भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 210
२००* मत्स्यपुराण *

| व्याधिभिर्नारकैर्घोरैर्यमेन सह तान् बलात्।<br>विजित्य मुनये प्रादात् तदद्भुतमिवाभवत्॥ ६७<br><br>यमस्तुष्टस्ततस्तस्मै मुक्तिज्ञानं ददौ परम्।<br>सर्वे यथोचितं कृत्वा जग्मुस्ते कृष्णमव्ययम्॥ ६८<br><br>येषां तु चरितं गृह्य हन्यते नापमृत्युभिः।<br>इह लोके परे चैव सुखमक्षय्यमश्नुते॥ ६९<br><br>अजमीढस्य धूमिन्द्यां विद्वाञ्जज्ञे यवीनरः।<br>धृतिमांस्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधृतिः स्मृतः।<br>अथ सत्यधृतेः पुत्रो दृढनेमिः प्रतापवान्॥ ७०<br><br>दृढनेमिसुतश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिवः।<br>आसीत् सुधर्मतनयः सार्वभौमः प्रतापवान्॥ ७१<br><br>सार्वभौमेति विख्यातः पृथिव्यामेकराड् बभौ।<br>तस्यान्ववाये महति महापौरवनन्दनः॥ ७२<br><br>महापौरवपुत्रस्तु राजा रुक्मरथः स्मृतः।<br>अथ रुक्मरथस्यासीत् सुपार्श्वो नाम पार्थिवः॥ ७३<br><br>सुपार्श्वतनयश्चापि सुमतिर्नाम धार्मिकः।<br>सुमतेरपि धर्मात्मा राजा संनतिमानपि॥ ७४<br><br>तस्यासीत् संनतिमतः कृतो नाम सुतो महान्।<br>हिरण्यनाभिनः शिष्यः कौसल्यस्य¹ महात्मनः॥ ७५<br><br>चतुर्विंशतिधा येन प्रोक्ता वै सामसंहिताः।<br>स्मृतास्ते प्राच्यसामानः कार्ता नामेह सामगाः॥ ७६<br><br>कार्तिकृद्रायुधोऽसौ वै महापौरववर्धनः।<br>बभूव येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः॥ ७७<br><br>नीलो नाम महाराजः पाञ्चालाधिपतिर्वशी।<br>उग्रायुधस्य दायादः क्षेमो नाम महायशाः॥ ७८<br><br>क्षेमात् सुनीथः सञ्जज्ञे सुनीथस्य नृपञ्जयः।<br>नृपञ्जयाच्च विरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः॥ ७९ | अन्ततोगत्वा उन्होंने भयंकर नारकीय व्याधियोंके साथ उन सबको बलपूर्वक जीतकर यमराजसहित उन्हें उग्रायुध मुनिको समर्पित कर दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई। इससे प्रसन्न हुए यमराजने राजा जनमेजयको मुक्तिका उत्तम ज्ञान प्रदान किया। तत्पश्चात् वे सभी यथोचित धर्मकार्य कर अविनाशी भगवान् श्रीकृष्णमें लीन हो गये। इन नरेशोंके जीवन-चरितको जान लेनेपर मनुष्य अपमृत्यु आदिका शिकार नहीं होता। उसे इस लोक और परलोकमें अक्षय सुखकी प्राप्ति होती है॥ ६६-६९॥<br><br>धूम्रिनीके गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें विद्वान् यवीनरका जन्म हुआ। उसका पुत्र धृतिमान् हुआ और उसका पुत्र सत्यधृति कहा जाता है। सत्यधृतिका पुत्र प्रतापी दृढनेमि हुआ। दृढनेमिका पुत्र सुधर्मा नामक भूपाल हुआ। सुधर्माका पुत्र प्रतापी सार्वभौम था, जो भूतलपर एकच्छत्र चक्रवर्ती सम्राट्के रूपमें सुशोभित हुआ। उसके उस विशाल वंशमें एक महापौरव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा रुक्मरथ महापौरवके पुत्र कहे गये हैं। रुक्मरथका पुत्र सुपार्श्व नामका राजा हुआ। सुपार्श्वका पुत्र धर्मात्मा सुमति हुआ। सुमतिका पुत्र धर्मात्मा राजा संनतिमान् था। उस संनतिमान्का कृत नामक महान् प्रतापी पुत्र था, जो महात्मा हिरण्यनाभ कौसल्य (कौथुम²)—का शिष्य हुआ। इसी राजाने सामवेदकी संहिताओंको चौबीस भागोंमें विभक्त किया, जो प्राच्यसामके नामसे प्रसिद्ध हुई तथा उन साम-संहिताओंका गान करनेवाले कार्त नामसे कहे जाने लगे। ये उग्रायुध इसी कृतके पुत्र थे, जो पौरववंशकी विशेषरूपसे वृद्धि करनेवाले थे। इन्होंने ही पराक्रम प्रकट करके पृथुकके पिता पाञ्चाल-नरेश जितेन्द्रिय महाराज नीलका वध किया था। उग्रायुधका पुत्र महायशस्वी क्षेम हुआ। क्षेमसे सुनीथका और सुनीथसे नृपञ्जयका जन्म हुआ। नृपञ्जयसे विरथकी उत्पत्ति हुई। ये सभी नरेश पौरवनामसे विख्यात हुए॥ ७०-७९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे सोमवंशे पौरववंशकीर्तनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ४९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोमवंश-वर्णन-प्रसङ्गमें पौरव-वंश-कीर्तन नामक उनचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ४९॥


१. वायुपुराण ९९। १०० में यहाँ 'कौथुम' पाठ है। सामवेदियोंकी कौथुमी संहिता प्रसिद्ध है।
२. यहाँ सामवेद-संहिताके इतिहासकी एकसे चौबीस (तथा पुनः एक हजार शाखा होनेकी) बड़ी रहस्यात्मक बात कही गयी है। कार्त शाखाका उल्लेख सभी चरणव्यूहोंमें भी है। इसी प्रकार वायु ५९-६१ तथा ब्रह्माण्ड २। ३८-४१ में भी वेदोंका सच्चा एवं विस्तृत इतिहास है। २४ सामशाखाएँ चरणव्यूह आदिमें यों निर्दिष्ट हैं—१-वार्त्तान्तरेय, २-राणायनीय, ३-शाट्यायनीय, ४-आसुरायणीय, ५-वासुरायणीय, ६-प्राचीनयोग, ७-प्राञ्जल ऋग्, ८-साध्यमुद्गल, ९-खल्वल, १०-महाखल्वल, ११-माङ्गल, १२-कौथुम, १३-गौतम, १४-जैमिनीय, १५-सुपर्ण, १६-बालखिल्य, १७-सान्त्यमुग्र, १८-कालेय, १९-महाकालेय, २०-लाङ्गलायन, २१-शार्दूल, २२-तातायन, २३-नैगमीय और २४-पावमान।