मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 209, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 209
| * अध्याय ४९ * | १९९ |
|---|---|
| जज्ञे सर्वगुणोपेतो विभ्राजस्तस्य चात्मजः।<br>विभ्राजस्य तु दायादस्त्वणुहो नाम वीर्यवान्॥ ५६<br>बभूव शुकजामाता कृत्वीभर्ता महायशाः।<br>अणुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महीपतिः॥ ५७<br>युगदत्तः सुतस्तस्य विष्वक्सेनो महायशाः।<br>विभ्राजः पुनराजातो सुकृतेनेह कर्मणा॥ ५८<br>विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु उदक्सेनो बभूव ह।<br>भल्लाटस्तस्य पुत्रस्तु तस्यासीज्जनमेजयः।<br>उग्रायुधेन तस्यार्थे सर्वे नीपाः प्रणाशिताः॥ ५९ | उससे सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न विभ्राज नामक पुत्र पैदा हुआ। विभ्राजका पुत्र महायशस्वी एवं पराक्रमी अणुह हुआ, जो शुकदेवजीका जामाता एवं कृत्वीका पति था। अणुहका पुत्र राजा ब्रह्मदत्त हुआ। उसका पुत्र युगदत्त और युगदत्तका पुत्र महायशस्वी विष्वक्सेन हुआ। अपने पुण्यकर्मोंके फलस्वरूप राजा विभ्राजने ही पुनः विष्वक्सेनरूपसे जन्म धारण किया था। विष्वक्सेनका पुत्र उदक्सेन हुआ। उसका पुत्र भल्लाट* और उसका पुत्र जनमेजय (द्वितीय) हुआ। इसी जनमेजयकी रक्षाके लिये उग्रायुधने सभी नीपवंशी नरेशोंको मौतके घाट उतारा था॥ ४६—५९॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>उग्रायुधः कस्य सुतः कस्य वंशे स कथ्यते।<br>किमर्थं तेन ते नीपाः सर्वे चैव प्रणाशिताः॥ ६० | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! उग्रायुध किसका पुत्र था? वह किसके वंशमें उत्पन्न हुआ बतलाया जाता है? तथा किस कारण उसने समस्त नीपवंशी राजाओंका संहार किया था? (यह हमें बतलाइये)॥ ६०॥ |
| सूत उवाच<br>उग्रायुधः सूर्यवंश्यस्तपस्तेपे वराश्रमे।<br>स्थाणुभूतोऽष्टसाहस्रं तं भेजे जनमेजयः॥ ६१<br><br>तस्य राज्यं प्रतिश्रुत्य नीपानाजघ्निवान् प्रभुः।<br>उवाच सान्त्वं विविधं जघ्नुस्ते वै ह्युभावपि॥ ६२<br><br>हन्यमानांश्च तांश्चैव यस्माद्धेतोर्न मे वचः।<br>शरणागतरक्षार्थं तस्मादेवं शपामि वः॥ ६३<br><br>यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं सर्वान् नयतु वो यमः।<br>ततस्तान् कृष्यमाणांस्तु यमेन पुरतः स तु॥ ६४<br><br>कृपया परयाऽऽविष्टो जनमेजयमूचिवान्।<br>गतानेतानिमान् वीरांस्त्वं मे रक्षितुमर्हसि॥ ६५ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उग्रायुध सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। इन्होंने एक श्रेष्ठ आश्रममें जाकर स्थाणुकी भाँति स्थित हो आठ हजार वर्षोंतक घोर तप किया। उसी समय (युद्धमें पराजित हुए) राजा जनमेजय उनके पास पहुँचे। (जनमेजयकी प्रार्थनापर) उन्हें राज्य दिलानेकी प्रतिज्ञा करके सामर्थ्यशाली उग्रायुधने नीपवंशियोंका संहार किया था। प्रथमतस्तु उग्रायुधने उन्हें अनेक प्रकारके सान्त्वनापूर्ण वचनोंद्वारा समझाने-बुझानेकी चेष्टा की, किंतु जब वे (इनकी बात न मानकर) इन्हीं दोनोंको मार डालनेके लिये उतारू हो गये, तब मारनेके लिये उद्यत हुए उनसे उग्रायुधने कहा—'जिस कारण तुमलोग मेरी बातको अनसुनी कर रहे हो, इसीलिये शरणागतकी रक्षाके हेतु मैं तुमलोगोंको इस प्रकारका शाप दे रहा हूँ कि यदि मैंने तपका अनुष्ठान किया है तो यमराज तुम सबको अपने घर उठा ले जायँ।' तदनन्तर अपने सामने ही उन्हें यमराजद्वारा घसीटा जाता हुआ देखकर उग्रायुधके हृदयमें अतिशय दया उत्पन्न हो गयी। तब उन्होंने जनमेजयसे कहा—'जनमेजय! तुम मेरे कहनेसे इन ले जाये गये हुए तथा ले जाये जाते हुए वीरोंकी रक्षा करो'॥ ६१—६५॥ |
| जनमेजय उवाच<br>अरे पापा दुराचारा भवितारोऽस्य किंकराः।<br>तथेत्युक्तस्ततो राजा यमेन युयुधे चिरम्॥ ६६ | **जनमेजय बोले—**अरे पापी एवं दुराचारी यमदूतो! तुमलोग दण्डके भागी होओगे, अन्यथा उन्हें छोड़ दो। यमदूतोंद्वारा भी उसी प्रकारका उत्तर दिये जानेपर राजा जनमेजयने यमके साथ चिरकालतक युद्ध किया। |
* इसने भल्लाटनगर (सुलेमानपर्वतके पासका एक शहर) बसाया, जहाँका राजा शशिध्वज (कल्किपुराण, अ० २१-२२) प्रसिद्ध था।