग, संकृति और कविके वंशमें उत्पन्न हुए लोग क्षत्रियांशसे युक्त ब्राह्मण थे। अङ्गिरागोत्रीय बृहत्क्षत्रने भी इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीका शासन किया था। बृहत्क्षत्रका हस्ति नामक पुत्र हुआ। उसीने पूर्वकालमें इस हस्तिनापुर नामक नगरको बसाया था। हस्तीके अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ नामक तीन परम कीर्तिशाली पुत्र हुए। अजमीढकी तीन पत्नियाँ थीं, जो कुरुकुलमें उत्पन्न हुई थीं। वे नीलिनी, धूमिनी और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं। अजमीढने उनके गर्भसे अनेकों पुत्रोंको पैदा किया था, जो सभी देवताओंके समान वर्चस्वी, महान् तेजस्वी और धर्मात्मा थे। वे अपने वृद्ध पिताकी तपस्याके अन्तमें महर्षि भारद्वाजकी कृपासे उत्पन्न हुए थे। उनका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त मुझसे सुनिये॥ ३४-४५ १/२ ॥<br>अजमीढके केशिनीके गर्भसे कण्व नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मेधातिथि हुआ। उससे काण्वायन ब्राह्मणोंकी* उत्पत्ति हुई। भूमिनी (धूमिनी)-के गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें राजा बृहदनुका जन्म हुआ। बृहदनुका पुत्र बृहन्त, बृहन्तका पुत्र बृहन्मना और बृहन्मनाका पुत्र बृहद्धनु नामसे विख्यात हुआ। बृहद्धनुका पुत्र बृहदिषु और उसका पुत्र जयद्रथ हुआ। उसका पुत्र अश्वजित् और उसका पुत्र सेनजित् हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काव्य, राजा दृढरथ और राजा वत्सावर्तक—ये चार लोकविख्यात पुत्र हुए। इनमें वत्सावर्तकके वंशधर परिवत्सक नामसे कहे जाते हैं। रुचिराश्वका पुत्र महायशस्वी पृथुसेन हुआ। पृथुसेनसे पौरका और पौरसे नीपका जन्म हुआ। नीपके अमित तेजस्वी पुत्रोंकी संख्या एक सौ थी। वे सभी राजा थे और नीप नामसे ही विख्यात थे। काव्यसे समर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो उन नीपवंशियोंका वंशप्रवर्तक, लक्ष्मीसे युक्त और कीर्तिवर्धक था। वह समरके लिये सदा प्रयत्नशील रहता था। समरके पार, सम्पार और सदश्व—ये तीन पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न तथा भूतलपर विख्यात थे। पारका पुत्र पृथु हुआ और पृथुसे सुकृतकी उत्पत्ति हुई। |
* विशेष द्रष्टव्य—ऋग्वेदसंहिता— ८। ५५। ४, ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड, भागवत १२। १। ४९ तथा पुनः मत्स्यपुराण १९१। २६।
५१ अग्नि-वंशका वर्णन तथा उनके भेदोपभेदका कथन
| * अध्याय ४९ * | १९९ |
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| जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्य चात्मजः।<br>विभ्राजस्य तु दायादस्त्वणुहो नाम वीर्यवान्॥ ५६<br>बभूव शुकजामाता कृत्वीभर्ता महायशाः।<br>अणुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महीपतिः॥ ५७<br>युगदत्तः सुतस्तस्य विष्वक्सेनो महायशाः।<br>विभ्राजः पुनराजातो सुकृतेनेह कर्मणा॥ ५८<br>विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह।<br>भल्लाटस्तस्य पुत्रस्तु तस्यासीज्जनमेजयः।<br>उग्रायुधेन तस्यार्थे सर्वे नीपाः प्रणाशिताः॥ ५९ | उससे सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न विभ्राज नामक पुत्र पैदा हुआ। विभ्राजका पुत्र महायशस्वी एवं पराक्रमी अणुह हुआ, जो शुकदेवजीका जामाता एवं कृत्वीका पति था। अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त हुआ। उसका पुत्र युगदत्त और युगदत्तका पुत्र महायशस्वी विष्वक्सेन हुआ। अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप राजा विभ्राजने ही पुनः विष्वक्सेनरूपसे जन्म धारण किया था। विष्वक्सेनका पुत्र उदक्सेन हुआ। उसका पुत्र भल्लाट* और उसका पुत्र जनमेजय (द्वितीय) हुआ। इसी जनमेजयकी रक्षाके लिये उग्रायुधने सभी नीपवंशी नरेशोंको मौतके घाट उतारा था॥ ४६—५९॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>उग्रायुधः कस्य सुतः कस्य वंशे स कथ्यते।<br>किमर्थं तेन ते नीपाः सर्वे चैव प्रणाशिताः॥ ६० | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! उग्रायुध किसका पुत्र था? वह किसके वंशमें उत्पन्न हुआ बतलाया जाता है? तथा किस कारण उसने समस्त नीपवंशी राजाओंका संहार किया था? (यह हमें बतलाइये)॥ ६०॥ |
| सूत उवाच<br>उग्रायुधः सूर्यवंश्यस्तपस्तेपे वराश्रमे।<br>स्थाणुभूतोऽष्टसाहस्रं तं भेजे जनमेजयः॥ ६१<br><br>तस्य राज्यं प्रतिश्रुत्य नीपानाजघ्निवान् प्रभुः।<br>उवाच सान्त्वं विविधं जघ्नुस्ते वै ह्युभावपि॥ ६२<br><br>हन्यमानांश्च तांश्चैव यस्माद्धेतोर्न मे वचः।<br>शरणागतरक्षार्थं तस्मादेवं शपामि वः॥ ६३<br><br>यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं सर्वान् नयतु वो यमः।<br>ततस्तान् कृष्यमाणांस्तु यमेन पुरतः स तु॥ ६४<br><br>कृपया परयाऽऽविष्टो जनमेजयमूचिवान्।<br>गतानेतानिमान् वीरांस्त्वं मे रक्षितुमर्हसि॥ ६५ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उग्रायुध सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। इन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रममें जाकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो आठ हजार वर्षोंतक घोर तप किया। उसी समय (युद्धमें पराजित हुए) राजा जनमेजय उनके पास पहुँचे। (जनमेजयकी प्रार्थनापर) उन्हें राज्य दिलानेकी प्रतिज्ञा करके सामर्थ्यशाली उग्रायुधने नीपवंशियोंका संहार किया था। प्रथमतस्तु उग्रायुधने उन्हें अनेक प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेकी चेष्टा की, किंतु जब वे (इनकी बात न मानकर) इन्हीं दोनोंको मार डालनेके लिये उतारू हो गये, तब मारनेके लिये उद्यत हुए उनसे उग्रायुधने कहा—'जिस कारण तुमलोग मेरी बातको अनसुनी कर रहे हो, इसीलिये शरणागतकी रक्षाके हेतु मैं तुमलोगोंको इस प्रकारका शाप दे रहा हूँ कि यदि मैंने तपका अनुष्ठान किया है तो यमराज तुम सबको अपने घर उठा ले जायँ।' तदनन्तर अपने सामने ही उन्हें यमराजद्वारा घसीटा जाता हुआ देखकर उग्रायुधके हृदयमें अतिशय दया उत्पन्न हो गयी। तब उन्होंने जनमेजयसे कहा—'जनमेजय! तुम मेरे कहनेसे इन ले जाये गये हुए तथा ले जाये जाते हुए वीरोंकी रक्षा करो'॥ ६१—६५॥ |
| जनमेजय उवाच<br>अरे पापा दुराचारा भवितारोऽस्य किंकराः।<br>तथेत्युक्तस्ततो राजा यमेन युयुधे चिरम्॥ ६६ | **जनमेजय बोले—**अरे पापी एवं दुराचारी यमदूतो! तुमलोग दण्डके भागी होओगे, अन्यथा उन्हें छोड़ दो। यमदूतोंद्वारा भी उसी प्रकारका उत्तर दिये जानेपर राजा जनमेजयने यमके साथ चिरकालतक युद्ध किया। |
* इसने भल्लाटनगर (सुलेमानपर्वतके पासका एक शहर) बसाया, जहाँका राजा शशिध्वज (कल्किपुराण, अ० २१-२२) प्रसिद्ध था।
| २०० | * मत्स्यपुराण * |
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| व्याधिभिर्नारकैर्घोरैर्यमेन सह तान् बलात्।<br>विजित्य मुनये प्रादात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७<br><br>यमस्तुष्टस्ततस्तस्मै मुक्तिज्ञानं ददौ परम्।<br>सर्वे यथोचितं कृत्वा जग्मुस्ते कृष्णमव्ययम्॥ ६८<br><br>येषां तु चरितं गृह्य हन्यते नापमृत्युभिः।<br>इह लोके परे चैव सुखमक्षय्यमश्नुते॥ ६९<br><br>अजमीढस्य धूमिन्द्यां विद्वाञ्जज्ञे यवीनरः।<br>धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिः स्मृतः।<br>अथ सत्यधृतेः पुत्रो दृढनेमिः प्रतापवान्॥ ७०<br><br>दृढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः।<br>आसीत् सुधर्मतनयः सार्वभौमः प्रतापवान्॥ ७१<br><br>सार्वभौमेति विख्यातः पृथिव्यामेकराड् बभौ।<br>तस्यान्ववाये महति महापौरवनन्दनः॥ ७२<br><br>महापौरवपुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः।<br>अथ रुक्मरथस्यासीत् सुपार्श्वो नाम पार्थिवः॥ ७३<br><br>सुपार्श्वतनयश्चापि सुमतिर्नाम धार्मिकः।<br>सुमतेरपि धर्मात्मा राजा संनतिमानपि॥ ७४<br><br>तस्यासीत् संनतिमतः कृतो नाम सुतो महान्।<br>हिरण्यनाभिनः शिष्यः कौसल्यस्य¹ महात्मनः॥ ७५<br><br>चतुर्विंशतिधा येन प्रोक्ता वै सामसंहिताः।<br>स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्ता नामेह सामगाः॥ ७६<br><br>कार्तिकृद्रायुधोऽसौ वै महापौरववर्धनः।<br>बभूव येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः॥ ७७<br><br>नीलो नाम महाराजः पाञ्चालाधिपतिर्वशी।<br>उग्रायुधस्य दायादः क्षेमो नाम महायशाः॥ ७८<br><br>क्षेमात् सुनीथः सञ्जज्ञे सुनीथस्य नृपञ्जयः।<br>नृपञ्जयाच्च विरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः॥ ७९ | अन्ततोगत्वा उन्होंने भयंकर नारकीय व्याधियोंके साथ उन सबको बलपूर्वक जीतकर यमराजसहित उन्हें उग्रायुध मुनिको समर्पित कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। इससे प्रसन्न हुए यमराजने राजा जनमेजयको मुक्तिका उत्तम ज्ञान प्रदान किया। तत्पश्चात् वे सभी यथोचित धर्मकार्य कर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो गये। इन नरेशोंके जीवन-चरितको जान लेनेपर मनुष्य अपमृत्यु आदिका शिकार नहीं होता। उसे इस लोक और परलोकमें अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है॥ ६६-६९॥<br><br>धूम्रिनीके गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें विद्वान् यवीनरका जन्म हुआ। उसका पुत्र धृतिमान् हुआ और उसका पुत्र सत्यधृति कहा जाता है। सत्यधृतिका पुत्र प्रतापी दृढनेमि हुआ। दृढनेमिका पुत्र सुधर्मा नामक भूपाल हुआ। सुधर्माका पुत्र प्रतापी सार्वभौम था, जो भूतलपर एकच्छत्र चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें सुशोभित हुआ। उसके उस विशाल वंशमें एक महापौरव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा रुक्मरथ महापौरवके पुत्र कहे गये हैं। रुक्मरथका पुत्र सुपार्श्व नामका राजा हुआ। सुपार्श्वका पुत्र धर्मात्मा सुमति हुआ। सुमतिका पुत्र धर्मात्मा राजा संनतिमान् था। उस संनतिमान्का कृत नामक महान् प्रतापी पुत्र था, जो महात्मा हिरण्यनाभ कौसल्य (कौथुम²)—का शिष्य हुआ। इसी राजाने सामवेदकी संहिताओंको चौबीस भागोंमें विभक्त किया, जो प्राच्यसामके नामसे प्रसिद्ध हुई तथा उन साम-संहिताओंका गान करनेवाले कार्त नामसे कहे जाने लगे। ये उग्रायुध इसी कृतके पुत्र थे, जो पौरववंशकी विशेषरूपसे वृद्धि करनेवाले थे। इन्होंने ही पराक्रम प्रकट करके पृथुकके पिता पाञ्चाल-नरेश जितेन्द्रिय महाराज नीलका वध किया था। उग्रायुधका पुत्र महायशस्वी क्षेम हुआ। क्षेमसे सुनीथका और सुनीथसे नृपञ्जयका जन्म हुआ। नृपञ्जयसे विरथकी उत्पत्ति हुई। ये सभी नरेश पौरवनामसे विख्यात हुए॥ ७०-७९॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे पौरववंशकीर्तनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पौरव-वंश-कीर्तन नामक उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४९॥
१. वायुपुराण ९९। १०० में यहाँ 'कौथुम' पाठ है। सामवेदियोंकी कौथुमी संहिता प्रसिद्ध है।
२. यहाँ सामवेद-संहिताके इतिहासकी एकसे चौबीस (तथा पुनः एक हजार शाखा होनेकी) बड़ी रहस्यात्मक बात कही गयी है। कार्त शाखाका उल्लेख सभी चरणव्यूहोंमें भी है। इसी प्रकार वायु ५९-६१ तथा ब्रह्माण्ड २। ३८-४१ में भी वेदोंका सच्चा एवं विस्तृत इतिहास है। २४ सामशाखाएँ चरणव्यूह आदिमें यों निर्दिष्ट हैं—१-वार्त्तान्तरेय, २-राणायनीय, ३-शाट्यायनीय, ४-आसुरायणीय, ५-वासुरायणीय, ६-प्राचीनयोग, ७-प्राञ्जल ऋग्, ८-साध्यमुद्गल, ९-खल्वल, १०-महाखल्वल, ११-माङ्गल, १२-कौथुम, १३-गौतम, १४-जैमिनीय, १५-सुपर्ण, १६-बालखिल्य, १७-सान्त्यमुग्र, १८-कालेय, १९-महाकालेय, २०-लाङ्गलायन, २१-शार्दूल, २२-तातायन, २३-नैगमीय और २४-पावमान।
| * अध्याय ५० * | २०१ |
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पचासवाँ अध्याय
पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास
| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अजमीढकी नीलिनी नामकी पत्नीके गर्भसे राजा नीलका$^१$ जन्म हुआ। नीलकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप सुशान्तिकी उत्पत्ति हुई। सुशान्तिसे पुरुजानुका और पुरुजानुसे पृथुका जन्म हुआ। पृथुका पुत्र भद्राश्व हुआ। अब भद्राश्वके पुत्रोंके विषयमें सुनिये—मुद्गल, जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी जवीनर और पाँचवाँ कपिल—ये पाँचों भद्राश्वके पुत्र थे। इन पाँचोंके द्वारा शासित जनपद पञ्चाल$^२$ नामसे प्रसिद्ध हुए। ये सभी पञ्चाल देशोंके रक्षक थे—ऐसा हमलोगोंने सुना है। मुद्गलके पुत्रगण, जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विजाति थे, मौद्गल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। ये कण्व और मुद्गलके गोत्रमें उत्पन्न होनेवाले द्विजाति अङ्गिराके पक्षमें सम्मिलित हो गये। महायशस्वी ब्रह्मिष्ठने मुद्गलके पुत्ररूपमें जन्म लिया। उसका पुत्र इन्द्रसेन और उसका पुत्र विन्ध्याश्व हुआ। विन्ध्याश्वके संयोगसे मेनकाके गर्भसे जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी—ऐसा सुना जाता है। उनमें एक तो राजर्षि दिवोदास थे और दूसरी यशस्विनी अहल्या थी। अहल्याने शरद्वान् गौतमके पुत्र ऋषिश्रेष्ठ शतानन्दको उत्पन्न किया था। शतानन्दका पुत्र महातपस्वी एवं धनुर्वेदका पारंगत विद्वान् सत्यधृति हुआ। धर्मात्मा सत्यधृतिका वीर्य अमोघ था। एक बार एक अप्सराको देखकर सत्यधृतिका वीर्य (सरोवरमें स्नान करते समय) जलमें स्खलित हो गया। उस वीर्यसे उस सरोवरमें जुड़वीं संतान उत्पन्न हो गयी। वे उसी सरोवरमें पल रहे थे। एक बार महाराज शांतनु शिकारके लिये निकले हुए थे। वे उस सरोवरमें घूमते हुए उन बच्चोंको देखकर कृपा-परवश हो उन्हें उठा लाये। इस प्रकार मैंने शरद्वान्के उन पुत्रोंका जो गौतम (गोत्र) नामसे विख्यात हैं, वर्णन कर दिया। अब इसके आगे दिवोदासकी संततिका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये॥ १—१२॥ | | अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः।<br>नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुदपद्यत॥ १<br>पुरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरुजानुतः।<br>भद्राश्वः पृथुदायादो भद्राश्वतनयाञ्छृणु॥ २<br>मुद्गलश्च जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा।<br>जवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः॥ ३<br>पञ्चानां चैव पञ्चालानेताञ्जनपदान् विदुः।<br>पञ्चालरक्षिणो ह्येते देशानामिति नः श्रुतम्॥ ४<br>मुद्गलस्यापि मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>एते ह्यङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः काण्वमुद्गलाः॥ ५<br>मुद्गलस्य सुतो जज्ञे ब्रह्मिष्ठः सुमहाद्यशाः।<br>इन्द्रसेनः सुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>विन्ध्याश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः।<br>दिवोदासश्च राजर्षिरहल्या च यशस्विनी॥ ७<br>शरद्वतस्तु दायादमहल्या सम्प्रसूयत।<br>शतानन्दमृषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहातपाः॥ ८<br>सुतः सत्यधृतिर्नाम धनुर्वेदस्य पारगः।<br>आसीत् सत्यधृतेः शुक्रममोघं धार्मिकस्य तु॥ ९<br>स्कन्नं रेतः सत्यधृतेर्दृष्ट्वा चाप्सरसं जले।<br>मिथुनं तत्र सम्भूतं तस्मिन् सरसि सम्भृतम्॥ १०<br>ततः सरसि तस्मिंस्तु क्रममाणं महीपतिः।<br>दृष्ट्वा जग्राह कृपया शान्तनुर्मृगयां गतः॥ ११<br>एते शरदतः पुत्रा आख्याता गौतमा वराः।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य वै प्रजाः॥ १२ | |
१. यह नील राजाकी चर्चा गत अध्यायके अन्तमें ७८ वें श्लोकमें भी है। ये उनसे भिन्न हैं।
२. यह रुहेलखण्ड है, जो दिल्लीसे पूर्व गङ्गाके उत्तर तथा दक्षिणमें चम्बल नदीके तटतक फैला है। ये दक्षिण और उत्तर पञ्चालके नामसे प्रसिद्ध हैं। उत्तर पञ्चालकी राजधानी अहिच्छत्र (रामनगर) तथा दक्षिण पञ्चालकी राजधानी कम्पिल और माकंद थी। (द्रष्टव्य- महाभारत आदि० १४०, उद्योग० १९३, गर्गसंहिता १३९ आदि) गौतमबुद्धके समय उत्तर पञ्चालकी राजधानी कन्नौज भी रहा। राइस् डेविड्स। 'Buddhist India'.
२०२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दिवोदासस्य दायादो धर्मिष्ठो मित्रयुर्नृपः।<br>मैत्रायणावरः सोऽथ मैत्रेयस्तु ततः स्मृतः॥ १३<br>एते वंश्य यतेः पक्षाः क्षत्रोपेतास्तु भार्गवाः।<br>राजा चैद्यवरो नाम मैत्रेयस्य सुतः स्मृतः॥ १४<br>अथ चैद्यवराद् विद्वान् सुदासस्तस्य चात्मजः।<br>अजमीढः पुनर्जातः क्षीणे वंशे तु सोमकः॥ १५<br>सोमकस्य सुतो जन्तुर्हते तस्मिञ्शतं बभौ।<br>पुत्राणामजमीढस्य सोमकस्य महात्मनः॥ १६<br>महिषी त्वजमीढस्य धूमिनी पुत्रवर्धिनी।<br>पुत्राभावे तपस्तेपे शतं वर्षाणि दुश्चरम्॥ १७<br>हुत्वाग्निं विधिवत् सम्यक् पवित्रीकृतभोजना।<br>अग्निहोत्रक्रमेणैव सा सुष्वाप महाव्रता॥ १८<br>तस्यां वै धूम्रवर्णायामजमीढः समीयिवान्।<br>ऋक्षं सा जनयामास धूमवर्णं शताग्रजम्॥ १९<br>ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् ततः।<br>यः प्रयागमतिक्रम्य कुरुक्षेत्रमकल्पयत्॥ २०<br>कृषतस्तु महाराजो वर्षाणि सुबहून्यथ।<br>कृष्यमाणस्ततः शक्रो भयात् तस्मै वरं ददौ॥ २१<br>पुण्यं च रमणीयं च कुरुक्षेत्रं तु तत् स्मृतम्।<br>तस्यान्ववायः सुमहान् यस्य नाम्ना तु कौरवाः॥ २२ | दिवोदासका ज्येष्ठ पुत्र धर्मिष्ठ राजा मित्रयु हुआ। तत्पश्चात् उससे छोटे मैत्रायण और उसके बाद मैत्रेयकी उत्पत्ति हुई। ये सभी पुत्र (ययातिके भाई) यतिके पक्षके थे और क्षत्रियांशसे युक्त भार्गव (भृगुवंशी) कहलाते थे। राजा चैद्यवर मैत्रेयके पुत्र कहे जाते हैं। चैद्यवरसे विद्वान् सुदासका जन्म हुआ। वंशके नष्ट हो जानेपर पुनः अजमीढ सुदासके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुए। इन्हींका दूसरा नाम सोमक भी है। सोमकका पुत्र जन्तु हुआ। उसके मारे जानेपर महात्मा अजमीढ सोमकके सौ पुत्र हुए। अजमीढकी धूमिनी नामकी पत्नी थी, जो पुत्रोंकी वृद्धि करनेवाली थी। जन्तुके मारे जानेसे पुत्रका अभाव हो जानेपर वह सौ वर्षोंतक दुष्कर तपस्यामें संलग्न हो गयी। एक समय भलीभाँति पवित्र किये हुए पदार्थोंको ही भोजन करनेवाली महान् व्रतपरायणा धूमिनी अग्निहोत्रके क्रमसे विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके नींदके वशीभूत हो गयी। निरन्तर अग्निहोत्र करनेके कारण उसके शरीरका रंग धूमिल पड़ गया था। उसी समय अजमीढने उसमें गर्भाधान किया। उस गर्भसे धूमिनीने ऋक्ष नामक पुत्रको जन्म दिया, जो अपने सौ भाइयोंमें ज्येष्ठ था तथा जिसके शरीरका रंग धूम-वर्णका था। ऋक्षसे संवरणकी और संवरणसे कुरुकी उत्पत्ति हुई, जिन्होंने प्रयागका अतिक्रमण कर कुरुक्षेत्रकी तीर्थरूपमें कल्पना की थी। महाराज कुरु अनेकों वर्षोंतक इस कुरुक्षेत्रको अपने हाथों जोतते रहे। उन्हें इस प्रकार जोतते देखकर इन्द्रने भयभीत हो उन्हें वर प्रदान किया। इसी कारण कुरुक्षेत्र पुण्यप्रद और रमणीय क्षेत्र कहा जाता है। उन महाराज कुरुका वंश अत्यन्त विशाल था, जो उन्हींके नामसे (आगे चलकर) कौरव कहलाया॥ १३—२२॥ |
| कुरोस्तु दयिताः पुत्राः सुधन्वा जहुरेव च।<br>परीक्षिच्च महातेजाः प्रजनश्चारिमर्दनः॥ २३<br>सुधन्वनस्तु दायादः पुत्रो मतिमतां वरः।<br>च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित्॥ २४<br>च्यवनस्य कृमिः पुत्र ऋक्षाज्जज्ञे महातपाः।<br>कृमेः पुत्रो महावीर्यः ख्यातस्त्विन्द्रसमो विभुः॥ २५<br>चैद्योपरिचरो वीरो वसुर्नामान्तरिक्षगः।<br>चैद्योपरिचराज्जज्ञे गिरिका सप्त वै सुतान्॥ २६ | कुरुके सुधन्वा, जह्नु, महातेजस्वी परीक्षित् और शत्रुविनाशक प्रजन—ये चार परम प्रिय पुत्र हुए। सुधन्वाका पुत्र राजा च्यवन हुआ, जो बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ एवं धर्म और अर्थके तत्त्वका ज्ञाता था। च्यवनका पुत्र कृमि हुआ, जो ऋक्षसे उत्पन्न हुआ था। (इन्हीं) कृमिके पुत्र महापराक्रमी चैद्योपरिचर वसु हुए। वे प्रभावशाली, शूरवीर, इन्द्रके समान विख्यात और (सदा विमानद्वारा) आकाशमें गमन करनेवाले थे। चैद्योपरिचरके संयोगसे गिरिकाने सात |
५२ कर्मयोगकी महत्ता
| * अध्याय ५० * | २०३ |
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| महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः ।<br>प्रत्यश्रवाः कुशश्चैव चतुर्थो हरिवाहनः ॥ २७<br>पञ्चमश्च यजुश्चैव मत्स्यः काली च सप्तमी ।<br>बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः ॥ २८<br>कुशाग्रस्यात्मजश्चैव वृषभो नाम वीर्यवान् ।<br>वृषभस्य तु दायादः पुण्यवान् नाम पार्थिवः ॥ २९<br>पुण्यः पुण्यवतश्चैव राजा सत्यधृतिस्ततः ।<br>दायादस्तस्य धनुषस्तस्मात् सर्वश्व जज्ञिवान् ॥ ३०<br>सर्वस्य सम्भवः पुत्रस्तस्माद् राजा बृहद्रथः ।<br>द्वे तस्य शकले जाते जरया संधितश्च सः ॥ ३१<br>जरया संधितो यस्माज्जरासंधस्ततः स्मृतः ।<br>जेता सर्वस्य क्षत्रस्य जरासंधो महाबलः ॥ ३२<br>जरासंधस्य पुत्रस्तु सहदेवः प्रतापवान् ।<br>सहदेवात्मजः श्रीमान् सोमवित् स महातपाः ॥ ३३<br>श्रुतश्रवास्तु सोमाद् वै मागधाः परिकीर्तिताः ।<br>जह्नुस्त्वजनयत् पुत्रं सुरथं नाम भूमिपम् ॥ ३४ | संतानोंको जन्म दिया। इनमें पहला महारथी मगधराज था, जो बृहद्रथ नामसे विख्यात हुआ। उसके बाद दूसरा प्रत्यश्रवा, तीसरा कुश, चौथा हरिवाहन, पाँचवाँ यजुष् और छठा मत्स्य नामसे प्रसिद्ध हुआ। सातवीं संतान काली नामकी कन्या थी। बृहद्रथका पुत्र कुशाग्र नामसे विख्यात हुआ। कुशाग्रका पुत्र पराक्रमी वृषभ हुआ। वृषभका पुत्र राजा पुण्यवान् था। पुण्यवान्से पुण्य और उससे राजा सत्यधृतिका जन्म हुआ। उसका पुत्र धनुष हुआ और उससे सर्वकी उत्पत्ति हुई। सर्वका पुत्र सम्भव हुआ और उससे राजा बृहद्रथका जन्म हुआ। बृहद्रथका पुत्र दो टुकड़ेके रूपमें उत्पन्न हुआ, जिन्हें जरानामकी राक्षसीने जोड़ दिया था। जराद्वारा जोड़ दिये जानेके कारण वह जरासंध नामसे विख्यात हुआ। महाबली जरासंध अपने समयके समस्त क्षत्रियोंका विजेता था। जरासंधका पुत्र प्रतापी सहदेव हुआ। सहदेवका पुत्र लक्ष्मीवान् एवं महातपस्वी सोमवित् हुआ। सोमवित्से श्रुतश्रवाकी उत्पत्ति हुई। (मगधपर शासन करनेके कारण) ये सभी नरेश मागध नामसे विख्यात हुए॥ २३—३३ १/२ ॥<br><br>जह्नुने सुरथ नामक भूपालको पुत्ररूपमें जन्म दिया। | | सुरथस्य तु दायादो वीरो राजा विदूरथः ।<br>विदूरथसुतश्चापि सार्वभौम इति स्मृतः ॥ ३५<br>सार्वभौमाज्जयत्सेनो रुचिरस्तस्य चात्मजः ।<br>रुचिरस्य सुतो भौमस्त्वरितायुस्ततोऽभवत् ॥ ३६<br>अक्रोधनस्त्वायुसुतस्तस्माद् देवातिथिः स्मृतः ।<br>देवातिथेस्तु दायादो दक्ष एव बभूव ह ॥ ३७<br>भीमसेनस्ततो दक्षाद् दिलीपस्तस्य चात्मजः ।<br>दिलीपस्य प्रतीपस्तु तस्य पुत्रास्त्रयः स्मृताः ॥ ३८<br>देवापिः शांतनुश्चैव बाह्लीकश्चैव ते त्रयः ।<br>बाह्लीकस्य तु दायादाः सप्त बाह्लीश्वरा नृपाः ।<br>देवापिस्तु ह्यपध्यातः प्रजाभिरभवन्मुनिः ॥ ३९ | सुरथका पुत्र वीरवर राजा विदूरथ हुआ। विदूरथका पुत्र सार्वभौम कहा गया है। सार्वभौमसे जयत्सेन उत्पन्न हुआ और उसका पुत्र रुचिर हुआ। रुचिरसे भौमका और उससे त्वरितायुका जन्म हुआ। त्वरितायुका पुत्र अक्रोधन और उससे देवातिथिकी उत्पत्ति बतलायी जाती है। देवातिथिका एकमात्र पुत्र दक्ष ही था। दक्षसे भीमसेनका जन्म हुआ और उसका पुत्र (पुरुवंशी) दिलीप तथा दिलीपका पुत्र प्रतीप हुआ। प्रतीपके तीन पुत्र कहे जाते हैं, ये तीनों देवापि, शांतनु और बाह्लीक हैं। बाह्लीकके सात पुत्र थे, जो सभी राजा थे और बाह्लीक (बल्ख) देशके अधीश्वर थे। देवापिको प्रजाओंने दोषी ठहरा दिया था; इसलिये वह राजपाट छोड़कर मुनि हो गया॥ ३४—३९॥ | | ऋषय ऊचुः<br>प्रजाभिस्तु किमर्थं वै ह्यपध्यातो जनेश्वरः ।<br>को दोषो राजपुत्रस्य प्रजाभिः समुदाहृतः ॥ ४० | ऋषियोंने पूछा— सूतजी! प्रजाओंने राजा देवापिको किस कारण दोषी ठहराया था? तथा प्रजाओंने उस राजकुमारका कौन-सा दोष प्रकट किया था ? ॥ ४० ॥ | | सूत उवाच<br>किलासीद् राजपुत्रस्तु कुष्ठी तं नाभ्यपूजयन् ।<br>भविष्यं कीर्तयिष्यामि शांतनोस्तु निबोधत ॥ ४१ | सूतजी कहते हैं— ऋषियो! राजकुमार देवापि कुष्ठ-रोगी था, इसीलिये प्रजाओंने उसका आदर-सत्कार नहीं किया। अब मैं शांतनुके भविष्यका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये। |