मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१८२ * मत्स्यपुराण *
| अहं वोऽध्यापयिष्यामि विद्याः प्राप्तास्तु या मया।<br>ततस्ते हृष्टमनसो विद्यार्थमुपपेदिरे॥ १८५<br>पूर्णे काव्यस्तदा तस्मिन् समये दशवार्षिके।<br>समयान्ते देवयानी तदोत्पन्ना इति श्रुतिः।<br>बुद्धिं चक्रे ततः सोऽथ याज्यानां प्रत्यवेक्षणे॥ १८६<br>देवि गच्छाम्यहं द्रष्टुं तव याज्याञ् शुचिस्मिते।<br>विभ्रान्तवीक्षिते साध्वि विवर्णायतलोचने॥ १८७<br>एवमुक्ताब्रवीदेनं भज भक्तान् महाव्रत।<br>एष धर्मः सतां ब्रह्मन् न धर्मं लोपयामि ते॥ १८८ | 'वहाँ मुझे जो विद्याएँ प्राप्त हुई हैं, उन्हें मैं तुमलोगोंको पढ़ाऊँगा।' यह सुनकर वे सभी प्रसन्नमनसे विद्या-प्राप्तिके लिये वहाँ एकत्र हो गये। उधर जब वह दस वर्षका निश्चित समय पूर्ण हो गया, तब शुक्राचार्यने अपने यजमानोंकी खोज-खबर लेनेका विचार किया। इसी समयकी समाप्तिपर (जयन्तीके गर्भसे) देवयानी उत्पन्न हुई थी—ऐसा सुना जाता है। (तब वे जयन्तीसे बोले—) 'पावन मुसकानवाली देवि! तुम्हारे नेत्र तो विभ्रान्त-से एवं बड़े हैं तथा तुम्हारी दृष्टि चञ्चल है, साध्वि! अब मैं तुम्हारे यजमानोंकी देखभाल करनेके लिये जा रहा हूँ।' यों कहे जानेपर जयन्तीने शुक्राचार्यसे कहा—'महाव्रत! आप अपने भक्तोंका अवश्य भला कीजिये; क्योंकि यही सत्पुरुषोंका धर्म है। ब्रह्मन्! मैं आपके धर्मका लोप नहीं करना चाहती'॥ १८२—१८८॥ |
| ततो गत्वासुरान् दृष्ट्वा देवाचार्येण धीमता।<br>वञ्चितान् काव्यरूपेण ततः काव्योऽब्रवीत्तु तान्॥ १८९<br>काव्यं मां वो विजानीध्वं तोषितो गिरिशो विभुः।<br>वञ्चिता बत यूयं वै सर्वे शृणुत दानवाः॥ १९०<br>श्रुत्वा तथा ब्रुवाणं तं सम्भ्रान्तास्ते तदाभवन्।<br>प्रेक्षन्तस्तावभौ तत्र स्थितासीनौ सुविस्मिताः॥ १९१<br>सम्प्रमूढास्ततः सर्वे न प्राबुध्यन्त किंचन।<br>अब्रवीत् सम्प्रमूढेषु काव्यस्तानसुरांस्तदा॥ १९२<br>आचार्यों वो ह्यहं काव्यो देवाचार्योऽयमङ्गिराः।<br>अनुगच्छत मां दैत्यास्त्यजतैनं बृहस्पतिम्॥ १९३<br>इत्युक्ता ह्यसुरास्तेन तावुभौ समवेक्ष्य च।<br>यदासुरा विशेषं तु न जानन्त्युभयोस्तयोः॥ १९४<br>बृहस्पतिरुवाचैनानसम्भ्रान्तस्तपोधनः ।<br>काव्यो वोऽहं गुरुर्दैत्या मद्रूपोऽयं बृहस्पतिः॥ १९५<br>सम्मोहयति रूपेण मामकेनैष वोऽसुराः।<br>श्रुत्वा तस्य ततस्ते वै समेत्य तु ततोऽब्रुवन्॥ १९६ | तदनन्तर असुरोंके निकट पहुँचकर शुक्राचार्यने जब यह देखा कि बुद्धिमान् देवाचार्य बृहस्पतिने मेरा रूप धारणकर असुरोंको ठग लिया है, तब वे असुरोंसे बोले—'दानवो! तुमलोग ध्यानपूर्वक सुन लो। अपनी तपस्याद्वारा भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेवाला शुक्राचार्य मैं हूँ। मुझे ही तुमलोग अपना गुरुदेव शुक्राचार्य समझो। बृहस्पतिद्वारा तुम सब लोग ठग लिये गये हो।' शुक्राचार्यको वैसा कहते हुए सुनकर उस समय वे सभी अत्यन्त भ्रममें पड़ गये और आश्चर्यचकित हो वहाँ बैठे हुए उन दोनोंकी ओर निहारते ही रह गये। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे। उस समय उनकी समझमें कुछ भी नहीं आ रहा था। इस प्रकार उनके किंकर्तव्यविमूढ़ हो जानेपर शुक्राचार्यने उन असुरोंसे कहा—'असुरो! तुमलोगोंका आचार्य शुक्राचार्य मैं हूँ और ये देवताओंके आचार्य बृहस्पति हैं। इसलिये तुमलोग इन बृहस्पतिका त्याग कर दो और मेरा अनुगमन करो।' शुक्राचार्यके यों समझानेपर असुरगण उन दोनोंकी ओर ध्यानपूर्वक निहारने लगे, परंतु जब उन्हें उन दोनोंमें कोई विशेषता नहीं प्रतीत हुई, तब तपस्वी बृहस्पति धैर्यपूर्वक उन असुरोंसे बोले—'दैत्यो! तुमलोगोंका गुरु शुक्राचार्य मैं हूँ और मेरा रूप धारण करनेवाले ये बृहस्पति हैं। असुरो! ये मेरा रूप धारणकर तुमलोगोंको मोहमें डाल रहे हैं'॥ १८९—१९५ ½॥ |
| अयं नो दशवर्षाणि सततं शास्ति वै प्रभुः।<br>एष वै गुरुरस्माकमन्तरे स्फुरयन् द्विजः॥ १९७ | बृहस्पतिकी बात सुनकर वे सभी एकत्र हो इस प्रकार बोले—'ये सामर्थ्यशाली ब्राह्मणदेवता हमारे अन्तःकरणमें स्फुरित होते हुए दस वर्षोंसे लगातार हमलोगोंको शिक्षा दे रहे हैं, अतः ये ही हमारे गुरु हैं।' |