भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 193
* अध्याय ४७ *१८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्ते दानवाः सर्वे प्रणिपत्याभिनन्द्य च।<br>वचनं जगृहुस्तस्य चिराभ्यासेन मोहिताः॥ १९८<br>ऊचुस्तमसुराः सर्वे क्रोधसंरक्तलोचनाः।<br>अयं गुरुर्हितोऽस्माकं गच्छ त्वं नासि नो गुरुः॥ १९९<br>भार्गवो वाङ्गिरा वापि भगवानेष नो गुरुः।<br>स्थिता वयं निदेशेऽस्य साधु त्वं गच्छ मा चिरम्॥ २००<br>एवमुक्त्वासुराः सर्वे प्रापद्यन्त बृहस्पतिम्।<br>यदा न प्रत्यपद्यन्त काव्येनोक्तं महद्धितम्॥ २०१<br>चुकोप भार्गवस्तेषामवलेपेन तेन तु।<br>बोधिता हि मया यस्मान्न मां भजथ दानवाः॥ २०२<br>तस्मात् प्रनष्टसंज्ञा वै पराभवमवाप्स्यथ।<br>इति व्याहृत्य तान् काव्यो जगामाथ यथागतम्॥ २०३‘ऐसा कहकर चिरकालके अभ्याससे मोहित हुए उन सभी दानवोंने बृहस्पतिको प्रणाम करके उनका अभिनन्दन किया और उन्हींके वचनोंको अङ्गीकार किया। तत्पश्चात् क्रोधसे आँखें लाल करके उन सभी असुरोंने शुक्राचार्यसे कहा—‘ये ही हमलोगोंके हितैषी गुरुदेव हैं, आप हमारे गुरु नहीं हैं, अतः आप यहाँसे चले जाइये। ये चाहे शुक्राचार्य हों अथवा बृहस्पति ही क्यों न हों, ये ही हमारे ऐश्वर्यशाली गुरुदेव हैं। हमलोग इन्हींकी आज्ञामें स्थित हैं। अतः आपके लिये यही अच्छा होगा कि आप यहाँसे शीघ्र चले जाइये, विलम्ब मत कीजिये।’ ऐसा कहकर सभी असुर बृहस्पतिके निकट चले आये। इधर जब असुरोंने शुक्राचार्यद्वारा कहे गये महान् हितकारक वचनोंपर कुछ ध्यान नहीं दिया, तब उनके उस गर्वसे शुक्राचार्य कुपित हो उठे (और शाप देते हुए बोले—) ‘दानवो! चूँकि मेरे समझानेपर भी तुमलोगोंने मेरी बात नहीं मानी है, इसलिये (भावी संग्राममें) तुम्हारी चेतना नष्ट हो जायगी और तुमलोग पराभवको प्राप्त करोगे।’ इस प्रकार असुरोंको शाप देकर शुक्राचार्य जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये॥ १९६—२०३॥
शमांस्तानसुराञ्ज्ञात्वा काव्येन स बृहस्पतिः।<br>कृतार्थः स तदा हृष्टः स्वरूपं प्रत्यपद्यत॥ २०४<br>बुद्ध्यासुरान् हताञ्ज्ञात्वा कृतार्थोऽन्तर्दधीयत।<br>ततः प्रनष्टे तस्मिंस्तु विभ्रान्ता दानवाभवन्॥ २०५<br>अहो विवञ्चिताः स्मेति परस्परमथाब्रुवन्।<br>पृष्ठतोऽभिमुखाश्चैव ताडिताङ्गिरसेन तु॥ २०६<br>वञ्चिताः सोपधानेन स्वे स्वे वस्तुनि मायया।<br>ततस्त्वपरितुष्टास्ते तमेव त्वरिता ययुः।<br>प्रह्लादमग्रतः कृत्वा काव्यस्यानुपदं पुनः॥ २०७<br>ततः काव्यं समासाद्य उपतस्थुरवाङ्मुखाः।<br>समागतान् पुनर्द्दष्ट्वा काव्यो याज्यानुवाच ह॥ २०८<br>मया सम्बोधिताः सर्वे यस्मान्मां नाभिनन्दथ।<br>ततस्तेनावमानेन गता यूयं पराभवम्॥ २०९<br>एवं ब्रुवाणं शुक्रं तु बाष्पसंदिग्धया गिरा।<br>प्रह्लादस्तं तदोवाच मा नस्त्वं त्यज भार्गव॥ २१०<br>स्वाश्रयान् भजमानांश्च भक्तांस्त्वं भज भार्गव।इधर जब बृहस्पतिको यह ज्ञात हुआ कि शुक्राचार्यने असुरोंको शाप दे दिया, तब वे प्रसन्नतासे खिल उठे; क्योंकि उनका प्रयोजन सिद्ध हो चुका था। तत्पश्चात् वे तुरंत अपने वास्तविक बृहस्पतिरूपमें प्रकट हो गये और अपने बुद्धिबलसे असुरोंको मरा हुआ जानकर सफलमनोरथ हो अन्तर्हित हो गये। बृहस्पतिके आँखोंसे ओझल हो जानेपर दानवगण विशेषरूपसे भ्रममें पड़ गये और परस्पर यों कहने लगे—‘अहो! हमलोग तो विशेषरूपसे ठग लिये गये। बृहस्पतिने हमलोगोंको आगे और पीछे अर्थात् प्रत्यक्ष और परोक्ष—दोनों ओरसे व्यथित कर दिया। उन्होंने अपनी मायाद्वारा सहायकसहित हमलोगोंको अपनी-अपनी वस्तुओंसे वञ्चित कर दिया।’ इस प्रकार असंतुष्ट हुए वे सभी दानव प्रह्लादको आगे कर पुनः उन्हीं शुक्राचार्यका अनुगमन करनेके लिये तुरंत प्रस्थित हुए और शुक्राचार्यके निकट पहुँचकर नीचे मुख किये हुए उन्हें घेरकर खड़े हो गये। तब अपने यजमानोंको पुनः आया देखकर शुक्राचार्यने उनसे कहा—‘दानवो! चूँकि मेरे द्वारा भलीभाँति समझाये जानेपर भी तुम सब लोगोंने मेरा अभिनन्दन नहीं किया, इसलिये मेरे प्रति किये हुए उस अपमानके कारण तुमलोग पराभवको प्राप्त हुए हो।’ शुक्राचार्यके यों कहनेपर प्रह्लादकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये। तब वे गद्गद वाणीद्वारा उनसे प्रार्थना करते हुए बोले—‘भृगुनन्दन! आप हमलोगोंका परित्याग न करें। भार्गव! हमलोग आपके आश्रित,