भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 207
* अध्याय ४९ *१९७

| मातापितृभ्यां त्यक्तं तु दृष्ट्वा तं मरुतः शिशुम्।<br>जगृहुस्तं भरद्वाजं मरुतः कृपया स्थिताः॥ २६<br>तस्मिन् काले तु भरतो बहुभिर्ऋतुभिर्विभुः।<br>पुत्रनैमित्तिकैर्यज्ञैरयजत् पुत्रलिप्सया॥ २७<br>यदा स यजमानस्तु पुत्रं नासादयत् प्रभुः।<br>ततः क्रतुं मरुत्सोमं पुत्रार्थे समुपाहरत्॥ २८<br>तेन ते मरुतस्तस्य मरुत्सोमेन तुष्टुवुः।<br>उपनिन्युर्भरद्वाजं पुत्रार्थं भरताय वै॥ २९<br>दायादोऽङ्गिरसः सूनौरौरसस्तु बृहस्पतेः।<br>संक्रामितो भरद्वाजा मरुद्भिर्भरतं प्रति॥ ३०<br>भरतस्तु भरद्वाजं पुत्रं प्राप्य विभुर्ब्रवीत्।<br>आदावात्महिताय त्वं कृतार्थोऽहं त्वया विभो॥ ३१<br>पूर्वं तु वितथे तस्मिन् कृते वै पुत्रजन्मनि।<br>ततस्तु वितथो नाम भरद्वाजो नृपोऽभवत्॥ ३२<br>तस्मादपि भरद्वाजाद् ब्राह्मणाः क्षत्रिया भुवि।<br>द्व्यामुष्यायणकौलीनाः स्मृतास्ते द्विविधेन च॥ ३३ | इस प्रकार माता-पिताद्वारा त्यागे गये उस शिशुको देखकर मरुद्गणोंका हृदय दयार्द्र हो गया, तब उन्होंने उस भरद्वाज नामक शिशुको उठा लिया। उसी समय राजा भरत पुत्र-प्राप्तिकी अभिलाषासे अनेकों ऋतुकालके अवसरोंपर पुत्रनिमित्तक यज्ञोंका अनुष्ठान करते आ रहे थे, परंतु जब उन सामर्थ्यशाली नरेशको उन यज्ञोंके करनेसे भी पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने पुत्र-प्राप्तिके निमित्त 'मरुत्स्तोम' नामक यज्ञका अनुष्ठान प्रारम्भ किया। राजा भरतके उस मरुत्स्तोम यज्ञसे सभी मरुद्गण प्रसन्न हो गये। तब वे उस भरद्वाज नामक शिशुको साथ लेकर भरतको पुत्ररूपमें प्रदान करनेके लिये उस यज्ञमें उपस्थित हुए। वहाँ उन्होंने अङ्गिरा-पुत्र बृहस्पतिके औरस पुत्र भरद्वाजको भरतके हाथोंमें समर्पित कर दिया। तब राजा भरत भरद्वाजको पुत्ररूपमें पाकर इस प्रकार बोले—'विभो! पहले तो आप (इस शिशुको लेकर) आत्महितकी ही बात सोच रहे थे, परंतु अब इसे पाकर मैं आपकी कृपासे कृतार्थ हो गया हूँ।' पुत्र-जन्मके हेतु किये गये पहलेके सभी यज्ञ वितथ (निष्फल) हो गये थे, इसलिये वह भरद्वाज राजा वितथके नामसे प्रसिद्ध हुआ। उस भरद्वाजसे भी भूतलपर ब्राह्मण और क्षत्रिय—दोनों प्रकारके पुत्र उत्पन्न हुए, जो द्व्यामुष्यायण और कौलीन नामसे विख्यात हुए॥ २६—३३॥ | | ततो जाते हि वितथे भरतश्च दिवं ययौ।<br>भरद्वाजो दिवं यातो ह्यभिषिच्य सुतं ऋषिः॥ ३४ | तदनन्तर वितथके पुत्ररूपमें प्राप्त हो जानेपर राजा भरत (उसे राज्याभिषिक्त करके) स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि भरद्वाज भी यथासमय अपने पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोक सिधारे। | | दायादो वितथस्यासीद् भुमन्युर्महायशाः।<br>महाभूतोपमाः पुत्राश्चत्वारो भुवमन्यवः॥ ३५ | महायशस्वी भुवमन्यु वितथका पुत्र था। भुवमन्युके बृहत्क्षत्र, महावीर्य, नर और वीर्यशाली गर्ग नामक चार पुत्र थे, जो वायु आदि चार महातत्त्वोंके समान थे। | | बृहत्क्षत्रो महावीर्यो नरो गर्गश्च वीर्यवान्।<br>नरस्य संकृतिः पुत्रस्तस्य पुत्रो महायशाः॥ ३६ | नरका पुत्र संकृति हुआ। संकृतिके दो पुत्र महायशस्वी गुरुधी और रन्तिदेव हुए। वे दोनों सत्कृतिके गर्भसे उत्पन्न हुए बतलाये जाते हैं। | | गुरुधी रन्तिदेवश्च सत्कृत्यां तावुभौ स्मृतौ।<br>गर्गस्य चैव दायादः शिबिर्विद्वानजायत॥ ३७ | गर्गके पुत्ररूपमें विद्वान् शिवि उत्पन्न हुआ। उसके वंशधर जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विज थे, शैव्य और गर्गके नामसे विख्यात हुए। | | स्मृताः शैव्यास्ततो गर्गाः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>आहार्यतनयश्चैव धीमानासीदुरुक्षवः॥ ३८ | शिविके आहार्यतनय और बुद्धिमान् उरुक्षव नामक दो पुत्र थे। | | तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे पुत्रकत्रयम्।<br>त्र्यरुणं पुष्करिं चैव कविं चैव महायशाः॥ ३९ | उरुक्षवकी पत्नी विशालाने त्र्यरुण, पुष्करि और महायशस्वी कवि—इन तीन पुत्रोंको जन्म दिया। |