भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 211, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 211
* अध्याय ५० *२०१

पचासवाँ अध्याय

पूरुवंशी नरेशोंका विस्तृत इतिहास

| सूत उवाच | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! अजमीढकी नीलिनी नामकी पत्नीके गर्भसे राजा नीलका$^१$ जन्म हुआ। नीलकी उग्र तपस्याके परिणामस्वरूप सुशान्तिकी उत्पत्ति हुई। सुशान्तिसे पुरुजानुका और पुरुजानुसे पृथुका जन्म हुआ। पृथुका पुत्र भद्राश्व हुआ। अब भद्राश्वके पुत्रोंके विषयमें सुनिये—मुद्गल, जय, राजा बृहदिषु, पराक्रमी जवीनर और पाँचवाँ कपिल—ये पाँचों भद्राश्वके पुत्र थे। इन पाँचोंके द्वारा शासित जनपद पञ्चाल$^२$ नामसे प्रसिद्ध हुए। ये सभी पञ्चाल देशोंके रक्षक थे—ऐसा हमलोगोंने सुना है। मुद्गलके पुत्रगण, जो क्षत्रियांशसे युक्त द्विजाति थे, मौद्गल्य नामसे प्रसिद्ध हुए। ये कण्व और मुद्गलके गोत्रमें उत्पन्न होनेवाले द्विजाति अङ्गिराके पक्षमें सम्मिलित हो गये। महायशस्वी ब्रह्मिष्ठने मुद्गलके पुत्ररूपमें जन्म लिया। उसका पुत्र इन्द्रसेन और उसका पुत्र विन्ध्याश्व हुआ। विन्ध्याश्वके संयोगसे मेनकाके गर्भसे जुड़वीं संतान उत्पन्न हुई थी—ऐसा सुना जाता है। उनमें एक तो राजर्षि दिवोदास थे और दूसरी यशस्विनी अहल्या थी। अहल्याने शरद्वान् गौतमके पुत्र ऋषिश्रेष्ठ शतानन्दको उत्पन्न किया था। शतानन्दका पुत्र महातपस्वी एवं धनुर्वेदका पारंगत विद्वान् सत्यधृति हुआ। धर्मात्मा सत्यधृतिका वीर्य अमोघ था। एक बार एक अप्सराको देखकर सत्यधृतिका वीर्य (सरोवरमें स्नान करते समय) जलमें स्खलित हो गया। उस वीर्यसे उस सरोवरमें जुड़वीं संतान उत्पन्न हो गयी। वे उसी सरोवरमें पल रहे थे। एक बार महाराज शांतनु शिकारके लिये निकले हुए थे। वे उस सरोवरमें घूमते हुए उन बच्चोंको देखकर कृपा-परवश हो उन्हें उठा लाये। इस प्रकार मैंने शरद्वान्‌के उन पुत्रोंका जो गौतम (गोत्र) नामसे विख्यात हैं, वर्णन कर दिया। अब इसके आगे दिवोदासकी संततिका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनिये॥ १—१२॥ | | अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः।<br>नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुदपद्यत॥ १<br>पुरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरुजानुतः।<br>भद्राश्वः पृथुदायादो भद्राश्वतनयाञ्छृणु॥ २<br>मुद्गलश्च जयश्चैव राजा बृहदिषुस्तथा।<br>जवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः॥ ३<br>पञ्चानां चैव पञ्चालानेताञ्जनपदान् विदुः।<br>पञ्चालरक्षिणो ह्येते देशानामिति नः श्रुतम्॥ ४<br>मुद्गलस्यापि मौद्गल्याः क्षत्रोपेता द्विजातयः।<br>एते ह्यङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः काण्वमुद्गलाः॥ ५<br>मुद्गलस्य सुतो जज्ञे ब्रह्मिष्ठः सुमहाद्यशाः।<br>इन्द्रसेनः सुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्य चात्मजः॥ ६<br>विन्ध्याश्वान्मिथुनं जज्ञे मेनकायामिति श्रुतिः।<br>दिवोदासश्च राजर्षिरहल्या च यशस्विनी॥ ७<br>शरद्वतस्तु दायादमहल्या सम्प्रसूयत।<br>शतानन्दमृषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहातपाः॥ ८<br>सुतः सत्यधृतिर्नाम धनुर्वेदस्य पारगः।<br>आसीत् सत्यधृतेः शुक्रममोघं धार्मिकस्य तु॥ ९<br>स्कन्नं रेतः सत्यधृतेर्दृष्ट्वा चाप्सरसं जले।<br>मिथुनं तत्र सम्भूतं तस्मिन् सरसि सम्भृतम्॥ १०<br>ततः सरसि तस्मिंस्तु क्रममाणं महीपतिः।<br>दृष्ट्वा जग्राह कृपया शान्तनुर्मृगयां गतः॥ ११<br>एते शरदतः पुत्रा आख्याता गौतमा वराः।<br>अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य वै प्रजाः॥ १२ | |


१. यह नील राजाकी चर्चा गत अध्यायके अन्तमें ७८ वें श्लोकमें भी है। ये उनसे भिन्न हैं।
२. यह रुहेलखण्ड है, जो दिल्लीसे पूर्व गङ्गाके उत्तर तथा दक्षिणमें चम्बल नदीके तटतक फैला है। ये दक्षिण और उत्तर पञ्चालके नामसे प्रसिद्ध हैं। उत्तर पञ्चालकी राजधानी अहिच्छत्र (रामनगर) तथा दक्षिण पञ्चालकी राजधानी कम्पिल और माकंद थी। (द्रष्टव्य- महाभारत आदि० १४०, उद्योग० १९३, गर्गसंहिता १३९ आदि) गौतमबुद्धके समय उत्तर पञ्चालकी राजधानी कन्नौज भी रहा। राइस् डेविड्स। 'Buddhist India'.

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