मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| १९८ | * मत्स्यपुराण * |
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| उरुक्षवाः स्मृता ह्येते सर्वे ब्राह्मणतां गताः।<br>काव्यानां तु वरा ह्येते त्रयः प्रोक्ता महर्षयः॥ ४०<br>गर्गाः संकृतयः काव्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>सम्भूताङ्गिरसो दक्षा बृहत्क्षत्रस्य च क्षितिः॥ ४१<br>बृहत्क्षत्रस्य दायादो हस्तिनामा बभूव ह।<br>तेनेदं निर्मितं पूर्वं पुरं तु गजसाह्वयम्॥ ४२<br>हस्तिनश्चैव दायादास्त्रयः परमकीर्तयः।<br>अजमीढो द्विमीढश्च पुरुमीढस्तथैव च॥ ४३<br>अजमीढस्य पत्न्यस्तु तिस्रः कुरुकुलोद्भवाः।<br>नीलिनी धूमिनी चैव केशिनी चैव विश्रुताः॥ ४४<br>स तासु जनयामास पुत्रान् वै देववर्चसः।<br>तपसोऽन्ते महातेजा जाता वृद्धस्य धार्मिकाः॥ ४५<br>भारद्वाजप्रसादेन विस्तरं तेषु मे शृणु।<br>अजमीढस्य केशिन्यां कण्वः समभवत् किल॥ ४६<br>मेधातिथिः सुतस्तस्य तस्मात् काण्वायना द्विजाः।<br>अजमीढस्य भूमिन्यां जज्ञे बृहदनुर्नृपः॥ ४७<br>बृहदनोर्बृहन्तोऽथ बृहन्तस्य बृहन्मनाः।<br>बृहन्मनःसुतश्चापि बृहद्धनुरिति श्रुतः॥ ४८<br>बृहद्धनोर्बृहदिषुः पुत्रस्तस्य जयद्रथः।<br>अश्वजित् तनयस्तस्य सेनजित् तस्य चात्मजः॥ ४९<br>अथ सेनजितः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः।<br>रुचिराश्वश्च काव्यश्च राजा दृढरथस्तथा॥ ५०<br>वत्सश्चावर्तको राजा यस्यैते परिवत्सकाः।<br>रुचिराश्वस्य दायादः पृथुसेनो महायशाः॥ ५१<br>पृथुसेनस्य पौरस्तु पौरात्रीपोऽथ जज्ञिवान्।<br>नीपस्यैकशतं त्वासीत् पुत्राणाममितौजसाम्॥ ५२<br>नीपा इति समाख्याता राजानः सर्व एव ते।<br>तेषां वंशकरः श्रीमान्नीपानां कीर्तिवर्धनः॥ ५३<br>काव्याच्च समरो नाम सदेष्टसमरोऽभवत्।<br>समरस्य पारसम्पारौ सदश्व इति ते त्रयः॥ ५४<br>पुत्राः सर्वगुणोपेता जाता वै विश्रुता भुवि।<br>पारपुत्रः पृथुर्जातः पृथोस्तु सुकृतोऽभवत्॥ ५५ | ये सभी उरुक्षव कहलाते हैं और अन्तमें ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो गये थे। काव्यके वंशधरों ( भार्गव गोत्र-प्रवरों)-में ये तीनों महर्षि कहे गये हैं। इस प्रकार गर्ग, संकृति और कविके वंशमें उत्पन्न हुए लोग क्षत्रियांशसे युक्त ब्राह्मण थे। अङ्गिरागोत्रीय बृहत्क्षत्रने भी इस समृद्धिशालिनी पृथ्वीका शासन किया था। बृहत्क्षत्रका हस्ति नामक पुत्र हुआ। उसीने पूर्वकालमें इस हस्तिनापुर नामक नगरको बसाया था। हस्तीके अजमीढ, द्विमीढ और पुरुमीढ नामक तीन परम कीर्तिशाली पुत्र हुए। अजमीढकी तीन पत्नियाँ थीं, जो कुरुकुलमें उत्पन्न हुई थीं। वे नीलिनी, धूमिनी और केशिनी नामसे प्रसिद्ध थीं। अजमीढने उनके गर्भसे अनेकों पुत्रोंको पैदा किया था, जो सभी देवताओंके समान वर्चस्वी, महान् तेजस्वी और धर्मात्मा थे। वे अपने वृद्ध पिताकी तपस्याके अन्तमें महर्षि भारद्वाजकी कृपासे उत्पन्न हुए थे। उनका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त मुझसे सुनिये॥ ३४-४५ १/२ ॥<br>अजमीढके केशिनीके गर्भसे कण्व नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र मेधातिथि हुआ। उससे काण्वायन ब्राह्मणोंकी* उत्पत्ति हुई। भूमिनी (धूमिनी)-के गर्भसे अजमीढके पुत्ररूपमें राजा बृहदनुका जन्म हुआ। बृहदनुका पुत्र बृहन्त, बृहन्तका पुत्र बृहन्मना और बृहन्मनाका पुत्र बृहद्धनु नामसे विख्यात हुआ। बृहद्धनुका पुत्र बृहदिषु और उसका पुत्र जयद्रथ हुआ। उसका पुत्र अश्वजित् और उसका पुत्र सेनजित् हुआ। सेनजित्के रुचिराश्व, काव्य, राजा दृढरथ और राजा वत्सावर्तक—ये चार लोकविख्यात पुत्र हुए। इनमें वत्सावर्तकके वंशधर परिवत्सक नामसे कहे जाते हैं। रुचिराश्वका पुत्र महायशस्वी पृथुसेन हुआ। पृथुसेनसे पौरका और पौरसे नीपका जन्म हुआ। नीपके अमित तेजस्वी पुत्रोंकी संख्या एक सौ थी। वे सभी राजा थे और नीप नामसे ही विख्यात थे। काव्यसे समर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो उन नीपवंशियोंका वंशप्रवर्तक, लक्ष्मीसे युक्त और कीर्तिवर्धक था। वह समरके लिये सदा प्रयत्नशील रहता था। समरके पार, सम्पार और सदश्व—ये तीन पुत्र हुए, जो सम्पूर्ण गुणोंसे सम्पन्न तथा भूतलपर विख्यात थे। पारका पुत्र पृथु हुआ और पृथुसे सुकृतकी उत्पत्ति हुई। |
* विशेष द्रष्टव्य—ऋग्वेदसंहिता— ८। ५५। ४, ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड, भागवत १२। १। ४९ तथा पुनः मत्स्यपुराण १९१। २६।